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रविवार, 22 अप्रैल 2018

अंधी मछलियां

वे अद्भुत हैं, वे आकर्षक हैं, बच्चे हों या बड़े सबकी खुशी हैं, लेकिन प्रदूषण और तेल के लिए बड़ी संख्या में पकड़ कर मारे जाने की वजह से अब कुछ ही जिंदा बची हैं

गंगा में मस्ती से गोते खाते डॉलफिन को देखना बच्चों और बड़ों दोनों के लिए ही सुखद अनुभव है। पानी से निकलकर हवा में एक लहर की तरह आना और फिर किसी ओलंपिक चैंपियन की तरह पानी में गोते लगाना। मोहक और मजबूत दिखने वाली इस स्तनपाई के करतबों को देखने के लिए लोग घंटों खड़े रहते थे।

मगरमच्छों और कछुओं की प्रजातियों की तरह ही डॉलफिन भी जल पर पाई जाने वाली सबसे पुरानी प्रजातियों में से एक है। गंगा में पाई जाने वाली डॉलफिन एकदम अलग है, इसे सबसे पहली बार 1901 में खोजा गया। ये अंधी हैं, पानी में विचरने के लिए और अपना शिकार पकडऩे के लिए ये तेज सीटी जैसी आवाज़ निकालती हैं, जो मछलियों से टकराकर वापस आती है। डॉलफिन पानी में लागू होने वाले फूड चेन के शीर्ष पर आती हैं। जहां भी डॉलफिन की संख्या ज्यादा है, इसका मतबल है कि पानी स्वच्छ बिल्कुल है। दुख की बात है कि गंगा में अब पहले की संख्या में डॉलफिन नहीं बची हैं। एक समय गंगा में 4 से 5 हजार डॉलफिन हुआ करती थीं, वहीं आज इनकी संख्या 1200 से लेकर 1500 तक ही रह गई है।  

हम उसी बात को दुहरा रहे हैं, जिसे काफी पहले से जानते हैं। यानि की हमारी गंगा काफी प्रदूषित हो गई है। गंगा से बड़ी संख्या में मछलियां पकड़ी जाती हैं। जिसके लिए जाल का इस्तेमाल होता है। डॉलफिन इन जालों में फंस जाती हैं, क्योंकि जाल से टकराकर इनकी आवाज़ बाहर नहीं आ पाती, इस तरह वे फंसकर मर जाती हैं। नालों और कारखानों से निकला हुआ कचरा और जहरीले रसायनों ने डॉलफिन की सीधे तौर पर जान ली है।   

पटना के रविंद्र सिन्हा डॉलफिन को देखते हुए बड़े हुए हैं। इनकी पीड़ा से वह बेहद परेशान हुए। उन्होंने सोचा कि गंगा और इन डॉलफिन के लिए कुछ किया जाए। सबसे पहले जरूरी यह जानना था कि डॉलफिन किन तरह की परेशानियों से घिरी हुई हैं? इसके लिए उन्होंने अपने छह और साथियों के साथ मिलकर 'डॉलफिन फांउडेशन’ बनाया। इस संस्था ने गांव के लोगों और मछुआरों को सारी बातें समझाई। शुरुआत में यह सब उनके लिए जरा मुश्किल था। कोई भी गोताखोर उनके शोध के लिए गंगा में गोता लगाने को तैयार नहीं था। 'कई बार हमें ऐसे बदमाश भी मिले जो हमें लूटना चाहते थे, लेकिन जब हमने उनसे अपने मिशन के बारे में बताय तो उन्होंने हमें छोड़ दिया। एक बार तो एक बदमाश हमें गोली मार दी होती, लेकिन अंतिम क्षण में उसने मुझे सिर्फ लूट कर छोड़ दिया।’

यह प्रोफेसर सिन्हा की मेहनत ही है कि भारत सरकार ने डॉलफिन को पानी का राष्ट्रीय जानवर घोषित किया है। प्रोफेसर सिन्हा मानते हैं कि सरकार डॉलफिन को बचाने के लिए कदम उठा रही है। फिर वे कहते हैं कि इतना ही काफी नहीं है, हमें डॉलफिन को बचाने के लिए भी 'सेव टाइगर’ जैसा कोई ठोस कदम उठाना होगा।  

द वल्र्ड वाइड फंड (डब्ल्युडब्ल्युएफ) ने भी गंगा में डॉलफिन को बचाने के लिए कई कदम उठाए हैं। ये संस्था 1997 से ही इस काम में जुटी हुई है। लोगों को जागरुक बनाने के साथ-साथ गंगा के किनारों पर जंगल बढ़ाने और गंगा में मछली पकडऩे पर रोक लगाने जैसे काम ये कर रही

है। डब्ल्यूडब्ल्यूएफ देश के दूसरे हिस्से में भी डॉलफिन

की भलाई के लिए काम कर रही है। डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के मुताबिक प्रदूषण भी इन डॉलफिन की घटती संख्या के लिए काफी जिम्मेदार है। एक तो ये बहुत थोड़ी-सी बची हैं और अगर इसी तरह चलता रहा तो वो दिन दूर नहीं जब ये पूरी तरह से खत्म हो जाएंगी।



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