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बुधवार, 12 दिसंबर 2018

बाज़ार पर भारी पड़ा पढ़ाई का ऐतबार

अंधेरी, बदनाम गलियों में रोशनी की पतली-सी महीन रेखा खींचना आसान नहीं है। लेकिन ऐसा करने की जिद ठान बैठी गीतांजलि बब्बर और रितुमोनी दास ने कट्कथा के सहारे दिल्ली के बदनाम मोहल्ले की कथा ही बदल दी

मेट्रो से उतरने के बाद एक जब एक रिक्शेवाले से उस पते पर पहुंचाने के लिए कहा जो एक कागज के टुकड़े पर लिखा था। पहले तो उसने मुझे आश्चर्य से देखा कि क्या मुझे वाकई वहां जानाहै? लेकिन यह जानकर कि मैं उस इलाके में नई हूं, वह जाने के लिए तैयार हो गया। मैं गली गोशियां की तंग गलियों में आगे बढ़ रही थी और लोग मुझे लगातार घूर रहे थे। मैंने एक से पूछा कि चौथी मंजिल पर चलने वाला बच्चों का स्कूल कहां है तो उसने जल्दी से मुझे रास्ता दिखाते हुए बोला- वही स्कूल न जो गीतांजलि चलाती हैं, वही हरी आंखों वाली लड़की? वह रहा... उस तरफ। जैसे-जैसे मैं उन संकरी और अंधेरी सीढिय़ों पर चढ़ रही थी वैसे वैसे मेरी हिम्मत जवाब दे रही थी। आखिरकार मेरी मुलाकात गीतांजलि बब्बर से हुई। गीतांजलि यहां 'कट्कथा’ नाम का एनजीओ चलाती हैं।

मैंने एक बड़े से कमरे में उनकी संस्था का 'सर्किल सेशन’ अटेंड किया। वहां दीवार पर कुछ न कुछ लिखा था। शायद वहां की औरतों और बच्चों ने लिखा हो। उन वाक्यों में बहुत संवेदना थी। 'अब मैं खुल कर बात कर सकती हूं’, 'पहले मैं रो भी नहीं पाता था, अब खुल कर रो लेता हूं’, 'मुझे पढऩा-लिखना बहुत पसंद है’ ऐसे ही कई वाक्य लिखे थे जो साफ इशारा करते थे कि उन औरतों और बच्चों को एक सहारे की कितनी जरूरत थी। गीतांजलि ने उन्हें वह सहारा दिया था। 

सर्किल सेशन में बातचीत करने का वक्त था। वहां पर मैं कुछ सेक्स वर्कर्स से मिली जो अब कट्कथा के 'मैत्री किचेन’ में खाना बनाने का काम करती हैं। 'मैत्री किचेन’ इन महिलाओं को वेश्यावृत्ति से मुक्ति दिला कर रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने की एक बढिय़ा पहल है। यह देख कर मुझे काफी हैरानी हुई जब वह महिलाएं इंग्लिश में बात कर रही थीं, हालांकि कुछ शरमा रही थीं, लेकिन उनमें आत्मविश्वास झलक रहा था। उन्होंने बताया कि वे थोड़े दिनों बाद स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम में भाग लेने भोपाल जाने वाली हैं। नीतू नाम की महिला ने मुझे बताया कि पहले वह महीने में और कभी-कभी तो साल में एक बार बाहर जाती थी। लेकिन दीदी की वजह से अब हम डब्बा (टिफिन) देने रोज बाहर जाते हैं। नीतू जब जी बी रोड आई थी तब वह मात्र 13 साल की थी। संगीता, जिनकी कहानी नीतू जैसी ही थी, मानती थीं की वह कभी कोई सुंदर चीज नहीं बना सकती। मैंने दीदी से कहा कि मुझे कोई सुंदर चीज बनाना सिखाओ। मुझे लगता था कि मैं कभी कोई सुंदर चीज नहीं बना सकती, क्योंकि मैं इतने गंदे व्यवसाय में हूं। इसीलिए उन्होंने मुझे गहने बनाना सिखाया।

कट्कथा की को-फाउंडर रितुमोनी दास बताती हैं कि इन महिलाओं के बच्चे भी अब सर्किल सेशन की नायाब कोशिश को आगे बढ़ा रहे हैं। जब भी वे कोई बात करना चाहते हैं तो एक गोला बना कर बैठ जाते हैं। ऐसा पहले नहीं होता था। वे काफी डरे सहमे से रहते थे, लेकिन ये कट्कथा के प्रयासों का ही नतीजा है कि ये नन्हें बच्चे अब खुद पर यकीन रखते हैं और जिंदगी अपने छोटे-छोटे हाथों से संभालना सीख गए हैं। उन्होंने बताया कि कुछ बच्चे अपनी सबसे प्रिय टीचर को अपने बारे में कुछ बताना चाहते थे। उन्होंने सर्किल सेशन में उनसे खुल कर बातें की और बताया की वे जी बी रोड से आए हैं तो उनकी आंखे भर आईं। उस टीचर ने उन्हें गले लगा लिया और कहा कि उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता। वह हमेशा उनसे प्यार करेगी। यह सर्किल प्यार बांटने का सर्किल था, एक अनोखा सर्किल, एक अनूठा प्रयोग।

अब कोठे देखने का समय हो चला था। औरतें चेहरे पर मेकअप लगा कर कोठों की दहलीज पर बैठी थीं। मेरे साथ कट्कथा के दो वालंटियर भी थे। ये दोनों नौजवान युवतियां हर कोठे की सीढ़ी के पास रुकतीं और हर एक सेक्स वर्कर को गले से लगा लेतीं। आखिर मुझे एक कोठे के अंदर जाने का मौका मिला। एक माचिस के डिब्बे जैसे कमरे में 8-10 महिलाएं थीं। पुरुष आ-जा रहे थे, टोकन बंट रहे थे और एक-एक कर के महिलाएं इन पुरुषों के साथ जा रही थीं। मुझे सभ्य समाज की इस संकल्पना पर हैरानी हो रही थी।

अब उस कमरे में कुछ ही औरतें बची थीं, जो मुझसे बातें कर रही थीं। उन्होंने मुझसे उन्हीं विषयों पर बात की जिन पर हम अमूमन चर्चा करते हैं, जैसे कि राजनीति, बच्चे, गर्भावस्था के बाद औरतों की समस्याएं वगैरह। उन्होंने अपने फोन पर अपने बच्चों की तस्वीरें दिखाई। उनमें से एक ने कहा कि वह विमुद्रीकरण के पक्ष में है, क्योंकि इससे काला धन और भ्रष्टाचार कम होगा, तो एक ने दहेज हत्या पर दु:ख जताया। दिल्ली में दहेज का बहुत चलन है, हमारी तरफ ऐसा रिवाज नहीं है, असम की अंजू बोली।

बात ही बात में मैं उनके पति के बारे में पूछ बैठी। एक ने बताया कि पति ही उसे यहां लाया था। पति नाम का कोई शख्स उनकी जिंदगी में नहीं था। उनके लिए तो परिवार का मतलब था सिर्फ मां और बच्चा। कुछ देर की बातचीत ने मुझे उन औरतों को और भी करीब से जानने का मौका दिया। ये औरतें भी आम महिलाओं की तरह थीं, जो प्यार और सम्मान चाहती थीं और सबसे बढ़ कर एक आम इंसान की तरह अपनी पहचान बनाना चाहती थीं।



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