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मंगलवार, 25 जून 2019

साहिर लुधियानवी - अदबी और फिल्मी शायरी का साहिर

साहिर लुधियानवी की गिनती जहां उर्दू के तरक्की पसंद शायरों में सबसे ऊपर होती है, वहीं उनके लिखे फिल्मी गीतों ने भी कामयाबी की तारीख लिखी

साहिर लुधियानवी, वह जादूगर जो शब्दों को इस तरह से लिखता था, पिरोता था कि वह सीधे दिल में उतर जाते थे। साहिर फिल्म इंडस्ट्री से करीब तीन दशक तक जुड़े रहे। इस दौरान उन्होंने सैकड़ों मशहूर गीत लिखे, जो आज भी लोगों के दिलों पर राज कर रहे हैं। आपके कुछ गाने तो इस कदर मशहूर हुए कि उन्हें आज भी गया और गुनगुनाया जाता है। वैसे भी पुराने गीतों की बात ही कुछ और है।
साहिर का जन्म मुस्लिम गुज्जर परिवार में आठ मार्च, 1921 को लुधियाना, पंजाब में हुआ| उनका बचपन का नाम अब्दुल हई था। 1934 में जब वे महज 13 वर्ष के थे तब पिता ने दूसरी शादी कर ली। तब उनका मां ने एक बड़ा कदम उठाकर अपने पति को छोड़ने का फैसला किया साहिर अपनी मां के साथ रहे।
बचपन में एक बार एक मौलवी ने कहा कि यह बच्चा बहुत होशियार और अच्छा इंसान बनेगा। यह सुनकर मां के मन में सपने जन्म लेने लगे कि वह अपने बेटे को सिविल सर्जन या जज बनाएगी। जाहिर है अब्दुल का जन्म जज या सिविल सर्जन बनने के लिए नहीं हुआ था। किस्मत ने तो कुछ और ही लिखा था। बचपन से ही वो शेरो-शायरी किया करते थे और उनका शौक दशहरे पर लगने वाले मेलों में नाटक देखना था। साहिर अपनी मां को बहुत मानते थे और तहे दिल से उनकी इज्जत करते थे। उनकी कोशिश रहती थी कि मां को कोई दुख न हो।
उस समय के मशहूर शायर मास्टर रहमत की सभी शायरी उस दौरान उन्हें पूरी याद थी। बचपन से ही उन्हें किताबें पढ़ने और सुनने का बहुत शौक था और यादाश्त का आलम यह था कि किसी भी किताब को एक बार सुन लेने या पढ़ लेने पर उन्हें वो याद रहती थी। बड़े होकर साहिर खुद ही शायरी लिखने लगे। शायरी के क्षेत्र में साहिर खालसा स्कूल के शिक्षक फैयाज हिरयानवी को अपना उस्ताद मानते थे। 
साहिर की शिक्षा लुधियाना के खालसा हाई स्कूल में हुई। 1939 में जब वे गवर्नमेंट कॉलेज के विद्यार्थी थे अमृता प्रीतम से उनका प्रेम हुआ जो कि असफल रहा। कॉलेज के दिनों में वे अपने शेर और शायरी के लिए प्रख्यात हो गए थे और अमृता इनकी प्रशंसक थीं। अमृता के परिवार वालों को आपत्ति थी क्योंकि साहिर मुस्लिम थे। बाद में अमृता के पिता के कहने पर उन्हें कॉलेज से निकाल दिया गया। जीविका चलाने के लि उन्होंने तरह-तरह की छोटी-मोटी नौकरियां कीं।
1948 में फिल्म ‘आजादी की राह पर’ के साथ उन्होंने अपना फिल्मी सफर पूरा किया। वैसे यह फिल्म असफल रही। उन्हें 1951 में आई फिल्म ‘नौजवान’ के गीत ‘ठंडी हवाएं लहरा के आए...’ से प्रसिद्धि मिली। इस फिल्म के संगीतकार एसडी बर्मन थे। गुरुदत्त के निर्देशन की पहली फिल्म ‘बाजी’ ने उन्हें काफी प्रतिष्ठित किया। उन्होंने ‘हमराज’, ‘वक्त’, ‘धूल का फूल’, ‘दाग’, ‘बहू बेगम’, ‘आदमी और इंसान’, ‘धुंध’ और ‘प्यासा’ सहित अनेक फिल्मों में यादगार गीत लिखे। निराशा, दर्द, कुंठा और विसंगतियों के बीच प्रेम, समर्पण, रुमानियत से भरी शायरी करने वाले साहिर लुधियानवी के लिखे नग्में दिल को छू जाते हैं।
कैफी आजमी ने कभी साहिर की शायरी के रोमांटिक मिजाज पर तंज कसते हुए कहा था कि उनके दिल में तो परचम है पर कलम कागज पर मोहब्बत के नगमे उकेरती है। साहिर की शायरी को लेकर यह विरोधाभास इसीलिए सामने आता है क्योंकि उन्होंने फिल्मों के लिए पेशेवर मजबूरी में शायरी की। बावजूद इस मजबूरी के एक बड़े तरक्की पसंद शायर के तौर पर उन्होंने अपनी पहचान बनाए रखी। इस लिहाज से उनके फिल्मी सफर के समानांतर उनके अदबी सफरनामे पर भी गौर करना होगा। 
24 की उम्र में साहिर लुधियानवी की किताब ‘तल्खियां’ बाजार में आ चुकी थी और तकरीबन उन्होंने शोहरत की बुलंदियां हासिल कर ली थीं। वे उर्दू अखबार ‘अदबे-लतीफ’, ‘शाहकार’ और ‘सवेरा’ के भी मुदीर (संपादक) बन चुके थे। साहिर पर भी फैज और मजाज का खासा प्रभाव पड़ा। दिलचस्प है कि फैज की ‘मुझसे पहले सी मोहब्बत मेरे महबूब न मांग’, या, ‘बोल के लब आजाद हैं तेरे’ की तर्ज पर उन्होंने कई कलाम लिखे। 
साहिर को जो लोग उनके मशहूर फिल्मी नगमों के कारण जानते हैं, उन्हें यह भी जानकारी होनी चाहिए कि उन्हें फिल्म संगीत के साथ उसके निर्माण के बारे में भी काफी जानकारी थी। राज कपूर की एक फिल्म ‘फिर सुबह होगी’ दोस्तोव्स्की के ‘क्राइम एंड पनिशमेंट’ पर आधिरित थी। इस फिल्म में साहिर की जिद पर फिल्म के संगीतकार के तौर पर शंकर-जयकिशन की जगह खय्याम को लिया गया। इसके लिए उन्होंने तर्क यह दिया कि शंकर-जयकिशन समाजवाद को ठीक से नहीं समझते। साफ है कि फिल्मों के लिए लिखने वाले इस महान शायर ने यहां भी विचार और कला की गुणवत्ता का भरसक खयाल रखा। बकौल यश चोपड़ा, ‘साहिर के गीतों से किसी फिल्म का मेयार ऊंचा हो जाता है।’ ‘कभी-कभी’ के लिए यश चोपड़ा लक्ष्मीकांत प्यारेलाल को लेना चाहते थे पर यहां भी साहिर की ही चली और खय्याम ने मौसिकी दी।’
रेडियो सीलोन पर बजते गानों में पहले सिर्फ गायक और संगीतकार का ही नाम लिया जाता था। साहिर के आने के बाद गीतकार का भी नाम बोला जाने लगा। उनके असर ने गीतकारों को भी म्यूजिक कंपनी से रॉयल्टी में हक दिलवाया। कुछ एक गीतों को अगर छोड़ दें तो पहले वो गीत लिखते थे फिर उसकी मौसिकी तय होती थी और ये साहिर का ही उरूज था कि बतौर मेहनताना वे संगीतकार से एक रुपया ज्यादा फीस लेते थे।



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