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गुरुवार, 16 अगस्त 2018

बाज़ार पर सवार हिंदी

परिवहन के जिन नाव और पानी के जहाज को हम सड़कों और हाईवे के फैलते जाल में फंस कर भूल चुके हैं। आज उन्हीं साधनों की देश को जरूरत है

जब 1991 में पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के शासन काल में नई आर्थिक नीति की शुरुआत हुई, तब भाषा-संस्कृति पर उदारीकरण के पडऩे वाले असर को लेकर तमाम तरह की अटकलें लगाई गईं। ऐसी आशंका प्रकट की जा रही थी कि उदारीकरण की ताकतें स्थानीय भाषा-संस्कृति के लिए घातक साबित होंगी, लेकिन समय के पहिए ने ऐसी आशंका को अभी तक गलत साबित किया है। अब वही इसकी ताकत लगने लगी है। अब ऐसा लगने लगा है कि जो समुदाय जितना ताकतवर होगा, उसी हिसाब से उसकी भाषा-संस्कृति का भी प्रचार-प्रसार होगा। समुदाय की ताकत उसकी आर्थिक सत्ता और कार्यकुशल आबादी से तय होगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने ढाई साल के कार्यकाल में दुनिया को अपनी इस शक्ति का अहसास करा दिया है। 

दुनिया में हिंदी बोलने वालों की संख्या को लेकर परस्पर विरोधी तस्वीर पेश की जाती रही है। हिंदी विरोधी मानसिकता से ग्रस्त लोग आंकड़ो का खेल करने से बाज नहीं आते। इस कारण सर्वथा स्वाभाविक है कि वे हिंदी बोलने वालों की संख्या को कमतर बताएंगे। लेकिन जयंती प्रसाद नौटियाल ने एक शोध में बताया कि हिंदी बोलने वालों की संख्या मेंडरिन (चीनी भाषा) से ज्यादा हो गई है। उनके मुताबिक दुनिया में हिंदी भाषियों की संख्या 1.2 अरब है, जबकि मेंडरिन भाषियों की संख्या एक अरब से कुछ ज्यादा है। नौटियाल का मानना है कि हिंदी बोलने वालों की गणना करते समय प्राय: खड़ी बोली बोलने वालों की ही गिनती की जाती रही है। इसमें हिंदी की सहायक भाषाओं, यथा राजस्थानी, हरियाणवी, मैथिली, भोजपुरी, ब्रज, अवधी आदि बोलने वाले की गिनती नहीं करते। अगर इन सभी को मिला दिया जाए, तो माना जा सकता है कि हिंदी जानने वालों की संख्या मेंडरिन  से ज्यादा होगी। हिंदी विरोधी कह सकते हैं कि यह भी आंकड़ों का खेल है, लेकिन हकीकत यह है कि उक्त क्षेत्रीय भाषाओं को बोलने वालों की पठन-पाठन की भाषा हिंदी ही होती है। भाषाई जागरुकता के अभाव में संभव है कि ये लोग अपनी मातृभाषा के रूप में क्षेत्रीय भाषाओं को ही दर्ज करते-कराते होंगे। लेकिन भाषाई राजनीति करने वालों के लिए यह हिंदी भाषा के खिलाफ  एक हथियार बन गया। हिंदी की इन सहायक भाषाओं को हिंदी के खिलाफ  इस्तेमाल करने से भी ये बाज नहीं आते और यह कहने में गुरेज नहीं करते कि हिंदी से इन सहायक भाषाओं का विकास बाधित होगा। यही वे लोग हैं, जो हिंदी को तमिल जैसी दक्षिण भारतीय भाषाओं के खिलाफ  खड़ा कर देते हैं। बढ़ती राजनीतिक चेतना के कारण इन ताकतों का असर कमतर हो रहा है और हिंदी की स्वीकार्यता गैर-हिंदी क्षेत्र में भी बढ़ रही है। हिंदी सिनेमा, टीवी धारावाहिक और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के कारण भी तमिलनाडु और कर्नाटक में इसके प्रति रुझान बढ़ा है। इस प्रकार माना जा रहा है कि भारत में करीब 78 प्रतिशत आबादी हिंदी बोलने वाली है।

ध्यान देने की बात है कि दुनिया की आबादी सात अरब के आसपास है। उक्त विश्लेषण के हिसाब से दुनिया में हर छठा आदमी हिंदी भाषी है। अब चीन में अंग्रेज़ी सीखने पर जोर है, जबकि हिंदी का भारत ही नहीं, विदेशों में भी प्रचार-प्रसार बढ़ रहा है। हिंदी भाषा से जुडे केंद्र सरकार के एक संस्थान में कार्यरत एक अधिकारी ने बताया कि पिछले 20-25 वर्षों में विदेशी भाषा के छात्रों की संख्या में वृद्धि हुई है। अब चीन, जापान, आस्ट्रेलिया, अमेरिका, यूरोप आदि में हिंदी की पढ़ाई पर जोर है। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस आनलाइन हिंदी शब्दकोश ला चुका है। बुल्गेरिया के सोफिया विश्वविद्यालय में बतौर विजिटिंग प्रोफेसर के पद पर अपनी सेवा देकर अभी हाल ही में भारत लौटे दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक डा. प्रेम सिंह के अनुसार विदेश में हिंदी के दो पहलू हैं। एक तरफ  प्रवासी भारतीय हैं, जो कविता, कहानी, नाटक जैसे रचनात्मक लेखन में लगे हुए हैं, तो दूसरी तरफ  वहां पढऩे-पढ़ाने वाले लोग भी हैं। पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के समय में विदेशी विश्वविद्यालयों में स्थापित हिंदी चेयर पर भारत से भेजे जाने वाले हिंदी के विद्वान इसमें अहम भूमिका अब भी निभा रहे हैं। यूरोप वासियों की धारणा है कि हिंदी भारतीय संस्कृति की वाहक है। हिंदी सीखने के पीछे उनकी मूल सोच यही है, लेकिन उनका भारतीय भाषा-संस्कृति के प्रति वैसा प्रेम नहीं दिखता, जैसा कि पहले कभी हुआ करता था। इस पर दिल्ली विश्वविद्यालय में ही हिंदी के प्राध्यापक प्रदीप कुमार ने बताया कि उनका मूल उद्देश्य व्यावसायिक है। दरअसल, भारत उनकी दृष्टि में एक बड़े बाज़ार के रूप में उभरा है। भारत की विशाल आबादी और आर्थिक विकास दर अपने में कुछ मायने रखता है।

पिछले ढाई साल से मोदी सरकार ने इस प्रक्रिया को तेजी से आगे बढ़ाया है। इस लिहाज से विदेशों में होने वाली प्रधानमंत्री मोदी की यात्राओं के निहितार्थ छिपे हैं। आर्थिक धरातल पर प्रधानमंत्री मोदी ने दुनिया को यह अहसास करा दिया है कि भारत तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था है। साथ ही उन्होंने यह भी जता दिया है कि भारत निवेश और कारोबार के लिए उपयुक्त स्थान है। जाहिर है अगर कोई बहुराष्ट्रीय कंपनी भारत में अपने पैर फैलाएगी, तो उसे भारत की स्थानीय भाषा में लोगों से बात करनी होगी। उत्पादन की भाषा भले ही अंग्रेज़ी हो, बहुसंख्यक उपभोक्ताओं की भाषा हिंदी है। इस कारण मुनाफा कमाने के लिए अभिप्रेरित निजी कंपनियों को उपभोक्ता के स्तर पर संवाद करना होगा। अगर पेटीएम हिंदी में अपना ऐप जारी कर बताता है कि भुगतान करें तो यह हिंदी और हिंदी समाज की ताकत का परिचायक है। यह एक उदाहरण मात्र है, कई निजी कंपनियां बाज़ार में अपनी दखल बढ़ाने के लिए नई तकनीक को हिंदी भाषा में प्रोत्साहित कर रही हैं। निजी कंपनियों को अपना व्यवसाय करने और बढ़ाने के लिए मजबूरन ऐसा करना पड़ रहा है। टीवी पर हिंदी में विज्ञापन अकारण नहीं है।

हिंदी के विकास में नई तकनीक की भूमिका यहीं खत्म नहीं हो जाती। नई तकनीक के कारण हिंदी सात समंदर पार भी पढ़ी, बोली, लिखी और सीखी जा रही है। डा. प्रेम सिंह बताते हैं कि सोफिया में इंटरनेट के जरिए हिंदी सीखने वाले दिखे। इंटरनेट ने हिंदी को सर्वसुलभ बना दिया है। भारत में हिंदी में लिखिए और बात अमेरिका तक पहुंच जाती है। यही नहीं, आपस में संवाद भी हो जाता है। फेसबुक आदि सोशल मीडिया अन्ना, निर्भया जैसे आंदोलनों का वाहक बना। सोशल मीडिया की दुनिया में विचरण करने वाला कोई नौसिखिया हिंदी की ताकत का अहसास कर चौंक सकता है, लेकिन यह आज का यथार्थ बनता जा रहा है। अगर कम खर्च में हिंदी में वेब पत्रकारिता संभव है, तो यह नई तकनीक के कारण है। अंतत: इससे हिंदी का विश्वव्यापी स्वरूप उभर कर सामने आने लगा है। हिंदी भारत के पड़ोसी देशों के अलावा खाड़ी देशों, यूरोप, अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया, सिंगापुर आदि देशों में अपना परचम फ हरा रही है। प्रदीप कुमार इस बात को खारिज कर देते हैं कि इससे हिंदी का स्वरूप विकृत हो रहा है। उनके मुताबिक विकृति का सवाल भाषा से नहीं जोड़ा जा सकता, इसे सामाजिक परिप्रेक्ष्य में देखने की आवश्यकता है।

आर्थिक पहलू के साथ-साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश यात्राओं के सामाजिक-सांस्कृतिक पहलू पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है। जिस आत्मविश्वास के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विदेशी धरती पर हिंदी में प्रवासी भारतीयों को संबोधित करते हैं, वह विदेशों में रहने वाले भारतवंशियों में अपनी भाषा-संस्कृति के प्रति गौरव का भाव पैदा करता है। जरा सोचिए, अमेरिका की धरती पर कोई हिंदी में शान से गाना गाए, तो उससे क्या संदेश जाएगा। मोदी की यह कार्य-शैली हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए कार्यरत कई संस्थाओं पर अकेली भारी है। यहां भी नई तकनीक पूरी दुनिया में ऐसे कार्यक्रमों को प्रसारित कर उसका प्रचार-प्रसार करती है। संयुक्त राष्ट्र में भारतीय नेताओं द्वारा हिंदी में भाषण कोई नई बात नहीं है, लेकिन मोदी सरकार इस मायने में एक कदम आगे बढ़ा चुकी है। वह संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषाओं में हिंदी को भी प्रतिष्ठित करने के लिए प्रयासरत है। इसके पहले खुशखबरी यह है कि संयुक्त राष्ट्र अपने रेडियो वेबसाइट पर हिंदी में एक कार्यक्रम का प्रसारण करेगा।परिवहन के जिन नाव और पानी के जहाज को हम सड़कों और हाईवे के फैलते जाल में फंस कर भूल चुके हैं। आज उन्हीं साधनों की देश को जरूरत है

केंद्रीय सड़क परिवहन, राजमार्ग और जहाजरानी मंत्री नितिन गडकरी कहते हैं, 'दिल्ली या मुंबई से कोई सामान खरीदने की अपेक्षा दुबई या लंदन से सामान खरीदना सस्ता और आसान है।  उनकी यह बात लोगों को आसानी से भले ही हजम न हो। लेकिन इसके पीछे की हकीकत देश में जलमार्गों की जरूरत को रेखांकित करता है। जब 12 अगस्त को उन्होंने वाराणसी में मालवाहक जहाज वीवी गिरि और जय वासुदेव को हरी झंडी दिखाई, तो उनकी कही गई बातों के मायने समझ में आने लगे।

जय वासुदेव 1400 टन माल बलिया लेकर जा रहा था। वीवी गिरि 55 नवनिर्मित मारुति कार लेकर कोलकाता जा रहा था। यह एक ऐतिहासिक यात्रा थी क्योंकि एक बड़ा मालवाहक राष्ट्रीय जलमार्ग-1 के माध्यम से इतने लंबे स$फर पर था। राष्ट्रीय जलमार्ग-1 इलाहाबाद से हल्दिया तक है और इसकी कुल दूरी 1600 किमी है। यह 1986 में अधिसूचित किया गया था लेकिन शायद ही यह कभी इसका कार्गो आंदोलन के लिए प्रयोग किया गया हो। फरक्का से हल्दिया एक अपवाद था, यह एनटीपीसी फरक्का से हल्दिया तक कोयले के ढुलाई के लिए प्रयोग किया जाता था।   

पानी, हर जगह पानी 

भारत नदियों की धरा है। देश में कुल 14,500 किमी जलमार्ग मौजूद है, लेकिन नीति-निर्माताओं का ध्यान महज 4500 किमी (5 राष्ट्रीय जलमार्ग) पर गया है। पश्चिम बंगाल, असम और केरल के कुछ क्षेत्रों को छोड़कर बाकी किसी का उपयोग नहीं किया गया। भारत में कुल माल और यात्री यातायात के लिए सिर्फ 3.5 प्रतिशत जलमार्ग का प्रयोग किया जाता है, जबकि चीन में यह आंकड़ा 47 प्रतिशत है। चीन में लगभग 2 लाख मालवाहक जहाज जलमार्ग का प्रयोग करते हैं, जबकि भारत में सिर्फ 1000 जहाजें अंतरदेशीय जलमार्ग पर चलती हैं। 

जलमार्गों के विकास में इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी बाधक है। मौसम में परिवर्तन के कारण जहाज को गहराई तक पानी नहीं मिल पाता है, इससे इसमें बाधा आती है। भारत में बहुत कम अच्छे बंदरगाह हैं जहां पर माल उतारने और चढ़ाने की उचित सुविधा है। चीन जैसे देशों में मजबूत जलमार्ग प्रणाली है। उनकी जहाजें चालीस हजार टन माल ढोने में सक्षम हैं, जबकि भारत 1,500 टन भार ही ढोने में सक्षम हैं। 

2016 में सरकार ने जलमार्ग का भरपूर प्रयोग करने का फैसला किया। राष्ट्रीय जलमार्ग अधिनियम 2016 के तहत 106 नए जलमार्गों को विकसित करने की घोषणा की गई है। सरकार जल मार्ग विकास परियोजना के तहत वल्र्ड बैंक के सहयोग से राष्ट्रीय जलमार्ग को विकसित कर रही है। यह 4200 करोड़ की परियोजना है। सरकार बुनियादी ढांचे के साथ नदी टर्मिनल, चैनल सर्वे, जीपीएस सिस्टम और सूचना पहुंचाने के लिए भी काम कर रही है। सरकार की जलमार्ग को बढ़ावा देने की मुहिम रंग लाती दिख रही है। 

जलमार्ग परिवहन के कई वित्तीय फायदे हैं। जलमार्ग परिवहन का खर्च 50 पैसा प्रति किमी के हिसाब से आता है जबकि रेल और सड़क परिवहन में 1 रुपए और 1.5 रुपए आता है। भारतीय सड़कें कार्गो मूवमेंट के अनुकूल नहीं हैं। माल पहुंचने में देर होने से किराया भी बढ़ जाता है। जलमार्ग के प्रयोग से सड़क परिवहन पर दबाव कम होगा तथा सड़क दुर्घटनाओं में कमी आएगी और प्रदूषण भी कम होगा। जलमार्ग में सार्वजनिक और निजी निवेश बढऩे से नौकरियों के अवसर भी बढ़ेंगे। भारतीय अंतरदेशीय जलमार्ग प्राधिकरण के चेयरमैन अमिताभ वर्मा ने कहा, 'जल मार्ग विकास प्रोजेक्ट में निवेश से सिर्फ बिहार में पचास हजार लोगों के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार के अवसर उपलब्ध होगा।

अंतरदेशीय जलमार्ग का विकास कई समस्याओं से निपटने में सहायता करेगा। इसके विकास से कई गुना लाभ होगा और इसका दीर्घकालीन असर रहेगा। सरकार के 2016 में किए गए कामों का असर 2017 में देखने को मिलेगा जब देश तरक्की की नई इबारत लिख रहा होगा।   



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