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बुधवार, 19 सितंबर 2018

नगालैंड के गांधी

उत्तर पूर्व के अलगाववादी लपटों के बीच शांति की आवाज़ बना एक शख्स

एक ऐसे समय में जब नगालैंड के पवर्तीय इलाके अलगाववादी आग से झुलस रहे थे, वहां 1955 में गुजरात से एक युवक आया। युवक के पास गांधी के सत्य और अहिंसा का संदेश था। चार दशक बाद वहां उस युवक की ख्याति ऐसी फैली कि लोग उन्हें 'नगालैंड के गांधी’ के तौर पर जानने लगे। यह सब हुआ वहां के एक सुदूरवर्ती गांव मोकोचुंग में बैठकर उनके निस्वार्थ सेवा कार्य से। नटवर ठक्कर नाम के इस युवक को लोग आमतौर पर नटवर भाई कहकर बुलाते हैं।

नटवर भाई 23 साल की उम्र में नगालैंड आए और तब से वे यहीं के होकर रह गए। नटवर के लिए यहां काम करना आसान नहीं था। वहां सक्रिय अलगाववादी समूह नगा नेशनल काउंसिल (एनएनसी) ने उन्हें च्युचामलांग छोडऩे की बार-बार धमकी दी। च्युचामलांग में ही उन्होंने गांधी आश्रम की स्थापना की है। दिलचस्प है कि ठक्कर भाई को यहां अलोकप्रिय करने के लिए तमाम तरह के यत्न किए। यहां तक कि उन पर यह तक आरोप लगा कि वे जासूस हैं और यहां की गतिविधियों के बारे में खबर आतंकियों देने का काम उन्हें दिया गया है।  

साठ और सत्तर के दशक में नगालैंड की हालत बहुत तनावपूर्ण थी। बागी नगा भारत से अलगाव से कम कुछ भी मंजूर करने को तैयार नहीं थे। इस काम के लिए वे न सिर्फ कई विदेशी ताकतों के संपर्क में थे, बल्कि उन्हें अपने आंदोलन के लिए बाहर से हथियार और प्रशिक्षण तक तक मुहैया हो रहे थे। जाहिर है कि अलगाववादियों को ठक्कर की सक्रियता से खासी परेशानी हो रही थी, इसीलिए उन्हें बार-बार नगालैंड छोडऩे के लिए कहा गया। अच्छी बात यह रही कि ठक्कर को तब के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से काफी सहयोग मिला। नेहरू ने ठक्कर भाई को गांव में रहकर काम करने में जुटे रहने के लिए न सिर्फ प्रेरित किया, बल्कि इसके लिए बढ़ावा भी दिया। इसके लिए नेहरू जी ने उन्हें राशि भी मुहैया कराई।



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