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रविवार, 18 नवंबर 2018

बिहार का पहला सोलर गांव

चार दशक पहले तक जो गांव अंधेरे में डूबा था आज सौर ऊर्जा की बदौलत रोशनी में नहा रहा है। गांव चार टोलों में बंटा है। मुख्य सड़क से गांव के अंतिम छोर तक हर टोले की हर गली-रास्ते में सोलर लाइट के 40 खंभों पर ट्यूब लाइटें टंगी हुई हैं। शाम होते ही गांव दुधिया रोशनी से नहा उठता है

क्या किसी पंचायत की इतनी हैसियत हो सकती है कि वह सूबे के मुख्यमंत्री से सीधे यह मांग करे कि इलाके के बच्चों के खेलने के लिए उन्हें खेल का मैदान नहीं, बल्कि एक बड़ा स्टेडियम चाहिए, पर यह सच है। बता दें कि धरनई वह गांव है जिसने अंधेरे के खिलाफ अपने तरीके से एक बड़ी जंग जीतकर देश-दुनिया में बड़ा यश कमाया है। यह पूरा गांव सौर ऊर्जा से जगमग है और यह अपने तरह का देश का पहला मॉडल गांव है। यही कारण है कि आज प्रदेश सरकार भी ग्रामीण स्तर पर विकास का कोई नया अभियान शुरू करती है तो या तो धरनई उसकी पहली प्रयोगस्थली बनती है या फिर यहां हुए काम से प्रेरित होकर सरकार पूरे सूबे के लिए योजना बनती है। इस यशकीर्ति का ही नतीजा है कि पिछले दिनों जब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जहानाबाद जिले के मखदुम प्रखंड के धरनई पंचायत का दौरा किया, तो वह दिलचस्प दृश्य देखने को मिला, जिसमें मुख्यमंत्री के सामने स्थानीय मुखिया अजय यादव ने कई सुविधाएं मुहैया कराने की मांग रखी। इसमें सबसे अहम थी, स्टेडियम का निर्माण और बराबर रेलवे हॉल्ट को स्टेशन का दर्जा  देने की मांग। गौरतलब है कि सूबे के मुखिया नीतीश कुमार इन दिनों अपने सात निश्चय को पूरा करने के लिए बिहार के अलग-अलग जिलों के दौरे पर हैं। इसी सिलसिले में वे धरनई पहुंचेे थे। बताया जाता है कि धरनई चूंकि प्रदेश सरकर के लिए आदर्श पंचायत का एक बेहतर मॉडल है, इसीलिए नीतीश कुमार पंचायत की इस मांग को गंभीरता से ले रहे हैं। लिहाजा, कल को अगर धरनई में बने स्टेडियम में आपको किसी राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट होने की खबर मिले तो आपको हैरत नहीं होनी चाहिए।  

 

सोलर लाइट से जगमग गांव

धरनई बिहार का पहला ऐसा गांव है, जिसने ऊर्जा के लिए सौर तकनीक को व्यापकता के साथ अपनाया है। आज की तारीख में इस गांव के पास अपना पावर ग्रिड है। गांव के हर रास्ते और गली में थोड़ी-थोड़ी दूर पर सोलर लाइट के खंभे हैं। उन पर दुधिया रोशनी देने वाली लाइट लगी हैं। यहां 100 किलोवाट पावर का उत्पादन सौर ऊर्जा से हो रहा है। 70 किलोवाट बिजली लोगों के घरेलू उपयोग के लिए और 30 किलोवाट सिंचाई के लिए तय है। इतने बड़े पैमाने पर सौर ऊर्जा के उत्पादन वाला यह पहला गांव है। यह भारत का पहला गांव है, जहां 24 घंटे सौर ऊर्जा से बिजली मिलती है।

गांव को चार कलस्टर विशुनपुर, धरनई, धरमती और डिटकोरिया में बांटकर चार सोलर माइक्रो ग्रिड पावर स्टेशन लगाए गए हैं। पिछले कुछ माह से यहां बिजली का उत्पादन, वितरण और उपयोग हो रहा है। यह प्रयोग सफल है। जल्द ही इसे कलस्टर स्तर पर गठित ग्राम समितियों को सौंप दिया जाएगा।

अब भी इसकी देख-रेख का काम ग्राम समितियां ही कर रही हैं, लेकिन तकनीकी रूप से हस्तांतरण नहीं हुआ है। बिहार के लिए यह एक पायलट प्रोजेक्ट है। यह प्लांट पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था ग्रीनपीस ने तैयार किया है।

इस पर करीब सवा दो करोड़ की लागत आई है। अब इसे राज्य के दूसरे वैसे गांवों में लगाने का राज्य सरकार को प्रस्ताव दिया जाना है, जहां अब तक बिजली नहीं पहुंची है या बिजली की आधारभूत संरचना किसी कारण से नष्ट हो चुकी है।

 

35 साल बाद हुआ रोशन हुआ गांव

धरनई बिहार में जहानाबाद जिले के मखदुमपुर प्रखंड में पड़ता है। यह राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या-83 पर पटना-गया मुख्य सड़क के ठीक बगल में बसा हुआ है। इसकी दूसरी तरफ बराबर रेलवे हॉल्ट है। बराबर की पहाडिय़ां दुनिया भर में मशहूर हैं। इसके बाद भी इस गांव में 35 सालों से बिजली नहीं थी। चार दशक पहले यहां बिजली आई थी, लेकिन कुछ ही साल में यह व्यवस्था पूरी तरफ चौपट हो गई। गांव में बिजली के खंभे भी थे, लेकिन न तो उनके सिरों से गुजरता तार है, न ट्रांसफॉर्मर। गांव के बुजुर्ग उसे याद करते हैं। युवा पीढ़ी बिजली की बस कहानी सुनते रहे। यहां कई ऐसी औरतें और लड़कियां हैं, जिन्होंने बिजली से जलता बल्ब और घूमता पंखा नहीं देखा था। यहां कुछ संपन्न परिवार जरूर हैं और उन्होंने वैकिल्पक ऊर्जा के लिए अपने घरों में सोलर प्लेट लगा रखी थी, पर यह पूरे गांव की सच्चाई बनने में वक्त लगा। दशकों तक यहां आलम यही रहा कि ज्यादातर परिवार अंधेरे में रात बिताते थे। शाम होते ही पूरे गांव में अंधेरा पसर जाता था।

 

रोशनी से नहाई रात

सौर ऊर्जा की बदौलत अब यह गांव रात भर जगमग रोशनी में नहा रहा है। गांव चार टोलों में बंटा है। मुख्य सड़क से गांव के अंतिम छोर तक हर टोले के हर गली-रास्ते में सोलर लाइट के 40 खंभों पर ट्यूब लाइट लगी हुई हैं। शाम होते ही गांव दुधिया रोशनी से नहा उठता है। गांव में कुल 450 घर हैं। इन सभी घरों को बिजली देने का प्रस्ताव है। अभी 300 घरों को बिजली मिली है। लोग बल्ब जलाने के साथ-साथ बिजली के पंखे भी चला रहे और मोबाइल चार्ज कर रहे हैं। पहले मोबाइल चार्ज कराने उन्हें दूसरे गांव या बाजार जाना होता था। जब भीषण गर्मी पड़ रही थी, तब इस गांव के लोगों ने 24-24 घंटे बिजली के पंखे चलाए थे। अनुसूचित जनजातियों के टोले में 75 घर हैं। वहां अब तक 44 घरों में कनेक्शन दिया गया है। गांव में छोटे-बड़े दो सौ से अधिक किसान हैं, जो डीजल से खेती करते हैं। गांव में थ्री-एचपी के दस सोलर पंप लगाने की योजना है। अब तक दो-तीन पंप लग चुके हैं, जिसका उपयोग गांव के लोग सिंचाई और नहाने-धोने में कर रहे हैं।

 

धरनई मॉडल की खूबी

धरनई प्रोजेक्ट की कई खासियत हैं। पहली खासियत तो यही कि इसमें जमीन का इस्तेमाल नहीं किया गया है। सभी फोटो वोल्टैक (सोलर प्लेट) मकानों की छातों पर लगे गए हैं। इससे गांव की जमीन बेकार नहीं हुई है। दूसरी कि यहां 100 किलोवाट क्षमता का प्लांट है। दिलचस्प है कि पंचायत में सोलर प्रोजेक्ट के लिए कोई भवन नहीं बनाया गया है। किसान प्रशिक्षण भवन, सामुदायिक भवन और पैक्स भवन के एक-एक कमरे और उनकी छतों का ही इस्तेमाल हुआ है। इसमें समुदाय की भागीदारी अधिक है और अंतिम रूप से इसका संचालन गांव के लोगों को ही समिति बना कर करना है। प्रोजेक्ट की 30 प्रतिशत ऊर्जा खेती के लिए सुरक्षित की गई है। इसके लिए अलग से ग्रिड स्टेशन की व्यवस्था है।



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