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बुधवार, 18 जुलाई 2018

डॉ. सुधीर शुक्ल चिट्ठी से बनी सड़क

गांव की जिस सड़क के लिए लोग दस साल से संघर्षरत थे, उसे विदेश में रहने वाले एक प्रोफेसर ने पीएमओ को चिट्ठी लिखकर साकार कर दिखाया

आपकी एक जागरूक पहल कैसे एक बड़ी कामयाबी बनती है, इसकी मिसाल पेश की है ओमान में रहने वाले डॉ. सुधीर शुक्ल ने। सतना जिले की जिस जर्जर सड़क के लिए गांव वाले दस सालों से संघर्षरत थे, वो सड़क अब डॉ. सुधीर शुक्ल के प्रयासों से बननी शुरू हो गई है। डॉ. शुक्ल ओमान से छुट्टियां मनाने थोड़े दिन के लिए अपने गांव आए हुए थे, यहां जब उन्होंने यहां की जर्जर सड़क की वजह से ग्रामवासियों को होने वाली परेशानियों को देखा तो उन्हें बेहद तकलीफ हुई। उन्होंने पीएमओ को एक चिट्ठी लिखी और ग्रामवासियों की तकलीफों से अवगत कराया। पीएमओ ने कुछ ही दिनों में पक्की सड़क की मंजूरी दे दी। डॉ. शुक्ल अपने इस प्रशंसनीय कदम की वजह से पूरे गांव की नज़र में हीरो बन गए।

डॉ. सुधीर शुक्ल अपना अनुभव साझा करते हुए काफी उत्साहित नज़र आए। डॉ. सुधीर कहते हैं, 'उनके गांव के चारों तरफ लगभग सभी गांव पक्की सड़कों से जुड़े हुए हैं। सिर्फ उनका ही गांव ऐसा था, जो सड़क से वंचित था। कच्ची सड़क होने के कारण बरसात आते ही गांव जाने का पूरा रस्ता बंद हो जाता था। बरसात के दिनों में अगर कोई बीमार हो जाए या फिर गर्भवती महिलाओं को खासा परेशानियों का समाना करना पड़ रहा था।,

दो साल पहले डॉ. शुक्ल के नेतृत्व में गांव वालों ने चंदा इकठ्ठा कर सड़क की मरम्मत भी करवाई, लेकिन बरसात आते ही सड़क जस की तस हो गई। पिछले दस सालों से कई बार यह खबर आई कि सड़क मंजूर हो गई, लेकिन ऐसा होता नहीं था। गांव वालों में खुशी की एक लहर दौड़ती और वे फिर उदास हो जाते। फिर डॉ. शुक्ल, जो ओमान में प्राध्यापक के पद पर कार्यरत हैं, इस बार गर्मी की छुट्टियों में गांव गए और गांव की हालात देख कर बहुत परेशान हुए। दूसरा कोई विकल्प कारगर न होते देख डॉ. शुक्ल ने 'केंद्रीकृत लोक शिकायत निवारण और निगरानी प्रणाली,, भारत सरकार को गांव की समस्या का विस्तारपूर्वक वर्णन करते हुए तीन महीने पहले सड़क की मांग करते हुए एक  पत्र लिखा और कुछ दिन पहले ही संबंधित विभाग से सूचना मिली कि उनके गांव करही खुर्द से करही कला तक की सड़क प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत स्वीकृत हो गई है।

गांव की दूसरी समस्याओं पर बात करते हुए डॉ. शुक्ल कहते हैं,'मेरे गांव में अभी भी मूलभूत सुविधाओं जैसे प्राथमिक चिकित्सालय, अच्छे विद्यालय की कमी है। मेरी समझ में देश के ज्यादातर गांवों का हाल आमतौर पर ऐसा ही है। अच्छी योजनाएं तो आती हैं पर उनका कार्यान्वयन सही ढंग से नहीं होता है। उसकी एक वजह है यह भी है, कि लोग जागरूक नहीं हैं। अगर हमें सरकारी योजनाओं की सही जानकारी हो और सवाल करने की हिम्मत तो हर गांव की तस्वीर बदल सकती है।

डॉ. सुधीर शुक्ल उन तमाम युवाओं के लिए एक बड़ा उदाहरण हैं, जो विदेशों में रह रहे हैं। देश छोड़ कर विदेश जाने वाला युवा यदि डॉ. शुक्ल की तरह अपने गांव की मिट्टी को न भूले तो सचमुच देश की तस्वीर बदलने में देर नहीं लगेगी।



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