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सोमवार, 23 जुलाई 2018

केसरिया महानायक

विपक्षी पार्टियां जहां सोचना बंद कर देती हैं। अमित शाह ठीक वहीं से अपनी रणनीति बनाना शुरू करते हैं। यही वजह है कि चुनाव-दर-चुनाव विपक्षी पार्टियों को लगातार पराजय का सामना करना पड़ता है

बातें कम, काम ज्यादा-यही है भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की खासियत। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने से पहले ही उनके खाते में महत्त्वपूर्ण उपलब्धियां दर्ज हो चुकी थीं। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को मिली अप्रत्याशित जीत में अमित शाह की अहम भूमिका रही थी। लोकसभा चुनाव के दौरान वे उत्तर प्रदेश के प्रभारी थे। अपना दल के साथ गठबंधन कर पार्टी ने प्रदेश में 80 में से 71 सीटें झटक ली।

अमित शाह के पार्टी अध्यक्ष बनने के बाद भाजपा ने उनके नेतृत्व में सात विधानसभा चुनावों में से चार में जीत दर्ज की है। इनमें से चार राज्यों-झारखंड, असम, महाराष्ट्र और हरियाणा-में पार्टी ने अपने बलबूते सरकार बनाई, जबकि जम्मू-कश्मीर में पीडीपी के साथ गठबंधन सरकार में शामिल हुई। मुख्यमंत्री पीडीपी का है, तो उप मुख्यमंत्री भाजपा का। खास बात यह है कि इसके पहले भाजपा जम्मू-कश्मीर में सरकार का कभी हिस्सा नहीं रही है। असम, महाराष्ट्र और हरियाणा में भी अपने बूते कभी सरकार बनाने में सफल नहीं रही। अमित शाह के नेतृत्त्व में भाजपा ने महाराष्ट्र में शिव सेना के साथ 25 साल पुराना गठबंधन तोड़ कर अकेले चुनाव लड़ा और अपनी अहमियत साबित की।  

जिन दो राज्यों में भाजपा को जीत नहीं मिली, वे बिहार और दिल्ली हैं। यह सही है कि भाजपा इन राज्यों में अपनी सरकार बनाने में विफल रही, लेकिन उसका जनाधार उसके साथ बना रहा। बिहार में भाजपा को 2010 के विधानसभा चुनाव में 16.5 प्रतिशत मत मिले थे, लेकिन अमित शाह के करिश्माई नेतृत्व में 2016 के विधानसभा चुनाव में पार्टी के वोट में आठ प्रतिशत इजाफा हुआ। यानी उसे 24.4 प्रतिशत वोट मिले। भाजपा को यहां जदयू, राजद और कांग्रेस के महागठबंधन का सामना करना पड़ा था। कुछ इसी तरह की कहानी दिल्ली में दोहराई गई। यहां लोकसभा चुनाव में सातों सीटों पर भाजपा के हाथों भारी पराजय का सामना करने के बाद अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने अपने को नये सिरे से संगठित किया और ऐसा माहौल बनाया कि जनता ने उसे 2015 के विधान सभा चुनाव में 70 में से 67 सीटें थमा दीं। लेकिन भाजपा के मत प्रतिशत में एक प्रतिशत की भी गिरावट नहीं आई, जिस पर मुख्यधारा की मीडिया ने ध्यान नहीं दिया। 2013 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को 33 प्रतिशत वोट मिले थे, जबकि 2015 के विधानसभा चुनाव में 32.2 प्रतिशत।

ऐसी उपलब्धियां आसानी से हासिल नहीं की जातीं। शाह एक पूर्णकालिक राजनीतिज्ञ हैं, जिनके पास राजनीति के सिवाए अपने लिए समय कम होता है। उनका सोना और जगना राजनीति के साथ ही होता है। वे खाते-पीते, चलते-फिरते राजनीति की ही चर्चा करते हैं। प्राचीन काल से ही देशाटन ज्ञान का जरिया रहा है। उसी तर्ज पर अमित शाह देश में चारों तरफ  यात्रा करते रहते हैं, पार्टी के लिए कार्यक्रम का आयोजन करते हैं, कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हैं और उन्हें प्रोत्साहित करते हैं। शाह प्रतिदिन औसतन 495 किमी यात्रा करते हैं यानी अपने 29 महीने के कार्यकाल में 4,28,950 किमी की यात्रा कर चुके हैं।

अपने नेता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरह शाह संयमित स्वभाव के व्यक्ति हैं। वे सादा गुजराती भोजन करना पसंद करते हैं। यही नहीं, चार्टर्ड विमान से भी यात्रा नहीं करते। चुनाव को छोड़ दिया जाए, तो वे अपने पार्टी पदाधिकारियों को निजी विमान से यात्रा करने की सलाह नहीं देते। वे खुद नियमित उड़ान से ही यात्रा करते हैं। वे महंगे होटल में नहीं ठहरते। साधारण राजकीय अतिथि गृह में विश्राम करना वे पसंद करते हैं। ऐसा वे खुद तो करते ही हैं, अपने पार्टी पदाधिकारियों को भी इसके लिए प्रोत्साहित करते हैं। इसके अलावा उन्होंने पार्टी में एक और पहल की है और वह यह है कि पार्टी कार्य के लिए बाहर जाने पर संबंधित शहर में ही रात में विश्राम करना। यह अकारण नहीं है। इससे उन्हें स्थानीय कार्यकर्ताओं से विस्तृत बातचीत करने का मौका मिलता है, जिससे स्थानीय राजनीतिक परिस्थितियों की समझ बनती है। अपनी संपूर्ण यात्राओं में करीब 80 प्रतिशत बार वे संबंधित शहर में रात्रि विश्राम किए।

शाह के इन अथक प्रयासों की अभिव्यक्ति पार्टी के चतुर्दिक विस्तार में दिखाई पड़ रही है। अपने ढाई वर्ष के अध्यक्षीय कार्यकाल में अमित शाह ने भाजपा की सदस्यता में पांच गुना वृद्धि की है-2.47 करोड़ से 12 करोड़। अगर एक परिवार में औसतन पांच सदस्य मान लिया जाए, तो माना जा सकता है कि 60 करोड़ लोग यानी देश की करीब आधी आबादी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से भाजपा के प्रभाव में है। उन्होंने ओडिशा, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, आंध प्रदेश, केरल, तेलंगाना और उत्तर-पूर्व के राज्यों पर विशेष ध्यान दिया है, जहां भाजपा परंपरागत तौर पर मजबूत नहीं है। इसके नतीजे असम और अरुणाचल प्रदेश में दिखाई पडऩे लगे हैं। पश्चिम बंगाल में भाजपा मजबूती से उभरी है। पश्चिम बंगाल समेत अन्य राज्यों के स्थानीय निकाय चुनावों में पार्टी ने अच्छा प्रदर्शन किया है।

अब अमित शाह अगले साल फरवरी-मार्च में लड़ी जाने वाली लड़ाई की तैयारी में हैं। अगले साल पांच राज्यों-उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, मणिपुर और गोवा-में विधान सभा चुनाव होने वाले हैं। इनमें से कुछ राज्यों, खासकर उत्तर प्रदेश में भाजपा के सामने अच्छा प्रदर्शन करने की चुनौती है।

हाईलाइटस

शाह एक पूर्णकालिक राजनीतिज्ञ हैं, जिनके पास राजनीति के सिवाय अपने लिए समय कम होता है। उनका सोना और जगना राजनीति के साथ ही होता है

हाईलाइटस

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरह शाह संयमित स्वभाव के व्यक्ति हैं। वे सादा गुजराती भोजन करना

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