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सोमवार, 23 जुलाई 2018

लेस कैश से कैश लेस की ओर

जिस तरह से सुंदर और स्वस्थ जीन के लिए अस्वच्छता जरूरी है, ठीक वैसे ही अर्थव्यवस्था की सेहत के लिए काले धन की सफाई। आठ नवंबर को विमुद्रीकरण की घोषणा के साथ इस दिशा में ऐतिहासिक कदम देश ने उठाया। सवाल यह नहीं है कि विमुद्रीकरण से कितने काले धन का खुलासा होगा। लेकिन इतना तय है कि इससे बहुत हद तक यह पता चल जाएगा कि किसके पास कितना धन है।

नब्बे के दशक की शुरुआत में पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव के आर्थिक उदारीकरण के फैसले के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जीएसटी और विमुद्रीकरण लागू करने जैसा बड़ा फैसला किया है। आर्थिक उदारीकरण का लाभ आज हमलोग प्रत्यक्ष देख रहे हैं। बहुत दिनों तक न सही, लेकिन कम से कम एक साल तक नरेंद्र मोदी के प्रति जनता के मन में वही भाव जरूरी है। जिस भाव से ये फैसला सरकार ने किए।

क्या काले धन को खत्म करना ही नोटबंदी का एकमात्र लक्ष्य था जैसा कि सभी वर्गों द्वारा इंगित किया जा रहा है? यहां तक कि शुरुआत में सरकार ने भी महज 70 से 80 प्रतिशत (करीब 14 लाख करोड़) विमुद्रीकृत मुद्राएं बैंक में जमा होने या बदले जाने का दावा किया था। बांकी के 20-30 प्रतिशत अमान्य मुद्रा वापस नहीं आने वाली। इसका मतलब ये हुआ कि करीब तीन-चार लाख करोड़ मुल्य के बड़े नोट चलन से बाहर हो जाएंगे। भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के मुताबिक लोगों ने शुरू के 15 दिनों में ही 8 लाख करोड़ रुपये जमा करा दिए, जो कि विमुद्रीकृत मुद्रा का 65 प्रतिशत है। सरकार की 80 प्रतिशत मुद्रा जमा होने की उम्मीद से जमा होने वाली रकम ज्यादा होने का आकलन किया गया है। ऐसे में वास्तविकता कुछ और है। 

जब प्रधानमंत्री ने लोगों को महज तीन-साढ़े तीन घंटे की मोहलत देते हुए पूरे 14 लाख करोड़ रुपए को चलन से बाहर कर दिया। मोदी के इस फैसले से लोग दंग रह गए। एकसाथ एटीएम और बैंक बंद होने की वजह से दो दिनों तक लोगों के हाथ खाली रहे, लोगों की समझ में नहीं आ रहा था कि वे करें तो क्या करें। तभी लोगों ने प्लास्टिक और डिजिटल मनी की ओर अपना रुख किया।

निश्चित रूप से विमुद्रीकरण का दूरगामी और स्पष्ट रूप से पारिभाषित लक्ष्य है। लोगों को डिजिटल मनी अपनाने के लायक बनाना पहला और सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक हाथ में पैसे नहीं होने तथा व्यावसायिक लेन-देन न के बराबर होने से काफी लोगों का रुख डिजिटल मनी की ओर बढ़ेगा। शुरू के 15 दिनों में ही डिजिटल मनी के उपयोग करने वालों की संख्या में 15 गुणा वृद्धि हुई है, जो 23 करोड़ डिजिटल वालेट के बराबर है।

विमुद्रीकरण के वक्त देश में क्रेडिट और डेबिट कार्डों की संख्या 80 करोड़ बताई गई, लेकिन इनमें से बहुत सारे कार्ड बेकार पड़े हैं। सरकार ने काफी संख्या में जन धन खाता खोला था, लेकिन ऐसे बहुत खाते थे जिनका परिचालन नहीं होता था। शुरू के 15 दिनों के दौरान ही 45 करोड़ डेबिट और क्रेडिट कार्ड कार्य करने लगे। और जन-धन खातों का बड़ी संख्या में परिचालन शुरू हो गया।

निश्चित रूप से प्लास्टिक और डिजिटल मनी तक अभी खासकर ग्रामीण इलाकों में सभी की पहुंच नहीं हो पाई है। लेकिन नोटों की कमी की वजह से एक से दो सप्ताह में ही लोग इससे भी सहज हो जाएंगे। कभी-कभी सरकार एक साल में ही सबकुछ एकसाथ पाने में समर्थ नहीं हो पाती है। लेकिन अब आप रिक्शाचालक से लेकर सड़क किनारे चाय बेचने वाले तक को डिजिटल वॉलेट का उपयोग करते देख सकते हैं। देश में कुल 25करोड़ परिवार हैं और इनमें 23 करोड़ डिजिटल वॉलेट के अलावे कुल 85 करोड़ डेबिट और क्रेडिट कार्ड हैं।

इसीलिए कौन लोग हैं जो फिर से पेपर करेंसी की ओर लौटना चाहते हैं? वे केवल वही लोग हैं, जो इस परीक्षा की घड़ी में येन-केन प्राकरेण अवरोध उत्पन्न कर रहे हैं। लेकिन सरकार भी इस प्रकार के लोगों की पहचान और पड़ताल कर रही है और इस प्रकार के लोगों को पकडऩे में किसी प्रकार की दिक्कत भी नहीं होगी?            

सरकार के पास पहले से ही मजबूत जांच व्यवस्था है। सभी बैंक खाते और आय कर रिटर्न स्वत: ही आय कर विभाग के सर्वर से होकर गुजरेगा। यह सिस्टम इस प्रकार से बनाया गया है कि 10 नवंबर के बाद बड़ी रकम लेने वाले संदिग्धों और अपराधियों के सामने लाल झंडा दिख जाएगा। और तब उन्हें उस रकम के स्रोत के बारे में बताने को कहा जाएगा। असंतोषप्रद जवाब देने के कारण उनपर जुर्माना लगाया जाएगा। वास्तव में सरकार काफी समय से कैशलेस समाज की ओर बढऩे के लिए स्वयं को तैयार कर रही थी। भारतीय रिजर्व बैंक ने तो इसके लिए कुछ महीने पहले से ही जमीनी स्तर पर कार्य करना शुरू कर दिया था। जून में एक खांका खीचते हुए उसने भारत में भुगतान और निपटान प्रणाली (पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम इन इंडिया) विजन-2018 के नाम से एक विजन डॉक्यूमेंट जारी किया था। इस रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि भारतीय रिजर्व बैंक का प्रयास यह आश्वस्त करना होगा कि कागज आधारित निपटान उपकरणों में कमी तथा खुदरा इलेक्ट्रॉनिक भुगतान प्रणालियों के अलग-अलग खंडों में वृद्धि लगातार जारी रहेगी।

आरबीआई भलीभांति जानता था कि लोगों को कैशलेस सेवा का उपयोग करने के लिए लेन-देन हेतु आवश्यक ढांचागत सुविधा उपलब्ध कराना जरूरी है। तभी तो बैंक अपने ग्राहकों को नेट बैंकिंग के उपयोग करने के लिए प्रेरित कर रहे थे। लोग आरटीजीएस या एनईएफटी या आईएमपीएस के माध्यम से तत्काल कहीं से पैसे भेज सकते हैं वे चाहे घर पर हों या दफ्तर। उन्हें छोटे-छोटे के लिए अब बैंक भागने की जरूरत नहीं पड़ेगी। इसका परिणाम भी फलदायी रहा है। क्योंकि 2013 से 2016 के बीच आरटीजीएस और एनईएफटी में तीन गुणा की वृद्धि हुई है। इलेक्ट्रॉनिक लेन-देन के उपयोग में हुई बढ़ोतरी के बावजूद जीडीपी के प्रतिशत के रूप में कैश 12-13 प्रतिशत के आसपास मंडरा ही रहा है। भारतीय स्टेट बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक डिजिटल कॉमर्स का वर्तमान आकार करीब 1.2 लाख करोड़ का है। अगर सरकार का इरादा कैश का प्रचलन कम करना है, तो फिर मजूबती के साथ इसकी संख्या बढ़ाने की जरूरत है। रिपोर्ट का कहना है कि जीडीपी के अनुपात में कैश को 8पर लाने के लिए सरकार का इरादा कैश के प्रचलन को एक तिहाई तक करने का है।



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