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शुक्रवार, 25 मई 2018

शाहजहांपुर की 'लेडी दबंग’

एक तरफ हिज़ाब और बुर्का तो दूसरी तरफ हाथों में बंदूक। महिलाओं और लड़कियों के विरुद्ध होने वाले अपराधों का फैसला ऑन द स्पॉट करने की मकबूलियत की वजह से शहाना बेगम की शोहरत लगातार बढ़ रही है

उसके नाम से ही सड़क छाप शोहदों और मक्खियों की तरह लड़कियों के आसपास मंडराने वाले लफंगों की नींद उड़ जाती है। महिला रॉबिन हुड की तरह एक भी गोली दागे बगैर बंदूक की बट और बैरल के सहारे वह फैसला 'ऑन द स्पॉट’ करती है।

यह कहानी शाहजहांपुर जिले के गांव सिधौली में रहने वाली बुर्का पहनने वाली 42 वर्षीया विधवा मुस्लिम स्त्री की है। शहाना बेगम का जन्म पीलीभीत के एक किसान परिवार में हुआ था। करीब 20 साल पहले उसकी शादी ट्रक ड्राईवर मोहम्मद शब्बीर के साथ हुई। शादी के कुछ साल बाद ही शब्बीर की मौत हो गई और शहाना अकेली रह गई।

शहाना बेगम कहती हैं, 'जब तक उसके पति जीवित थे तब तक बाज़ार में, राह चलते भद्दी और अश्लील फब्तियों के बावजूद वह सुरक्षित थी।’ लेकिन उसके बाद कई बार उन्हें भी सामंती सोच वाले पुरुष प्रधान समाज का बदसूरत चेहरा दिखा। शहाना बताती हैं कि उसके गांव में दहेज के लिए एक औरत को बुरी तरह से प्रताडि़त किया गया, लेकिन पुलिस इस मामले में निष्क्रिय बनी रही। यहां तक कि उस महिला ने दो बार आत्महत्या का प्रयास भी किया, लेकिन पुलिस ने इस बार भी कुछ नहीं किया। यह सब देखकर उसके मन में इस सब के प्रति घृणा उत्पन्न हुई और उसने महिलाओं को हो रहे अत्याचार से मुक्ति दिलाने की ठानी। महिलाओं को समाज में सम्मान दिलाने के लिए शहाना ने बंदूक के लाईसेंस के लिए आवेदन किया, लेकिन कलेक्ट्रेट के बाबुओं का हाथ गरम नहीं कर पाने की वजह से उसे लाईसेंस नहीं मिला। समय बदला तो प्रदेशकी सरकार बदली। मायावती प्रदेश की मुख्यमंत्री बनी। शहाना ने फिर से लाईसेंस के लिए आवेदन किया, 'मायावती को लाईसेंस दिलवाने के लिए धन्यवाद। अब बंदूक खरीद कर उसके सहारे महिलाओं और लड़कियों को न्याय दिलाने में आसानी होगी।’

एक बार हाथों में बंदूक क्या आई, शहाना बेगम ने फिर कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा। शहाना  बेगम बंदूक के सहारे अब तक सैकड़ों दहेज प्रताडऩा और छेड़छाड़ जैसे मामलों का निपटारा कर चुकी हैं। सड़क छाप लफंगों, गांव-मोहल्ले के दबंगों से लेकर सफेद पोश नेताओं के रिश्तेदारों तक, सबको बंदूक के सहारे शराफत का पाठ शहाना बेगम पढ़ा चुकी हैं।

बंदूक शहाना बेगम के लिए सिर्फ एक हथियार नहीं है। यह एक औज़ार है, जिसके सहारे शहाना महिलाओं के प्रति होने वाले अत्याचार का इलाज करती हैं। गांव की लड़की को कुछ लड़के दो साल से परेशान कर रहे थे। लड़की ने इसकी शिकायत की, माता-पिता को बताया, लेकिन इसका कोई नतीजा नहीं निकला। शहाना को जब इस बात का पता चला उसने अपनी बंदूक उठाई और उन लफंगों को सबक सिखाने निकल पड़ी। शहाना ने उन चारों लड़कों को धर-दबोचा और उनके चेहरे काले रंग से पोत कर पूरे गांव में घुमाया। इस घटना के बाद से गांव की लड़कियोंकी तरफ आंख उठा कर देखने की किसी ने हिम्मत नहीं की।

एक बार एक लड़के ने बलात्कार के इरादे से गांव की एक लड़की का अगवा कर लिया। लेकिन 'लेडी दबंग’ शहाना ने उस लड़की को एक रात में ही बरामद कर लिया और उस लड़के के मां-बाप पर अगले ही दिन लड़की के साथ शादी करवाने का दवाब डाला। दोनों की शादी हो गई और अब उनका एक सुखी परिवार है। बंदूक के साथ शहाना हर दिन अपने घर पर पंचायत लगाती हैं। पंचायत में गांव की लड़कियां और महिलाएं अपनी समस्या लेकर आती हैं। गांव की एक लड़की सीमा कहती है, 'हम सब उनकी आंख और कान हैं। जब भी किसी मामलेकी सूचना मिलती है, शहाना चाची एक घंटे में मामले का हल कर देती हैं।’ शहाना की इस दबंगई के कायल सिर्फ गांव वाले ही नहीं, महिलाएं और लड़कियां ही नहीं, आसपास के गांव के लोग भी हैं। जिनकी नज़र में शहाना का अंदाज़ न्याय संगत है। वरिष्ठï पुलिस अधिकारी का कहना है, 'बंदूक की नोक पर किसी को धमकाया जाना सही नहीं है और न ही उसके सहारे किया जाने वाला फैसला।’ लेकिन गांव वालों और पड़ोसियों के समर्थन की वजह से शहाना के खिलाफ पुलिस थाने में शिकायत दर्ज करवाने का साहस अब तक किसी ने नहीं किया है। फैसला ऑन द स्पॉट किए जानेकी वजह से आसपासकी गांव में महिलाओं के खिलाफ होने वाले अत्याचार का ग्राफ तेजी से नीचे गिरा है।

नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि उत्तर प्रदेश में महिलाओं के विरुद्ध होने वाले अपराध का आकड़ा पिछले चार सालों में 34 प्रतिशत तक जा पहुंचा है। बदांयू बलत्कार कांड से लेकर आज तक तमाम कोशिशों के बावजूद इस तरह के अपराधों में कोई कमी नहीं हुई है, जबकि अखिलेश सरकार ने इसे रोकने के लिए 1090 महिला हेल्पलाइन, डायल 100 और कई व्हाट्स ऐप समूहसक्रिय किए हैं।

उस प्रदेश में जहां एफआईआर दर्ज करवाना आज भी एक कठिन काम है और बहुत सारी पीडि़ताएं सामने आकर अपना दर्द बताना नहीं चाहतीं, ऐसे राज्य में शहाना बेगम एक बेमिसाल मिसाल हैं।



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