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मंगलवार, 13 नवंबर 2018

दूर हटो ए दुनियावालों,हिंदुस्तान हमारा है

भारत में सिनेमा और स्वाधीनता ने तकरीबन एक साथ कदमताल किया। राष्ट्रीयता को लेकर इस तरह की भावनात्मक साझीदारी अनूठी है

 

सिनेमा और समाज का साझा भारत में सौ साल से भी ज्यादा पुराना है। देश और समाज के हर पल को जहां फिल्मकारों ने अपने तरीके से छुआ है, वहीं राष्ट्रीयता के सवाल पर बॉलीवुड की धड़कन पूरे देश की धड़कन बनी है। देश में राष्ट्रीयता का आज जो भी सांस्कृतिक रंग है, उसे गहरा के साथ चटख बनाने में भूमिका निभाने वाले फिल्मों और सिने दिग्गजों की फेहरिस्त लंबी और तारीखी है।

गौरतलब है कि भारत में सिनेमा ने स्वाधीनता के गीत आज़ादी हासिल करने के बाद ही नहीं गाए, बल्कि गुलामी की बेडिय़ों से जकड़े रहने के बावजूद यह स्वर बुलंदी से फूटा। कह सकते हैं कि हमारे फिल्मकार उन कहारों में शामिल हैं, जिनके कंधों पर सवार होकर आज़ादी की दुल्हन आई। फिल्म 'पूरब और पश्चिम, का एक गीत भी है- 'दुल्हन चली, पहन चली तीन रंग की चोली।,

हिंदी फिल्मों में देशभक्ति फिल्म के निर्माण और उनसे जुड़े गीतों की शुरुआत 1940 के दशक से मानी जाती है। निर्देशक ज्ञान मुखर्जी की 1940 में प्रदर्शित फिल्म 'बंधन, संभवत: पहली फिल्म थी, जिसमें देश प्रेम की भावना को रुपहले पर्दे पर दिखाया गया था। इस तरह देखें तो देश में सिनेमा और स्वाधीनता ने तकरीबन एक साथ कदमताल किया है। राष्ट्रीयता को लेकर इस तरह की भावनात्मक साझीदारी दिलचस्प तो है ही, अनूठी भी है। इस अनूठी तारीखी यात्रा के सबसे बड़े सहयात्री का नाम है-कवि प्रदीप।

चल-चल रे नौजवान

कवि प्रदीप के बिना भारतीय सिनेमा में देशभक्ति गीतों की चर्चा अधूरी कही जाएगी। फिल्म 'बंधन, में कवि प्रदीप के लिखे गीत 'चल चल रे नौजवान, के बोल वाले गीत ने आज़ादी के दीवानों में एक नया जोश भर दिया था। यह गीत आज स्कूल-कॉलेज के छात्रों द्वारा कई मौकों पर गाया जाता है।

दूर हटो ए दुनियावालों

1943 में फिल्म 'किस्मत, प्रदर्शित हुई थी।  फिल्म में प्रदीप के लिखे गीत 'आज हिमालय की चोटी से फिर हमने ललकारा है, दूर हटो ए दुनियावालों हिंदुस्तान हमारा है, जैसे गीतों ने स्वतंत्रता सेनानियों को आज़ादी की राह पर बढऩे के लिए प्रेरित किया। इस गीत को 'भारत छोड़ो आंदोलन, के दौरान काफी सराहा गया। कह सकते हैं कि कवि प्रदीप के जरिए कवि प्रदीप के साथ हिंदी सिनेमा ने भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में भी प्रेरक योगदान किया।

ऐ मेरे वतन के लोगों

भारतीय सिनेमा जगत में वीरों को श्रद्धांजलि देने के लिए अब तक न जाने कितने गीतों की रचना हुई है, लेकिन लता की आवाज़ में गाए 'ऐ मेरे वतन के लोगों जरा आंख में भर लो पानी, जो शहीद हुए हैं उनकी जरा याद करो कुर्बानी, जैसे देशप्रेम की अद्भुत भावना से ओत-प्रोत रामचंद्र द्विवेदी उर्फ कवि प्रदीप के इस गीत की बात ही निराली है। जब सबसे पहले लता मंगेशकर ने दिल्ली के नेशनल स्टेडियम में इस गीत को गाया था, तो वहां मौजूद तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू की आंखें भर आईं थीं। इस गीत की ख्याति आज भी पहले की तरह बनी हुई है।

'आनंद मठ, और 'जागृति,

वर्ष 1952 में प्रदर्शित फिल्म 'आनंद मठ, में लता मंगेशकर की आवाज़ में गीत 'वंदे मातरम, आज भी दर्शकों और श्रोताओं को अभिभूत कर देता है। आज जो वंदे मातरम गीत का प्रचलित धुन है, लता ने इस गीत को उससे जुदा धुन में गाया था। इसी तरह फिल्म 'जागृति, में हेमंत कुमार के संगीत निर्देशन में मोहम्मद रफी की आवाज़ में रचा-बसा गीत 'हम लाए हैं तूफान से कश्ती निकाल के इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के, श्रोताओं में देशभक्ति की भावना को जागृत करता है।

रफी के गाए देशभक्ति के तराने

सुरों के शहंशाह मोहम्मद रफी ने कई फिल्मों में देशभक्ति से परिपूर्ण गीत गाए हैं। इन गीतों में, 'ये देश है वीर जवानों का,, 'वतन पे जो फिदा होगा अमर वो नौजवान होगा,, 'अपनी आज़ादी को हम हरगिज मिटा सकते नहीं,, 'उस मुल्क की सरहद को कोई छू नहीं सकता जिस मुल्क की सरहद की निगहबान हैं आंखें,, 'आज गा लो मुस्कुरा लो महफिले सजा लो,, 'हिंदुस्तान की कसम ना झुकेंगे सर वतन के नौजवान की कसम,, 'मेरे देशप्रेमियों, आपस में प्रेम करो देशप्रेमियों, जैसे बेहद लोकप्रिय गीतों को गाया। उनके द्वारा गाए इन गीतों ने खासौतर पर नौजवानों को देशप्रेम की भावना से खासा रोमांचित किया। इन गानों की लोकप्रियता आज भी जस की तस है।

याद आते रहेंगे धवन

बॉलीवुड में प्रेम धवन को एक ऐसे गीतकार के तौर पर याद किया जाता है, जिनके देशभक्ति से परिपूर्ण गीतों की सुमधुर ध्वनि कान में पड़ते ही आम भारतीय राष्ट्र प्रेम की भावना से सराबोर हुए बगैर नहीं रहता। प्रेम धवन के, 'ए मेरे प्यारे वतन,,  'मेरा रंग दे बसंती चोला,, 'ऐ वतन ऐ वतन तुझको मेरी कसम, जैसे देश प्रेम की भावना से ओत-प्रोत गीत आज भी लोगों के दिलो दिमाग में देशभक्ति के जज़्बे को पैदा करते हैं।

फिल्म 'काबुलीवाला, में पाशर््वगायक मन्ना डे की आवाज़ में प्रेम धवन का रचित यह गीत 'ऐ मेरे प्यारे वतन ऐ मेरे बिछड़े चमन, श्रोताओं की आंखों को नम कर देता है। फिल्म 'हम हिंदुस्तानी, प्रदर्शित हुई जिसका गीत 'छोड़ो कल की बातें कल की बात पुरानी, सुपरहिट हुआ। 1965 में निर्माता-निर्देशक मनोज कुमार के कहने पर प्रेम धवन ने फिल्म 'शहीद, के लिए संगीत निर्देशन किया। इस फिल्म के गीत 'ऐ वतन ऐ वतन,, और 'मेरा रंग दे बंसती चोला, आज भी श्रोताओं के बीच शिद्दत के साथ सुने जाते हैं।

देशभक्ति की हकीकत

भारत-चीन युद्ध पर बनी चेतन आंनद की 1965 में प्रदर्शित फिल्म 'हकीकत, के लिए कैफी आज़मी लिखित और मोहम्मद रफी की आवाज में गाए गीत 'कर चले हम फिदा जान-ओ-तन साथियों अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो, आज भी लोगों को देशभक्ति के रंग में रंग देता है। यह गीत आज भी जब कभी रेडियो-टीवी पर बजता है तो दिल भर आते हैं। 

भारत कुमार का नायकत्व

देशभक्ति से परिपूर्ण फिल्में बनाने में मनोज कुमार का नाम विशेष तौर पर उल्लेखनीय है। 1967 में बनी उनकी फिल्म 'उपकार, ने ऐसी लोकप्रियता हासिल की कि इसके बाद से लोग उन्हें मनोज कुमार की जगह भारत कुमार कहने लगे। इस फिल्म को छह फिल्मफेयर पुरस्कारों से सम्मानित किया गया था। इस फिल्म के निर्माण की कहानी भी काफी दिलचस्प थी। दरअसल यह फिल्म तत्कालीन प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के कहने पर मनोज कुमार ने बनाई थी। इस बारे में मनोज खुद बताते हैं, 'साठ के दशक में भगत सिंह के जीवन पर बनी पहली फिल्म 'शहीद, के शो पर हमने शास्त्री जी को आमंत्रित किया था।  वह कुछ ही समय के लिए आए थे। फिल्म उन्हें बहुत अच्छी लगी थी तो वह कुछ समय के लिए रूक गए और अगले दिन उन्होंने मुझे अपने यहां बुलाया और कहा कि देखो मैंने एक नया नारा दिया है- जय जवान और जय किसान, क्या इस पर कोई फिल्म बन सकती है।, मुझे दिल्ली से ट्रेन से मुंबई आना था। मैंने ट्रेन में यात्रियों से कहा कि मुझे दो-चार कागज और पेन दीजिए। सुबह जब ट्रेन मुंबई पहुंची तो फिल्म 'उपकार, की कहानी पूरी हो चुकी थी। इस फिल्म में मेरा नाम भारत था।, फिल्म 'शहीद,, 'उपकार,, 'पूरब और पश्चिम,, 'क्रांति,, 'जय हिंद द प्राइड, जैसी फिल्मों में देशभक्ति की भावना से ओत-प्रोत कर देने वाले गीत सुनकर आज भी श्रोताओं की आंखें नम हो जाती हैं।

दिल दिया है जान भी देंगे

नए दौर की फिल्मों में देशभक्ति का रंग और निरूपण कुछ बदला हुआ है। खास तौर पर

1986 में आई फिल्म 'कर्मा, के बाद यह बदलाव साफ तौर पर देखा जा सकता है। 'कर्मा, का गीत 'दिल दिया है, जां भी देंगे, ए वतन तेरे लिए, आज भी काफी लोकप्रिय है। देशभक्ति पर अच्छी और चर्चित फिल्म विधु विनोद चोपड़ा ने बनाई सन् 1994 में। अनिल कपूर, मनीषा कोइराला को लेकर बनी इस फिल्म का नाम था, '1942 ए लव स्टोरी,। हाल के दशकों में आई देशभक्ति के जज्बे से भरी फिल्मों में 'क्रांतिवीर,, 'तिरंगा,, 'बार्डर,, 'सरफरोश,, 'गदर, और 'रंग दे बसंती, आदि फिल्मों को खासी कामयाबी मिली है। इस दौरान शहीदे आजम भगत सिंह पर भी

कई फिल्में बनीं। पर इन तमाम फिल्मों ने कथानक में तो देशभक्ति को नया नैरेशन दिया, पर गीतों में इस जज़्बे को वह स्थान नहीं मिल सका।



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