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बुधवार, 19 जून 2019

अपने दौर की बड़ी पर्यावरणविद

एमएस स्वामीनाथन के 1983 में दिए उस वक्तव्य से कोई भी शायद ही असहमत होगा जिसमें उन्होंने कहा कि इंदिरा जी ‘हमारे जमाने की सबसे बड़ी पर्यावरणविद थीं’

1970 के दशक की एक घटना का हवाला देना चाहूंगा जिससे मैं भी जुड़ा था। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ बैंक मैनेजमेंट, बंबई (वर्तमान में मुंबई) ने 6 करोड़ रुपए की लागत से बांद्रा उपनगर के कार्टर रोड पर पथरीली समुद्र तट पर बैंकर्स ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट स्थापित करने का निर्णय लिया। जमीन की जांच के लिए खुदाई शुरू हो चुकी थी। भवन का ढांचा ऊपर उठे हुए चबूतरे पर बनना तय हुआ, जिसमें सामुद्रिक ज्वार-भाटा के स्वच्छंद आवागमन के लिए फाटक लगाया जाना था। प्रशिक्षणार्थियों के लिए षटकोणीय छात्रावास बनाने की परियोजना बनी, ताकि समुद्र के प्राकृतिक सौंदर्य को आसानी से देख सकें।
शहर के मानद शेरिफ महबूब नसरुल्लाह व ‘ब्लिट्ज’ अखबार के शक्तिशाली संपादक रूसी करंजिया के नेतृत्व में स्थानीय निवासियों ने इसके विरोध में ऐतिहासिक बैठक की। उसी घटनाक्रम में ‘बिजनेस इंडिया’ के संपादक अशोक अडवानी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की नजदीकी सहकर्मी उषा भगत से संपर्क किया। उन्होंने प्रधानमंत्री को इस घटना की सूचना दी और प्रधानमंत्री ने तुरंत सख्त आदेश जारी कर दिया। परियोजना को पुणे स्थानांतरित कर दिया गया। पर्यवेक्षकों के मुताबिक, शहर के पर्यावरणविदों की यह पहली विजय थी। 
यह घटना उनके निर्णय लेने की उसी शैली की तरफ इंगित करता है, जिस पर जयराम रमेश ने अपनी पुस्तक ‘इंदिरा गांधी : ए लाइफ इन नेचर’ में प्रकाश डाला है। वह अत्यंत शालीन, भद्र व व्यक्तिगत संबंधों की कद्रदान, देशी-विदेशी प्रभावशाली व्यक्तियों तथा संस्थाओं के साथ नियमित पत्राचार के माध्यम से संपर्क बनाए रखती थीं। ऐसा भी देखा गया कि दबाव में कभी घुटने भी नहीं टेके, विशेषकर विदेशी संस्थाओं के सामने।
उनकी शासकीय विश्वसनीयता पर कुछ लोग यह तर्क भी दे सकते हैं कि जन आंदोलनों से अप्रभावित उनके अधिकांश निर्णय अमूमन सही होते थे, जबकि वही पर्यावरणीय सक्रियतावाद की वास्तविक आत्मा हैं। यह उनके चरित्र के द्योतक थे। इस प्रवृत्ति की व्याख्या करते दो विचारणीय विषय हैं। पहला था ‘नेचर’ पत्रिका के लिए अनिल अग्रवाल को ‘चिपको आंदोलन’ पर 1980 में दिए गए एक साक्षात्कार के दौरान उनकी टिप्पणी। जब 1973 में आरंभ हुए लोकप्रिय चिपको आंदोलन के शुरू होने के पूरे 7 साल बाद उनसे इस पर जब राय पूछी गई तो उन्होंने स्पष्ट कहा था, ‘ईमानदारी से मुझे नहीं पता कि इस आंदोलन का उद्देश्य क्या है। अगर पेड़ों को न काटने देना इनका उद्देश्य है तो मैं इनके साथ हूं।’ चिपको के संबंध में उनकी क्रिया-प्रतिक्रिया आंदोलन के नेता सुंदरलाल बहुगुणा, एक अंशकालिक पत्रकार जो देश-विदेश के लोगों का ध्यान आंदोलन के प्रति आकर्षित कर रहे थे, के बहिष्कार से जुड़ा था। रामचंद्र गुहा ने 1989 में प्रकाशित अपनी किताब ‘द यूनीक वुड्स’ में कहा, ‘इंदिरा गांधी और उनके सहयोगी इस बात से अनभिज्ञ थे कि चिपको आंदोलन संसाधनों के उपनिवेशीय उपयोग के विरुद्ध कृषक प्रतिरोध आंदोलन की ही कड़ी थी।’
इंदिरा गांधी ने 1972 में डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के प्रतिनिधि से मिलने के एक दिन बाद ही डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के सहयोग से ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ शुरू करने का निर्णय लिया था जो बेहद कामयाब हुआ था। परियोजना के शुरुआती दौर और संभवत: आपातकाल के दौरान अभयारण के रेखांकित इलाकों से ग्रामीण नागरिकों को स्थानांतरित किया गया था। यह कदम उनके सशक्त नेतृत्व का प्रकाश था। उनका नीदरलैंड के राजकुमार बर्नहार्ड से तादात्म्य रहा जो डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के सहसंस्थापक भी थे और जिन्हें वन्यजीवन के संरक्षण की चिंता थी।
 जैसा क‌ि जयराम रमेश याद दिला रहे हैं, 1972 में स्टॉकहोम में संयुक्त राष्ट्र द्वारा आयोजित प्रथम पर्यावरण सम्मलेन में थोड़े अलग ढंग से उनके द्वारा कहे गए वाक्य ‘गरीबी प्रदूषण की सबसे निकृष्ट अवस्था है’ के कारण इंदिरा को विश्वव्यापी सम्मान मिला। यह वाक्य आज भी, सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि विकासशील देश में पर्यावरण संरक्षण से पहले अपने नागरिकों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने की कोशिश को न्यायसंगत और उचित प्रमाणित करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। 
आईयूसीएन के तत्कालीन अध्यक्ष एमएस स्वामीनाथन के 1983 में दिए उस वक्तव्य से कोई भी शायद ही असहमत होगा जिसमें उन्होंने कहा कि इंदिरा जी ‘हमारे जमाने की सबसे बड़ी पर्यावरणविद थीं।’ वास्तविकता में इतिहास में वह इस विशेषण की अधिकारी के रूप भले न जानी जाएं। पर यह सत्य है कि वह अपने जमाने के किसी भी व्यक्ति से बड़ी राजनीतिक नेता थीं जो किसी भी कीमत पर आर्थिक विकास के उन्माद के खिलाफ गईं। पर्यावरण पर पड़ने वाले परिणामों की चिंता किए बगैर पर्यावरण संबंधी कानून की धज्जियां उड़ाने और बिना सोचे विशाल परियोजनाओं का बुनियादी ढांचा बनाने में व्यस्त वर्तमान शासकों की तुलना में इंदिरा गांधी का व्यक्तित्व उत्कृष्ट था।



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