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मंगलवार, 11 दिसंबर 2018

प्रह्लाद सिंह पटेल, मोदी सरकार आने के बाद विकास की रफ्तार तेज हुई

मध्य प्रदेश के दमोह के सांसद प्रह्लाद सिंह पटेल की लोकसभा में उपस्थिति जहां 98 प्रतिशत है वहीं अपने चुनाव क्षेत्र में उनकी मौजूदगी सौ प्रतिशत। नदी, जंगल और पहाड़ से घिरे उनके संसदीय क्षेत्र में पर्यावरण एक महत्त्वपूर्ण मसला है। इस संदर्भ में उन्होंने काम भी बहुत किया है। इन्हीं सब विषयों पर उनके साथ हर्ष रंजन की विस्तार से हुई बातचीत के कुछ संपादित अंश

आप अपने इलाके की सबसे बड़ी समस्या किसे मानते हैं?  जहां तक हमलोगों को मालूम है कि पेड़ों की कटाई यहां की मुख्य समस्या है,इससे बाढ़ और पेयजल की समस्या जटिल है। 

नहीं, मुझे ऐसा नहीं लगता। मेरे हिसाब से तो जंगल के कारण ही समस्याएं थीं। ज्यादा जंगल होने से विकास रुका पड़ा था। केंद्र में एनडीए की सरकार आने के बाद गति पकड़ी है। यहां भूमिगत जल नहीं है, नदियां बड़ी-बड़ी हैं, लेकिन जल का स्रोत नहीं बन पाईं। मुझे लगता है कि दो-तीन बातें ध्यान रखनी चाहिए, सूखा सिर्फ हमारी गलती के कारण नही है, कहीं न कहीं प्रबंधन में दोष है। पानी नहीं है, ऐसा मैं नहीं मानता। बुंदेलखंड के पिछले 100 वर्षों का रिकॉर्ड आप उठाकर देखेंगे तो पाएंगे कि वर्षा वहां कम होती है इसीलिए पानी हमारे लिए एक चुनौती बना हुआ है। 

आप कह रहे हैं कि यहां के जंगल ही मुख्य समस्या है तो क्या ये माना जाए कि जंगल काटने को आप सही ठहरा रहे हैं ?

नहीं, मैं यह नहीं कह रहा हूं। लेकिन जंगल के विस्तार या उसके कटाव में तालमेल बैठाना चाहिए। हमारे यहां दुर्गावती अभ्यारण था ही और अब चीता अभ्यारण बन गया। आप ऐसे लोगों को विस्थापित कर रहे हैं जिनके पास रहने के लिए पहले से ही कुछ नहीं है। इसीलिए इससे नुकसान ही होगा। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि जंगल काटने चाहिए। जनसंख्या के आधार पर आपको समन्वय बैठाना पड़ेगा। मैं1980 में जब संसद पहुंचा तो पर्यावरण अधिनियम पर पहली बार बोला। बिल के खिलाफ बोला था। उस समय मैं शिवनी का सांसद था। मैं जंगल के क्षेत्र से आता हूं इसीलिए उसकी अच्छाई और बुराई दोनों के बारे में जानता हूं। मैं मानता हूं कि जंगल नीति पर पुराने तरीके से काम हुआ है, जबकि इसमें सुधार की जरूरत है। इसीलिए जंगल कटे या ना कटे इसके बारे में केवल न और हां में उत्तर नहीं दिया जा सकता है। इतना जरूर कह सकता हूं कि इस पर सरकार को बहुत ज्यादा काम करने की जरूरत है।

मध्य प्रदेश में नर्मदा एक बड़ी नदी है। उसकी सफाई के लिए अमर कंटक से अभियान चलाया जा रहा है। इस अभियान में आप अपनी ओर से तथा सरकार की ओर से क्या सहयोग कर रहे हैं?

देखिये आध्यात्मिक रूप से मैं नर्मदा नदी से जुड़ा हुआ हूं। मैंने इसकी कई बार परिक्रमा भी की है। मेरी धारणा नर्मदा के बारे में बिल्कुल अलग है। हमारे बुजुर्गो ने कहा है कि नदी को अगर मां मानते हो तो फिर उसमें गदंगी क्यों डालते हो। नर्मदा नदी के प्रति हमारी आस्था बहुत गहरी है? इसमें तो हम स्नान भी नहीं करते। 31 साल हो गए हैं हम यहां सिर्फ प्रणाम करने आते हैं। जब कभी सफाई करते हैं तभी नर्मदा नदी में पैर रखते हैं वरना इसमें कभी पैर भी नहीं रखते हैं। हमने जब नर्मदा अभियान शुरू किया तो सिर्फ इतना तय किया कि जिस नरसिंहपुर जिले में मैं पैदा हुआ वहीं से 137 किलोमीटर दूर तक बहने वाली नर्मदा नदी को क्यों न साफ कर दिया जाए। मैंने वही किया और 137 किलोमीटर नर्मदा नदी को साफ कर दिया। यह काम सरकार नहीं कर सकती, क्योंकि यह सामाजिक सरोकार का काम है इसीलिए इसे सामाजिक स्तर पर ही पूरा किया जा सकता है।

आपने नर्मदा नदी को साफ कर एक मिसाल कायम की है लेकिन गंगा सफाई अभियान को लेकर जितना धन खर्च किया गया उसके हिसाब से परिणाम नहीं आया है। आपके हिसाब से बेहतर परिणाम के लिए क्या किया जाना चाहिए?

जो जहां है वहां काम करे... करने से पहले लूटने की मन:स्थिति तकलीफ देती है। मेरा जिला है इसीलिए मैंने तय किया कि यह मेरी जिम्मेदारी है कि जहां मैं पैदा हुआ हूं वहां की जिम्मेदारी पूरी करनी है...जबकि मैं वहां से चुनाव नहीं लड़ता। कुछ न कुछ आपको तय करना पड़ेगा और इसीलिए मुझे लगता है कि सब अपनी-अपनी जवाबदेही तय करे। सरकार की भूमिका तब आती है जब कोई गंदा नाला नदी में मिल रहा हो। जो काम आम आदमी या फिर समाज नहीं कर सकता है वहां से सरकार की भूमिका शुरू होती है। 

नर्मदा की सफाई के लिए आपने तकनीक का उपयोग किया या कुछ और?   

विशुद्ध श्रम शक्ति। 8-8 घंटे पानी में तैर कर कचरा निकालते जाते थे और आगे बढ़ते जाते थे। जहां कहीं भी नर्मदा स्वच्छ दिखी वहां ऊपर घाट की सफाई कर देते थे। हमने विशुद्ध रूप से देसी तरीके से नर्मदा की सफाई की। रात के विश्राम के समय गांव के लोग ही भोजन करा दिया करते थे। नदी के किनारे ही ठहरते थे और सुबह आगे का काम बढ़ाते थे। 

नमामि गंगे परियोजना पर आपकी क्या राय है?

मैंने जितनी भी रिपोर्ट पढ़ी है उस आधार पर कह सकता हूं कि गंगा की सफाई का काम कई सेक्टरों में बांट देना चाहिए। अभी भी कानपुर तक गंगा को साफ किया जाना चाहिए, मतलब सेक्टर में, ज्योलॉजी को आपको भूलना नहीं चाहिए। क्या गंगा की डायवर्सिटी के बारे में हमने सोचा? कुछ दिन पहले उमा जी ने जरूर सदन में कहा कि मछलियां नदी में जब जीवित रहेंगी तभी हम मानेंगे कि गंगा स्वच्छ हो गई।

 दमोह जो काफी पिछड़ा हुआ इलाका है। वहां काफी संख्या में शौचालय बनाए गए हैं फिर भी खुले में शौच जाने की समस्या की दिशा में क्या काम किया जा रहा है? 

मैंने स्टैंडिंग कमेटी की बैठक में कहा है कि हमारे मवेशी के लिए पीने का पानी नहीं है और हम पांच लीटर पानी फ्लश करने में डाल दें? यह बात समझनी पड़ेगी। हम कहीं से प्रबंध करके पानी मुहैया कराएं, या तो जो पानी हम पहले उपयोग कर लेते हैं उसे ही थोड़ा बहुत साफ करके फ्लश के लिए बचा लें। मैं अपने आदर्श गांव में इसका प्रयोग करने वाला हूं। अगर ये सफल हो जाता है तो खुले में शौच जाने पर भी अंकुश लग जाएगा। 

कुछ सामूहिक शौचालय की बात हो रही है, कहां तक सही रहेगी?

 मैंने जैविक शौचालय की बात कही है लेकिन वो महंगा बहुत है। दूसरी बात जैविक शौचालय में दिक्कत है। हमारे यहां बीड़ी का प्रचलन बहुत है, इससे दिक्कत आने वाली है। हमने कोशिश की है कि महिलाओं के लिए सामूहिक जैविक शौचालय हो जाए तो पानी की समस्या का समाधान हो जाएगा। लेकिन महंगा होने के कारण ऐसा अभी संभव नहीं लगता है।

दमोह में अस्पताल तो है लेकिन इतने जर्जर है कि न तो डॉक्टर न ही वहां कोई मशीन काम करती है?

मैं स्वास्थ्य और शिक्षा के व्यावसायीकरण का  हमेशा से विरोध करता रहा हूं। स्वास्थ्य के व्यावसायीकरण करने का ही यह दुष्परिणाम है कि यहां के लोगों को समय पर डॉक्टर उपलब्ध नहीं हो पाते। ऐसा नहीं है कि दमोह में डॉक्टर नहीं हैं लेकिन वे अपना काम सही तरीके से करते नहीं हैं। डॉक्टर न तो समय पर अस्पताल आते हैं न ही मरीजों का इलाज करते हैं। इस बारे में कुछ बोलने पर उन्हें लगता है कि हम आरोप लगा रहे हैं। लेकिन क्या कहें...हमारे समाज के लिए यह अभिशप्त व्यवस्था का दोष है।

 

 

निजी बात

परिवार के लिए आपके पास कितना समय होता है?

मेरा परिवार मुझसे खुश नहीं है क्योंकि उनके लिए मैं बहुत ही कम समय निकाल पाता हूं।

छुट्टी मनाने के लिए आपकी पसंदीदा जगह कौन सी है?

मैं कोई छुट्टी लेता ही नहीं हूं, मेरे लिए मेरी पसंदीदा जगह जंगल होते हैं। लेकिन मेरी पत्नी वहां जाना पसंद नहीं करती। मेरे साथ मेरी पत्नी एक बार जंगल गई थी, बस। क्योंकि उन्हें जंगल जाना भाता नहीं।

लेकिन आपको कहीं बेहतर जगहों पर हनीमून के लिए जाना चाहिए था ?

नहीं, मैं कहीं नहीं गया था। सही बताऊं तो कुछ खास परिस्थितियों के कारण शादी होने के बाद भी करीब एक साल तक हम लोग साथ नहीं रह पाए थे।

आपका प्रतिदिन का कार्यक्रम क्या होता है? 

प्रतिदिन का रूटीन काफी भागम-भाग वाला रहता है। मैं महज छह घंटे ही सो पाता हूं। शेष के 18 घंटों में या तो काम करता हूं या फिर लोगों से मिलता रहता हूं। 

आपको खाने में सबसे ज्यादा पसंद क्या है?

मैं साधारण शाकाहारी खाना खाता हूं। दाल, चना, बाजरा-चावल, रोटी-भाजी। यहां तक कि मैं लहसुन और प्याज तक नहीं खाता हूं।

आपके लिए राजनीति क्या है?  

लोगों और जनसमूहों की सेवा करना ही हमारे लिए राजनीति है। 



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