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बुधवार, 12 दिसंबर 2018

जेब नहीं, पेट भरने वाला बैंक

रोटी बैंक! दुनिया का एक ऐसा अनोखा बैंक, जहां नोटों से जेब नहीं, रोटी से पेट भरा जाता है। न धर्म, न जाति, न ऊंच और न नीच। भूख और रोटी के बीच इस बैंक में कोई फर्क नहीं किया जाता। आपस में मिल-बांट कर खाने की परंपरा का ही नाम है-'रोटी बैंक’

आंखों में रोशनी नहीं है, जो दुनिया को देख सके, लेकिन भूख दिखाई नहीं देती, चेहरे से झलकती है। पेट की आग बगैर रोटी के बुझती नहीं। कोई कुछ दे देता है तो खा लेती है। नहीं तो कई दिनों तक ऐसे ही भूखी-प्यासी रहती है। गरीबी ने स्कूल का मुंह नहीं देखने दिया। ऐसे में पेट पालने के लिए सिर्फ एक ही सहारा है-भीख मांगना। वो भी वैसे इलाके में, जो भुखमरी के लिए पूरी दुनिया में बदनाम है। ऐसे में हर दिन दो जून की रोटी मयस्सर होना किसी सपने से कम नहीं। यह कहानी है, महोबा की चंदाबाई की। गरीबी और लाचारी के कारण बचपन से ही भूख के अभिशाप को झेलने वाली चंदाबाई के लिए पहले हर दिन की यही कहानी थी। हर दिन सुबह से शाम तक एक निवाले के लिए जद्दोजहद। दर-दर की ठोकरें, लोगों के ताने, दर्द और तकलीफ, लेकिन अब उसे खाने के लिए दर-दर की ठोकरें नहीं खानी पड़ती और न ही भूखे पेट सोने की कोई मजबूरी है। हर दिन सुबह और शाम उसके दर पर रोटी खुद ब खुद आ जाती है। अब उसके पेट में अन्न का दाना है और चेहरे पर खुशी।

महोबा के बुजुर्ग रामप्रसाद की कहानी भी काफी हद तक चंदाबाई जैसी ही थी। पत्नी के मृत्यु के बाद घर में अकेले बचे रामप्रसाद के पास कमाई का कोई जरिया नहीं था और न खाने का कोई जुगाड़। न कोई देखने वाला और न ही कोई पूछने वाला। जीवन के चौथेपन में कहीं भीख मांगकर भी खाना जुटाने की हिम्मत भी नहीं बची, लेकिन अब उनके जीवन में एक नया सवेरा हुआ है। अब न तो उन्हें खाने की चिंता है, न ही अपनेपन की कमी। हर दिन उन्हें दो जून की रोटी नसीब हो रही है और साथ में प्यार से खिलाने वालों से अपनेपन का अहसास भी।

बेसहारों का बना सहारा

सिर्फ चंदाबाई या रामप्रसाद ही नहीं उनके जैसे हजारों बेसहारा, जरूरतमंद और भूखे महोबा वासियों को अब मुफ्त में हर दिन दो जून की रोटी नसीब हो रही है। इन भूखे और जरूरतमंद लोगों को हर दिन मिलने वाला रोटी का निवाला किसी वरदान से कम नहीं है। इन लोगों के जीवन में यह नया सवेरा रोटी बैंक की वजह से आया है। दो वक्त की रोटी के लिए इंसान क्या नहीं करता। मेहनत की भ_ी में खुद को झोंककर दिन-रात तपता है। मेहनत-मजदूरी करता है। अगर कोई लाचार हो तो कहीं से भीख मांगकर गुजारा करता है। तब जाकर कहीं रोटी का एक अदद निवाला मिलता है। लेकिन रोटी बैंक ने भूखे और जररूतमंदों के जीवन की राह को इतना आसान बना दिया है, जितना पहले आासान नहीं था।

अनोखा रोटी बैंक

रोटी बैंक! यह दुनिया का एक ऐसा अनोखा बैंक हैं, जहां हिंदू मुसलमान के लिए, मुसलमान हिंदू के लिए, दलित  ब्राह्मïण के लिए और ब्राह्मïण महादलित के लिए रोटी बनाता है और उसे खिलाता है। यहां लोगों के मजहब अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन धर्म सिर्फ एक है, गरीबों की सेवा करना। रोटी बैंक का सिर्फ एक ही मकसद है-न कोई भूखा रहे और न कोई भूखा सोए।

भुखमरी ने किया प्रेरित

न कोई भूखा रहे और न कोई भूखा सोए, इसकी कल्पना उस बुंदेलखंड के लिए की गई, जो भुखमरी के लिए देश-दुनिया में बदनाम है। बुंदेलखंड के महोबा जिले में गरीबी और भूख की वजह से कई मौतें हो चुकी हैं। बेसहारा, अनाथ और शारीरिक रूप से कमजोर लोग भीख मांगकर अपना पेट भरने को मजबूर थे। इसीलिए सामाजिक कार्यकर्ता तारा पाटकर, हाजी मुट्टन, फादर लाभान और बुंदेली समाज संगठन के कुछ लोगों ने मिलकर एक कदम बढ़ाया। सरकार और सिस्टम को कोसने के बजाए खुद से एक पहल की और 15 अप्रैल 2015 को 'रोटी बैंकÓ की स्थापना की। महोबा के 10 घरों और चंद लोगों के जरिए शुरू हुआ यह मुहिम आज देश के कई हिस्सों तक पहुंच चुका है। आज ये लोग अपनी मेहनत और ईमानदारी के दम पर हजारों भूखे को हर दिन दो वक्तकी रोटी मुहैया करा रहे हैं।

हर घर से दो रोटी

शाम होते ही महोबा की गलियों में कुछ युवा थैला लिए और आवाज़ लगाते दिख जाते हैं। घर के दरवाजे पर 'रोटी बैंक-रोटी बैंकÓ की आवाज़ लगाते हैं। घर का दरवाजा खुलता है। घर चाहे किसी का हो। हिन्दू का या मुस्लिम का, सिख या ईसाई, उच्च संभ्रांत ब्राह्मण या महादलित, रिक्शे वाले, ठेले वाले या किसी दिहाड़ी मजदूर का। अमीर, गरीब, हर जाति-धर्म के लोग। हर घर से लोग बाहर निकलकर खुशी के साथ दो रोटी की किस्त इनकी थैलियों में डाल देते हैं। इसके अलावा शहर में 21 जगहों पर रोटी बैंक के बॉक्स लगे हुए हैं। यहां पर लोग खुद जाकर भी इनमें सुबह-शाम रोटियां जमा कर आते हैं।

ढूंढ़-ढूंढ़ कर खिलाते हैं रोटी

रोटी बैंक में रोटी इक_ी होने के बाद उसे चेक किया जाता है कि खाना ताजा है या नहीं। क्योंकि रोटी बैंक किसी को भी बासी खाना नहीं खिलाता। अगर उसमें कुछ बासी खाना हो तो उसे गाय या अन्य जानवरों के खाने के लिए अलग कर दिया जाता है। ताजी रोटियों को इक_ा करने के बाद उसकी रजिस्टर में एंट्री की जाती है। फिर रोटी और सब्जी को पेपर में पैक किया जाता है। एक बार खाना पैक होने के बाद रोटी बैंक के स्वयंसेवक बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन, फुटपाथ, कचहरी और अन्य जगहों पर भूखे-जरूरमंदों को खाने का पैकेट देने के लिए निकल पड़ते हैं। सड़क किनारे व अन्य जगहों पर रहने वाले असहाय, लाचार लोगों के साथ-साथ रोटी बैंक के कार्यकर्ता वैसे बुजुर्गों को भी जा कर खाना खिलाते हैं, जिनके घर में कोई नहीं है। इसके साथ ही रोटी बैंक के दफ्तर में सुबह 10 बजे से रात 8 बजे तक कोई भी जरूरतमंद जाकर मुफ्त खाना ले सकता है। इन समर्पित समाज सेवकों की पहल से आज इस इलाके में कोई भूखा नहीं सोता। जो काम सिस्टम नहीं कर पाया। उसे समाज के चंद लोगों ने अपनी मेहनत और ईमानदारी से पूरा कर दिखाया। कल तक भुखमरी के लिए बदनाम बुंदेलखंड आज देश-दुनिया के लाखों लोगों के लिए प्रेरणा स्त्रोत बन गया है।

देश में 100 से ज्यादा रोटी बैंक

महोबा में शुरू किए गए दुनिया की पहले रोटी बैंक से प्रेरणा लेकर अब तक देश के कई शहरों में रोटी बैंक शुरू हुआ है। महोबा के बाद इंदौर, दिल्ली, बेंगलुरु, हैदराबाद, लखनऊ, आगरा, हमरीपुर, औरई, गोरखपुर, हजारीबाग, औरंगाबाद समेत देश के 100 से ज्यादा शहरों में रोटी बैंक खोले गए हैं।

मिसाल बना रोटी बैंक

भुखमरी की समस्या पर नोबल विजेता अमत्र्य सेन ने कहा था, लोग भूखे इसीलिए नहीं मर रहे हैं कि दुनिया में खाद्यानों की कमी है, इसके पीछे का कारण खाद्यानों का असमान वितरण है रोटी बैंक एक तरह से इसी असमानता को दूर करने का एक छोटा-सा प्रयास है। मेट्रो सिटी के बड़े-बड़े होटलों में रोजाना हजारों लोगों का खाना फेंका जाता है। हर दिन देशभर में इतना अधिक खाना बर्बाद हो रहा है। अगर रोटी बैंक के स्वयंसेवकों की तरह हर शहर, हर गली, हर मुहल्ले के लोग कुछ समय निकालकर इस पहल में सहयोग करें तो निश्चित रूप से न तो भोजन की बर्बादी होगी और न ही कोई भूखा रहेगा।



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