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सोमवार, 20 अगस्त 2018

अब देश में पर्याप्त बिजली है

दशकों बाद भारत अधिशेष बिजली उत्पादन की अवस्था में पहुंच गया है और इसका श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जाता है

यह भारत के लिए गौरव का समय है। पहली बार देश ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन गया है। पूरी तरह से मांग की पूर्ति हुई है। यह अधिशेष बिजली पीक ऑवर में तीन प्रतिशत थी, तो नन-पीक ऑवर में एक प्रतिशत। पश्चिमी और दक्षिणी भारत में हमेशा अधिशेष बिजली रही है, लेकिन उत्तरी और पूर्वी भारत ऊर्जा आपूर्ति में पिछड़ता रहा है। अब ये इलाके भी बिजली अधिशेष वाले हो गए हैं। 

इसका श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय ऊर्जा मंत्री पीयूष गोयल को जाता है, हालांकि यह एक दिन के प्रयास का नतीजा नहीं है। करीब 10 साल पहले यह कमी 15 प्रतिशत से ज्यादा थी। हमलोगों ने धीरे-धीरे क्षमता बढ़ा दी, हालांकि इन कुछ वर्षों में भी वृद्धि दर 11-12 प्रतिशत रही थी। यह सब बड़ी संख्या में ऊर्जा उत्पादन इकाइयों के चालू होने, नवीकरण योग्य उर्जा पर जोर देने और बिजली उत्पादन इकाइयों को कोयले की समुचित आपूर्ति के कारण संभव हुआ है। इस दौरान परंपरागत बिजली क्षमता में करीब 49,000 मेगावाट जोड़ा गया। पिछले दो वर्षों में 11,000 मेगावाट बिजली उत्पादन करने वाली गैस आधारित ऊर्जा इकाइयों को पुनर्जीवित किया गया और तापीय विद्युत इकाइयों में कोयले की कमी को दूर किया गया।

कोयला, डीजल तेल, नाफ्था और एलएनजी की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में आई गिरावट के कारण भी बिजली उत्पादन में बढोतरी हुई, क्योंकि इनका बिजली उत्पादन में इस्तेमाल किया जाता है। यह सब पिछले वित्त वर्ष के दौरान घटित हुआ। इसके पहले पेट्रोलियम पदार्थों के उंचे मूल्य के कारण बहुत-से गैर-कोयला तापीय बिजली संयंत्र संचालन की हालत में नहीं थे। पिछले साल वैश्विक स्तर पर पेट्रोलियम पदार्थों के मूल्य में अप्रत्याशित कमी देखी गई। इसके चलते उनकी पर्याप्त मात्रा में आसानी से आपूर्ति होने लगी। इससे उनके मूल्य में इतनी गिरावट आ गई कि कोयला के बजाए डीजल और नाफ्था से बिजली पैदा करना प्राय: फायदेमंद हो गया। इसके अलावा मोदी सरकार द्वारा कोयला खदानों की बोली लगाने के कारण भी कोयला आधारित बिजली संयंत्रों में कोयला की आपूर्ति आसान हो गई, जहां भारत में कुल बिजली उत्पादन का करीब 70 प्रतिशत पैदा किया जाता है।

विश्व बैंक की सहायता से भारत सरकार ने 280 करोड़ रुपए का एक फंड स्थापित किया है। इसका दो रूपों में इस्तेमाल किया जाना है। एक तो इससे नवीकरण योग्य बिजली पैदा करने वालों के हितों की उस स्थिति में रक्षा करना है, जब बिजली वितरक कंपनियों द्वारा उनके भुगतान में देरी हो। दूसरे इसका उद्देश्य बाजार में बदलाव के मद्देनजर वितरक कंपनियों के हितों की भी रक्षा करना है। नया एवं नवीकरण योग्य ऊर्जा मंत्रालय पहले से ही सौर ऊर्जा से संचालित सोलर लैंप जैसी ज्यादातर वस्तुओं पर 30 प्रतिशत सब्सिडी प्रदान कर रहा है, अब उसने इस सुविधा का लाभ सौर्य ऊर्जा से संचालित रेफ्रीजरेशन इकाइयों को देने का किया है, ताकि सौर्य ऊर्जा से संचालित कोल्ड स्टोरेज के उपयोग को बढ़ावा दिया जा सके। 

इस संदर्भ में जहाजरानी मंत्रालय की भी एक महत्वाकांक्षी योजना है। इसकी योजना 2017 के अंत तक देश के सभी बड़े बंदरगाहों पर सौर और पवन आधारित बिजली उत्पादन प्रणाली स्थापित करने की है। इसके तहत करीब 1,000 मेगावाट बिजली पैदा की जाएगी। भारत सरकार अगले पांच वर्ष में सौर, पवन और बायोमास आधारित करीब 10,000 ऊर्जा परियोजनाएं शुरू करने की तैयारी में है, जिनकी औसत क्षमता 50 किलोवाट होगी। इस तरह इससे कुल स्थापित क्षमता में 500 मेगावाट की वृद्धि होगी। 

भारत सरकार ने राज्यों से नवीकरण योग्य ऊर्जा प्रौद्योगिकी और छतों पर सोलर पैनल लगाने के लिए वर्षवार एक्शन प्लान तैयार करने के लिए कहा है, ताकि नवीकरण योग्य उर्जा स्रोतों से 2022 तक 175 गीगावाट हासिल किया जा सके। इसमें सौर ऊर्जा से 100 गीगावाट, पवन उर्जा से 60 गीगावाट, बायोमॉस से 10 गीगावाट और छोटी पनबिजली परियोजनाओं से पांच गीगावाट बिजली पैदा की जाएगी। 

इसका मतलब यह नहीं है कि सभी घरों का विद्युतीकरण किया जा चुका है। करीब एक-चौथाई घर अब भी अंधेरे में डूबे हुए हैं। कई गांवों में अभी बिजली पहुंचनी बाकी है। क्या यह अंतर्विरोध नहीं है? कैसे एक देश एक ही साथ ऊर्जा संपन्न और ऊर्जा विपन्न हो सकता है? इसका उत्तर है नहीं, यह अंतर्विरोध नहीं है। दरअसल, शहर और औद्योगिक बस्तियों को बिजली की ज्यादा जरूरत होती है, इसीलिए मांग बढ़ रही है। इसीलिए गांव अभी तक बिजली की चमक का अहसास नहीं कर पा रहे हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2018 तक सभी गांवों में बिजली पहुंचाने का लक्ष्य तय कर रखा है। इसमें कोई दो राय नहीं कि यह कठिन लक्ष्य है, लेकिन असंभव भी नहीं है। समय की मांग है कि अब और परंपरागत ऊर्जा उत्पादन प्लांट न लगाए जाएं, बल्कि राज्य बिजली बोर्ड में सुधार, ट्रांसमिशन एवं वितरण में होने वाले नुकसान में कमी लाने और नवीकरण योग्य ऊर्जा उत्पादन क्षमता को बढ़ाने की जरूरत है। आखिरकार पर्याप्त ऊर्जा उत्पादन से ज्यादा जरूरी है हर घर तक बिजली पहुंचाना। अब जब पहला लक्ष्य हासिल कर लिया गया है, तो वह दिन दूर नहीं जब हर घर को बिजली पहुंचाने का दूसरा लक्ष्य भी प्राप्त कर लिया जाएगा।



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