sulabh swatchh bharat

सोमवार, 23 जुलाई 2018

शौचालय, सफाई और सेहत

देवालय से पहले शौचालय। स्वच्छता के प्रति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस सोच से देशकी तस्वीर बदलती जा रही है। शौचालय निर्माण अब सरकारी फाइलों से निकल कर विशाल जन अभियान बन गया है

क्या शौचालय किसी नेताजी की कुर्सी छीन सकता है? क्या शौचालय की वजह से किसी की नौकरी जा सकती हैं? क्या शौचालय की वजह से शादियां टूट सकती है? क्या शौचालय निर्माण के लिए प्रधानमंत्री किसी का चरण-स्पर्श करेंगे? क्या शौचालय निर्माण के लिए किसी को सम्मानित किया सा सकता है? इन बातों पर यकीन कर पाना हर किसी के लिए आसान नहीं है। लेकिन हकीकत में ऐसा हो रहा है। पिछले कुछ महीनों में शौचालय निर्माण में ऐसी क्रांति आई है कि आज देश में हर किसी की चर्चा में यह शामिल है।

पिछले दिनों मध्य प्रदेश के बैतूल में होने वाले पंचायत उपचुनाव में एक अभ्यर्थी का नामांकन पत्र केवल इस आधार पर निरस्त कर दिया गया क्योंकि उसके घर में शौचालय नहीं था। बैतूल के रामपुरमाल गांव निवासी संतोष पंद्राम के घर में शौचालय नहीं होने की वजह से पंचायत सदस्य पद के लिए किया गया उनका नामांकन पत्र खारिज कर दिया गया। दरअसल, पंचायत एवं ग्राम स्वराज अधिनियम 2016 में उपबंध किया गया है कि जिसके घर शौचालय नहीं होगा वह चुनाव लडऩे के लिए पात्र नहीं होगा। देश के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है कि शौचालय के अभाव में कोई अभ्यर्थी चुनाव लडऩे से अयोग्य करार दिया गया। इतना ही नहीं झारखंड सरकार ने शौचालय नहीं बनाने पर सरकारी कर्मचारियों को नौकरी से निलंबित करने का फरमान जारी कर दिया है। झारखंड के मुख्य सचिव ने निर्देश जारी की है कि 10 जनवरी 2017 तक अगर राज्य सरकार के कर्मचारियों ने अपने घरों में शौचालय का निर्माण नहीं कराया तो उन्हें निलंबित कर दिया जाएगा।

पिछले साल शौचालय से जुड़ी कुछ ऐसी ही रोचक खबर मध्य प्रदेश से भी आई थी। अप्रैल 2016 में मध्य प्रदेश के सिहोर के सूरज सिंह गुर्जर को हेलिकॉप्टर से बारात ले जाने की अनुमति केवल इसीलिए नहीं दी गई क्योंकि उसके घर में शौचालय नहीं था। प्रशासन ने सख्ती से कहा, 'पहले शौचालय बनाओ फिर हेलिकॉप्टर से बहू लाओ।      हाल के दिनों में लखनऊ की नेहा समेत देश की कई लड़कियों ने ससुराल में शौचालय नहीं होने पर शादी से इंकार कर एक नई मिसाल पेश की है। मध्य प्रदेश के कई पंचायतों समेत देश के कई हिस्सों में खुले में शौच जाने वालों के खिलाफ जुर्माने का प्रावधान किया जा रहा है। वहीं कई जगहों पर घरों में शौचालय नहीं होने पर सरकारी योजनाओं से वंचित भी किया जा रहा है। 'जहां सोच वहां शौचालय     , इसी सोच के दम पर छत्तीसगढ़ के एक छोटे से गांव में रहने वाली 104 साल की कुंवरबाई ने अपनी आजीविका का साधन बकरियों को बेचकर शौचालय का निर्माण कराया। उनकी इस पहल से प्रभावित होकर प्रधानमंत्री मोदी ने न केवल उनका सम्मान किया बल्कि उनके चरण स्पर्श भी किए। कुंवरबाई की सोच न केवल स्वच्छता के लिए एक मिसाल है, बल्कि खुले में शौच जाने वाले लाखों लोगों के लिए प्रेरणा का स्त्रोत भी है। शौचालय निर्माण की वजह से कुंवरबाई स्वच्छता के लिए आदर्श बन गईं।

आज हर दिन देश के किसी न किसी हिस्से से शौचालय से संबंधित खबरें प्रमुखता से आ रही हैं। कल तक घर के किसी कोने में गुमनामी की जिंदगी जी रहा वाला शौचालय आज किसी बड़े सेलिब्रिटी की तरह चर्चा का केंद्र बिन्दु बन गया है। इसकी वजह शौचालय के प्रति हमारी सांस्कृतिक समझ में निहित है। सरकार और प्रशासन के साथ-साथ आम लोगों के लिए सबसे प्रमुख प्राथमिकता में शामिल हो गया है शौचालय निर्माण। शौचालय की प्राथमिकता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि प्रधानमंत्री नरेंन्द्र मोदी ने 'देवालय से पहले शौचालय      को प्राथमिकता देने

की बात की है। शौचालय के प्रति यह व्यापक सोच प्रधानमंत्री मोदी द्वारा शुरू किए गए 'स्वच्छ भारत अभियान      से विकसित हुई है।

दो साल : ढाई करोड़ शौचालय

प्रधानमंत्री मोदी ने लाल किले की प्राचीर से अपने पहले संबोधन में 'स्वच्छ और सुंदर भारत      बनाने के महात्मा गांधी के सपने को साकार करने के लिए 'स्वच्छ भारत अभियान      का आह्वान किया था। 2019 में बापू की 150वीं जयंती तक देश को स्वच्छ और सुंदर बनाने के उद्देश्य से उन्होंने 2 अक्टूबर 2014 को इस अभियान की शुरुआत की। साफ-सफाई पर ध्यान देने के साथ-साथ सफाई के लिए सबसे जरूरी शौचालय निर्माण पर उन्होंने काफी जोर दिया। देश को खुले में शौच से मुक्ति दिलाने के इस अभियान के तहत 2019 तक देशभर में 12 करोड़ शौचालयों के निर्माण की योजना है। 1.96 लाख करोड़ रुपए की लागत वाली इस योजना में शौचालय को प्राथमिकता देने का ही नतीजा है कि इसके तहत महज दो साल में ही देशभर के ग्रामीण इलाकों में लगभग ढाई करोड़ से ज्यादा और शहरी इलाकों में 25 लाख से ज्यादा शौचालयों का निर्माण हुआ है। देश के एक लाख से ज्यादा गांव और 400 से ज्यादा शहरी इलाके पूरी तरह खुले में शौच की प्रथा से मुक्त हो चुके हैं।

तेज रफ्तार

हालांकि स्वच्छ भारत अभियान से पहले भी काफी लोगों के घरों में शौचालय हुआ करता था और सरकार की कई योजनाएं भी चल रही थीं। लेकिन पहले कभी ऐसा नहीं हुआ कि शौचालय निर्माण के लिए इतनी तेजी से काम हुआ हो। वर्ष 2001 में महज 22 फीसदी ग्रामीण परिवारों के घरों में शौचालय था। जबकि 2011 के जनगणना के अनुसार यह आंकड़ा दस साल में महज 10 फीसदी बढ़कर 32.70 फीसदी तक पहुंच पाया। शौचालय निर्माण के लिए पूर्ववर्ती सरकार ने 2005 में 'निर्मल ग्राम पुरस्कार      योजना और 2012 में 'निर्मल भारत अभियान      की शुरुआत की। लेकिन इन योजनाओं के बहुत सकारात्मक नतीजे देखने को नहीं मिले। पेयजल व स्वच्छता मंत्रालय के अनुसार ग्रामीण इलाकों में वर्ष 2012-13 के दौरान 46 लाख 72 हजार 235, वर्ष 2013-14 के दौरान 50 लाख 36 हजार 308 और वर्ष 2014-15 के दौरान (31 अक्टूबर 2014 तक) 13 लाख 82 हजार 420 शौचालय का ही निर्माण हो पाया। इन तीन वर्षों के दौरान महज 1 करोड़ 10 लाख 90 हजार 963 शौचालयों का निर्माण हो पाया। लेकिन 'स्वच्छ भारत मिशन      के तहत महज दो साल के भीतर ही ढाई करोड़ से ज्यादा शौचालयों का निर्माण हुआ है, जो पहले के तीन वर्षों की तुलना में दोगुना से भी ज्यादा है। स्वच्छ भारत अभियान के तहत सरकार-प्रशासन और आम लोगों के प्रयासों के साथ-साथ पहले के मुकाबले सहायता राशि बढ़ाने और सहायता राशि पाने की प्रक्रिया सरल बनाने से भी काम में तेजी आई है। पहले की योजनाओं में जहां ग्रामीण घरों में एक शौचालय निर्माण के लिए 9,000 रुपए दिए जाते थे, अब इस योजना के तहत 12,000 रुपए की सहायता राशि दी जा रही है और इसे पाने की प्रक्रिया भी आसान बना दी गई है।

बनेगा स्वच्छ-सुंदर भारत

शौचालय निर्माण की बेहतर पहल की वजह से ही सिक्किम, हिमाचल और केरल पूरी तरह से खुले में शौच मुक्त (ओडीएफ) राज्य बन गया है। मार्च 2017 तक हरियाणा, उत्तराखंड, गुजरात और पंजाब भी इस लक्ष्य को हासिल कर लेगा। अन्य राज्य भी इस तरफ तेजी से बढ़ रहे हैं। मिजोरम, मेघालय, मणिपुर में 80 फीसदी से ज्यादा शौचालय निर्माण का काम हो चुका है। जबकि  बंगाल, गोवा, त्रिपुरा और अरुणाचल प्रदेश में भी 70 से 79 फीसदी काम पूरा हो चुका है। उम्मीद है कि इस वर्ष देश के काफी राज्य 'ओडीएफ      के लक्ष्य को हासिल करने में सफल हो सकेंगे। 2014 में प्रधानमंत्री बनते ही नरेंद्र मोदी ने 2 अक्टूबर को महात्मा गांधी के सपने को साकार करने के लिए जिस 'स्वच्छ भारत अभियान      की शुरुआत की थी, आज वह कामयाबी की नई बुलंदियां छू रहा है। सरकार की पहल, प्रशासन के प्रयास और आम लोगों की जागरूकता की वजह से शौचालय निर्माण में तेजी आई है। प्रशासन की सख़्ती और पहल के साथ आमजनों (खासकर महिलाओं) में बढ़ रही जागरुकता स्वच्छ भारत अभियान के लक्ष्य को पूरा करने में बेहतर भूमिका निभा रहा है। शौचालय निर्माण की यही रफ्तार कायम रही तो 2019 तक देश को 'खुले में शौचमुक्त      बनाने का लक्ष्य आसानी से हासिल किया जा सकता है। 



Bringing smiles to every face hindi ad copy %281%29

ऑडियो