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बुधवार, 24 अक्टूबर 2018

रंग के साथ बदली तरंग

जगदीश चंद्र बसु और गुल्येल्यो मार्कोनी ने 1900 में पहला बेतार संदेश भेज कर रेडियो संदेश भेजने की शुरुआत की। तब से अब तक के 117 सालों के स$फर में कई मोड़, कई पड़ाव, कई शिखर, कई आयाम रेडियो से जुड़े और रेडियो का सफर निरंतर जारी रहा

 

 आशिमा

 

बीते समय की फिल्म 'रंग दे बसंती’ याद कीजिए, देश के भ्रष्ट सिस्टम की आग में अपने दोस्त को खो चुके चंद नौजवान, हर तरह से हार जाने के बाद अपनी बात को लोगों तक पहुंचाने के लिए अंत में रेडियो का माध्यम चुनते हैं। जो युवा जुनून में अपनी बात किसी भी जरिए पहुंचा पाने में असमर्थ थे, उनका विश्वास 'ऑल इंडिया रेडियो’ में जगा और चंद लम्हों के अंदर उनकी आवाज़ धीरे-धीरे देश के कोने कोने में पहुंच जाती है। इस दौरान वे लोगों के कॉल्स का भी जवाब देते हैं कि उनका आखिर मकसद क्या है। उनके रेडियो पर बोलने का असर यह होता है कि प्रशासन तक बात पहुंच जाती है, फोर्स को भेजा जाता है और चंद मिनटों के अंदर 'ऑल इंडिया रेडियो’ के बाहर भीड़ लग जाती है। देश में हर जगह अलग-अलग तबके के लोग रेडियो में उनकी आवाज से रू-ब-रू होते दिखाई देते हैं।

भले ही फिल्म ने देश के नौजवानों को देश के प्रति जिम्मेदार होने का संदेश दिया, लेकिन वहीं एक और बहुत बड़ा संदेश यह भी दिया कि रेडियो आज भी एक सशक्त माध्यम है और तरक्की की उम्मीद भी। बदलते परिवेश के साथ साथ अपने नए नए रूपों में भी यह सामने आ रहा है। मीडिया के अन्य माध्यमों के अधिक पॉपुलर हो जाने का यह मतलब कतई नहीं कि रेडियो की महत्ता घट गई है। जमीनी हकीकत पर जितनी रेडियो की पहुंच है उसे नकारा नहीं जा सकता। सुपरस्टार शाहरुख खान ने भी फिल्म 'दिल से’ में ऑल इंडिया रेडियो के रिपोर्टर का किरदार निभाया था। इसके अलावा विद्या बालन, प्रीति जिंटा जैसी शख्सियतों ने भी आरजे के सशक्त किरदार निभाए हैं। जब सिनेमा तक रेडियो के महत्व की पहुंच है तो मान लिया जाना चाहिए कि रेडियो से हमारा साथ बहुत लंबा और उम्मीदों भरा है।

 

सशक्त माध्यम रेडियो

रेडियो ऐसा माध्यम है जिसका इस्तेमाल करते वक्त हमें अपनी इंद्रियों को अधिक केंद्रित नहीं करना पड़ता, न ही किसी प्रकार के ठहराव की जरूरत है। रेडियो को एक धोबी कपड़े इस्त्री करते करते सुन रहा है, एक दर्जी कपड़े सीते-सीते रेडियो से मिलने वाले मनोरंजन से मु$खातिब है। एक कार ड्राइवर, ट्रक ड्राइवर के हमराही भी ये रेडियो होते हैं, जिसके लिए उन्हें कहीं रुकने या ठहर कर सुनने                                                                     तरह के उतार-चढ़ाव बेशक रहे हों, लेकिन फिर भी रेडियो देश का एक सकारात्मक उम्मीद है। लिहाजा हमारे माननीय प्रधान मंत्री जहां देश के तकनीकी विकास के प्रयास कर रहे हैं, स्मार्ट सिटी जैसी अच्छी संकल्पनाएं सामने ला रहे हैं, वे खुद भी 'मन की बात’ के जरिए आम जन से राब्ता कायम कर रहे हैं, जो कि रेडियो के माध्यम से किया जा रहा है। यह पहल निश्चित रूप से काबिले तारीफ  है, क्योंकि यह इस बात को दर्शाता है कि रेडियो के बढ़ते महत्व को व्यापक स्तर पर समझा जा रहा है, और इसमें संभावनाएं हैं।

 

शुरुआती दौर

आज़ादी के बाद से यदि बात करें तो शुरुआती दौर में रेडियो सरकार के नियंत्रण में था। मूल रूप से समाचार, कृषि, विकास के मुद्दे, फरमाइशी गानों आदि को समर्पित होता था। लेकिन समय के साथ इसमें भी बदलाव आते गए और यह पहले से कहीं ज्यादा बेहतर होता गया। जगजाहिर है कि रेडियो आज भी यह काम बखूबी कर रहा है। ऑल इंडिया रेडियो के लोगों का वन लाइनर ही है 'बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय’ यह बात बहुत अच्छे से परिलक्षित होती दिखी है। सही मायनों में कहा जाए तो 'ऑल इंडिया रेडियो’ अपने टैगलाइन को चरितार्थ कर रहा है।

 

समय के साथ बदलाव

देश के विकास के साथ रेडियो का विकास होता गया है। जैसे-जैसे देश ने विकास किया है, नई नई तकनीकों को अपनाया है, रेडियो भी साथ साथ कदमताल करता हुआ आगे बढ़ा है। रेडियो का शुरुआती दौर जहां सीमित नज़र आता है वहीं इसमें कई तरह के प्रयोग आने वाले दौर में हुए। सन 2000 में सरकार ने एफएम की 108 तक की फ्रीक्वेंसी की नीलामी शुरू की। देश का पहला प्राइवेट एफएम रेडियो स्टेशन 'रेडियो सिटी बेंगलुरु’ 3 जुलाई 2001 को अस्तित्व में आया। अब तक मानो रेडियो का संचालन एक बने बनाए ढांचे पर चल रहा था, 'ऑल इंडिया रेडियो’ भी अपने काम को कर रहा था, लेकिन प्राइवेट रेडियो स्टेशन के आने के बाद रेडियो के जरिए पेश किए जाने वाले मनोरंजन में एक गजब का बदलाव आया, क्योंकि सीमित फ्रीक्वेंसी के जरिए आम पहुंच के साथ काम ज्यादा प्रभावी ढंग से हुआ।

 

एफ एम रेडियो के चरण

शार्ट वेब या 'एस डब्ल्यू जैसे 'बीबीसी’, 'वॉयस ऑफ  रशिया’ आदि से हटकर एफएम रेडियो पर आते हैं। एफएम रेडियो यानी फ्रीक्वेंसी मॉड्युलेशन, जिसकी रेंज एसडब्ल्यू जैसी व्यापक न होकर तकरीबन 70 किलोमीटर की रेंज की होती है। 'हरमन रेडियो ऑस्ट्रेलिया’ के प्रोग्रामिंग हेड हरप्रीत कहते हैं कि एफएम रेडियो इसी इरादे से लाया गया था कि एक लोकेलिटी को कवर किया जा सके, क्योंकि जो समस्याएं पंजाब की हैं उनका जिक्र किसी और राज्य में या उससे अलग भौगोलिक क्षेत्र में किसी काम का नहीं है। लिहाजा उस भौगोलिक दायरे में आने वाली समस्याएं, वहां का प्रशासन, ट्रैफिक अपडेट उस जगह के लोगों के लिए होंगे, और रेडियो की व्यापकता बढ़ेगी, जगह के हिसाब से राब्ता कायम करना आसान होगा

आज की जरूरत कम्युनिटी रेडियो

जहां एक माध्यम के रूप में रेडियो का काम आवाज को निर्धारित जन तक पहुंचाना है वहीं कम्युनिटी रेडियो की अवधारणा एक जिम्मेदारी के साथ सामने आती है। रेडियो का वह प्रकार जिसका काम पूरी तरह से विकास को समर्पित है। इसकी रेंज 10 से 15 किलोमीटर के दायरे में होती है, सरकार इसका लाइसेंस एनजीओ को देती है। कम्युनिटी रेडियो में एक लंबा दौर गुजारने वाले आरजे सुरेंदर अपने अनुभव साझा करते हुए कहते हैं कि मेवात में जब वे कार्यरत थे, उनका एक कार्यक्रम था, 'गांव गांव की बात’ इसमें वे गांव की समस्याओं पर बात करते थे, लोगों से मुखातिब होते थे।  वहां की स्थानीय भाषा में श्रोता से मुखातिब होने की वजह से उनकी लोकप्रियता काफी जल्दी बढ़ गई। एक बार एक व्यक्ति उनके पास ढाई किलो कलाकंद लेकर आया और भावविभोर होकर उनके रेडियो के प्रति अपनापन बताने लगा। वहां के लोग इस बात से बेहद खुश थे, क्योंकि उनकी बातों को कहीं जगह मिल रही थी। अपनी बात आगे बढ़ाते हुए सुरेंदर कहते हैं कि कम्युनिटी रेडियो की खासियत ही यही है कि स्थानीय स्तर के लोगों को उनका अपना मंच मिल जाता है, जहां वे अपने आप को साझा कर सकते हैं।

ग्रामीण विकास के क्षेत्र में जो कम्युनिटी रेडियो के बेहतरीन योगदान जमीनी स्तर पर साफ  देखे जा सकते हैं। किस तरह इनमें काम करने वाले कर्मचारी अपने निर्धारित क्षेत्र के विकास के लिए दिन-रात मेहनत करते हैं। ग्राम पंचायत की भागीदारी सुनिश्चित करना, निरक्षर या अबोध लोगों के लिए आसान भाषा में सामग्री प्रस्तुत करना, उनको शामिल करना और सामाजिक कुरीतियों के प्रति आगाह करना, ऐसे तमाम काम कम्युनिटी रेडियो बखूबी कर रहा है। सही मायनों में कहा जाए तो आज के समय में ग्रामीण भारत को एक नई दिशा देने का काम कर रहा है कम्युनिटी रेडियो।

 

वेब रेडियो और हमारे एनआरआई 

एफएम और कम्युनिटी रेडियो के साथ-साथ वेब रेडियो ने भी रेडियो में क्रांति लाने का काम किया है। वेब रेडियो एक ऐसी अवधारणा है जिसके तहत रेडियो को एक तरह से वेब से जोड़कर व्यापक बनाया जाता है। इसे भारत में लाने का मुख्य कारण हमारे प्रवासी भारतीयों को अपनी जमीन से जोड़े रखना है। विदेश में रहने वाले भारतीय इसके जरिए अपने देश अपने राज्य की जानकारियों से रू-ब-रू होते हैं। हरप्रीत का कहना है कि पंजाब से विदेशों में जाकर बसने वाले भारतीयों के साथ राब्ता कायम करने के इरादे से ऐसे तमाम वेब रेडियो हैं। 'रेडियो हांजी’, 'रेडियो चन परदेसी’ और 'हरमन रेडियो ऑस्ट्रेलिया’ इसके नायाब नमूने हैं।

 

मोबाइल का टूटा भ्रम

जी हां, यह मात्र एक भ्रांति ही है कि अब रेडियो की जगह मोबाइल ले चुका है या दूसरे शब्दों में कहें तो तकनीकी विकास में रेडियो की भूमिका पिछड़ रही है। दोनों ही बातें सही नहीं हैं, हां,आंशिक रूप से यह जरूर कहा जा सकता है कि बदलते दौर के साथ साथ लोगों की जरूरतें बदली हैं या नई हुई हैं, लेकिन रेडियो भी अपनी चाल बदल कर सामने आ रहा है। एंड्रॉएड ऐप आने के बाद वेब रेडियो सुगम हुए हैं। इतना ही नहीं सामान्य मोबाइल से लेकर स्मार्टफोन तक में आसानी से एफएम रेडियो की पहुंच हो जाती है। मेट्रो शहरों से लेकर सूदूर भारत तक में मोबाइल फोन पर आसानी से रेडियो स्टेशन सुनने को मिल जाते हैं। हकीकत यह है कि आज मोबाइल के जरिए भी रेडियो अपनी पहुंच को काफी व्यापक बना रहा है।

 

आज भी वरदान

हालांकि देश के अधिकांश ग्रामीण इलाकों तक टीवी और अन्य इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों की पहुंच हो गई है, लेकिन इसके बावजूद रेडियो की स्वीकार्यता आज भी ग्रामीण इलाकों में काफी ज़्यादा है। सुदूर गांवों में और समाज का एक ऐसा वर्ग, जो निरक्षर है, या फिर मजदूरी दिहाड़ी में है, उनके लिए रेडियो सबसे मुफीद माध्यम है। कामगार लोगों के लिए रेडियो की जरूरत विकास और मनोरंजन दोनों रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। अक्सर घरों में पुताई करने वाले कामगार लकड़ी की सीढिय़ों पर चढ़े हुए पुताई करते हुए मोबाइल में गाने या रेडियो उसी सीढ़ी के साथ लटका कर काम करते हुए दिख जाते हैं। खेतों में काम करते हुए किसान हों या मौसम की जानकारी हासिल करने के लिए परेशान गांववाले, सभी रेडियो से मिलने वाली कृषि और मौसम से संबंधित जानकारी का लाभ उठा रहे हैं।

 

बेहतर भविष्य

कुल मिलाकर अब तक रेडियो ने जो दौर देखा है, अलग-अलग आयाम निकलकर सामने आए हैं। करियर के ढेरों विकल्प खुले हैं, विकास में भागीदारी सुनिश्चित हुई है, मनोरंजन का स्तर और भी क्रिएटिव हुआ है। लेकिन एक बात और है कि और भी नए विकल्पों के बारे में भी विचार किया जाना चाहिए। कितने ही ऐसे उदाहरण सामने आए हैं, जिन्होंने रेडियो के जरिए नए विकल्प खोले। गौरतलब है कि युवाओं से लेकर प्रौढ़ तक एक बहुत बड़ा तबका रेडियो में दिलचस्पी रखता है। सही मायनों में कहा जाए तो रेडियो कल भी था आज भी है और कल भी रहेगा।



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