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बुधवार, 19 जून 2019

ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया

राजेंद्र बाबू में सीखने-समझने और उन बातों को आचरण में उतारने की क्षमता शायद औरों से ज्यादा थी। गांधी जी के संपर्क और दस महीने साथ काम करने के अनुभव ने राजेंद्र प्रसाद का जीवन सदा के लिए बदल दिया

दलाई लामा मानते हैं कि राजेंद्र बाबू महात्मा बुद्ध के अवतार थे। हम ऐसा मानें न मानें पर अपने व्यवहार के चलते काफी सारे भारतीय भी उनको ‘देवता’ कहते थे। बिहार में और खासकर भोजपुरी भाषी समाज में देवता कहना आदर देने का एक तरीका भी है। अपने ज्ञान, मर्यादापूर्ण व्यवहार, अहंकार रहित आचरण, सादगी और सरलता के लिए विख्यात राजेंद्र प्रसाद सही मायनों में चंपारण सत्याग्रह की पैदाइश थे और जिस तरह पारस के संपर्क में आकर लोहा सोना बन जाता है, गांधी जी के संपर्क और दस महीने साथ काम करने के अनुभव ने राजेंद्र प्रसाद का जीवन सदा के लिए बदल दिया। राजेंद्र बाबू में सीखने-समझने और उन बातों को आचरण में उतारने की क्षमता शायद औरों से ज्यादा थी, इसीलिए वे राष्ट्रपति के पद तक गए और लगातार दो कार्यकाल पूरा किया। राष्ट्रपति भवन के बाद ‘ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया’ को सार्थक करते हुए, वे वापस पुरानी स्थिति में ही पटना के सदाकत आश्रम में लौट गए। चंपारण से राजेंद्र प्रसाद का रिश्ता राष्ट्रपति भवन से ज्यादा गहरा था, क्योंकि वे न सिर्फ आंदोलन में लगे रहे, पूरा समय दिया, उसके बाद गांधी जी के कहे और अपने विवेक से सामाजिक-राजनीतिक काम करते रहे, पर चंपारण उनके मन से कभी नहीं निकला। खुद दो किताबें लिखने, उनका बार-बार संशोधित संस्करण तैयार कराने के अलावा उन्होंने अपनी आत्मकथा समेत अन्य चार किताबों में चंपारण और गांधी जी से अपने रिश्तों पर विस्तार से लिखा। उनकी पहल पर ही प्रसिद्ध इतिहासकार बी.बी. मिश्र ने चंपारण आंदोलन से संबंधित दस्तावेजों की भारी-भरकम किताब तैयार की। गांधी जी के जीवनीकार बीजी तेंदुलकर ने भी उनकी पहल पर ही चंपारण आंदोलन पर एक अच्छी किताब लिखी है। 
जब वे गांधी जी के आंदोलन में साझीदार बनने के लिए पहली बार चंपारण आए तब उनकी उम्र 32 पार कर गई थी। तब तक वे कलकत्ता विश्वविद्यालय में दो बार टॉप करने (इंटर और बीए में), अपने परीक्षक से अपूर्व टिप्पणी पाने (कहा जाता है कि उनके परीक्षक ने उनकी कॉपी पर लिखा था-एक्जामिनी इज बेटर दैन द एक्जामिनर) और अपनी अकादमिक उपलब्धियों के लिए सारे बिहारी नौजवानों के लिए क्रेज बन चुके थे। वकालत में भी उन्होंने कम समय में ही अच्छी जगह बना ली थी और जब पटना में हाई कोर्ट बना तब वे उन प्रमुख बिहारी वकीलों में थे, जो पटना आ गए। उनकी गिनती और फीस (जिसकी जानकारी पाकर गांधी जी भी हैरान हुए थे) शीर्ष के वकीलों में थी। कलकत्ता की जिस बैठक के बाद गांधी जी चंपारण के लिए रवाना हुए, उसमें राजेंद्र प्रसाद भी थे पर वहां से वे पुरी चले गए थे। गांधी जी से उनकी वहां कोई बात नहीं हुई थी और उन्होंने बिहार जाने की चर्चा भी सबसे नहीं की थी। राजकुमार शुक्ल ने भी कुछ नहीं बताया था और उन्हें यह भी मालूम न था कि राजेंद्र बाबू पटना नहीं जा रहे हैं। यही कारण था कि वे गांधी जी को लिए हुए 10 अप्रैल 1917 को राजेंद्र प्रसाद के घर पर ही पहुंचे थे और वहां के नौकरों ने इन दोनों को किसान मुवक्किल मानकर अच्छा बर्ताव नहीं किया। गांधी जी ने अपनी आत्मकथा में इस प्रसंग को विस्तार से लिखा है। बाद में चंपारण सत्याग्रह के दौरान गांधी जी और उनका साथ किस तरह रहा और वे किस तरह वहां बापू के सबसे विश्वसनीय लोगों में से थे, यह तथ्य आज एक प्रेरक इतिहास के रूप में सबके सामने है।  
जो बात उल्लेखनीय है, वह यह कि जब गांधी जी को चंपारण निलहों का अत्याचार और उसका प्रतीक बन गई तिनकठिया खेती का अंत दिखने लगा तब उन्होंने रचनात्मक कार्यों की तरफ ध्यान देना शुरू किया। पर उस काम के लिए उन्होंने एकदम नए तरह के कार्यकर्ता बुलाए क्योंकि तब बिहार में कांग्रेस के पास एक भी पूर्णकालिक कार्यकर्ता न था और जो लोग कांग्रेस के नाम से सक्रिय थे उनको रचनात्मक कामों का कोई अनुभव न था। गांधी जी सफाई, स्वास्थ्य और शिक्षा के साथ खादी, हस्तशिल्प और ग्रामोद्योग ही नहीं, खेती-बागवानी और पशुपालन का प्रयोग भी करना चाहते थे। सो, जब चंपारण कमेटी की रिपोर्ट आई तो राजेंद्र बाबू को छोड़कर ज्यादातर वकील सहयोगियों को उनके काम पर लौट जाने को कहा गया। सिर्फ बाबू धरणीधर रुके क्योंकि बिहारी कार्यकर्ताओं को यह उचित नहीं लग रहा था कि बाहर वाले आकर उनके इलाके में टट्टी साफ करने से लेकर हर तरह के काम करें और हम लोग हाथ पर हाथ धरे बैठे रहें। सो गांधी जी ने उन्हें अध्यापन का काम दिया। कुछ समय तक कृपलानी जी ने भी वहां अध्यापन किया। इस दौर में गांधी जी ज्यादा बाहर रहने लगे थे। सो मोतिहारी से सारे कामकाज की देखरेख और कार्यकर्ताओं के गुजारे के लिए मानधन देने वगैरह का काम राजेंद्र बाबू के पास रहा। जब गांधी जी अहमदाबाद के मजदूरों और खेड़ा के किसानों की बार-बार की बुलाहट पर चंपराण से निकले तो राजेंद्र बाबू भी पटना आकर अपनी वकालत संभालने लगे। मगर उन्हें चंपारण के स्कूलों की चिंता रही। इस तरह चंपारण उनके मन में सदा रहा और एक बार वे यहां से चुनाव भी लड़े। रिश्तेदारियों का न्योता और हर राजनैतिक कार्यक्रम में आने का अवसर वे तलाशते रहते थे। राजकुमार शुक्ल के श्राद्ध जैसे आयोजनों में भी उन्होंने भागीदारी की। बाद में वे क्या-क्या बने और उन्होंने क्या-क्या काम किए, यह तो कई ग्रंथों में समेटने वाला किस्सा है। पर यह साफ है कि चंपारण आंदोलन ने राजेंद्र प्रसाद को बिहार और देश की राजनीति के साथ ही गांधी जी के मन के उस पायदान पर खड़ा कर दिया कि उनको ऊपर ही ऊपर होना था और उनकी काबलियत, समाज सेवा की भावना और निष्ठा का स्तर इतना बड़ा होता गया कि सारे पद उनके आगे छोटे लगने लगे। 
खराब स्वास्थ्य से उठकर उन्होंने 1934 के भूकंप में जिस पैमाने पर और जिस कुशलता से गैर-सरकारी स्तर पर राहत और पुनर्वास का काम चलवाया, उसने उनका यश काफी फैलाया। उत्तर बिहार में 1934 की 15 जनवरी को बहुत बड़ा भूकंप आया था। उनके नेतृत्व में राहत समिति बनी। करीब तीस लाख रुपए चंदे से जुटाए गए और इतने ही मूल्य के कंबल और दूसरी जरूरी चीजें जमा की गईं। देशभर से सहायता आई और गांधी जी समेत सारे नेता आए। इसकी सारी दुनिया में तारीफ हुई और पूरा काम सरकारी मदद के बिना हुआ।



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