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मंगलवार, 11 दिसंबर 2018

नीति निर्माण के नुस्खे

नीतियां बनाते वक्त सरकार की मंशा तो अच्छी ही होती है, लेकिन उन्हें बनाते वक्त तथ्यों की जगह भावनाएं हावी हो जाती है। नतीजतन नीतियों का पूरा लाभ उन्हें नहीं मिल पाता, जिनकेलिए उन्हें बनाया जाता है

डाटा कलेक्शन तथा सही प्रमाण के महत्व को दर्शाता हुआ दो दिवसीय कार्यक्रम का आयोजन दिल्ली में हुआ। यह कार्यक्रम इंटरनेशनल इनिशिएटिव फॉर इम्पैक्ट इवैल्यूएशन (३आईई) द्वारा आयोजित किया गया जिसका मुख्य उद्देश्य था किसी नीति के मूल्यांकन और प्रभाव की समीक्षा करना आयोजकों की चिंता इस बात की थी कि हमारे देश के नीति निर्माता नीतियां बनाते समय अपनी सोच के चरम पर पहुंच जाते हैं, क्योंकि उन नीतियों का असली डेटा से कोई नाता नहीं होता। नीतियां बनाते वक्त काल्पनिक एवं मनमाने ढंग से अटकलें लगाते हुए वे नीतियां बनाते हैं जो बहुत बार अपेक्षित परिणाम देने में विफल हो जाती हैं। या फिर यह कहें कि नीतियां बनाते समय असल तथ्यों और डेटा का इस्तेमाल करना हमारे वर्क कल्चर में शामिल ही नहीं है। यही वजह है कि नीतियां भले ही लोगों की भलाई के लिए अच्छी भावना से बनाई गई हों फिर भी उन्हें फायदा नहीं पहुंचा पातीं जिनके लिए उसे बनाया गया है। विषय कुछ भी हो, स्वच्छता, जल या फिर शिक्षा, नीतिकार हर बार डेटा को नज़रअंदाज करने की भूल कर बैठते हैं। इसी बड़े मुद्दे की तरफ ध्यान दिलाने की मंशा से इंटरनेशनल इनिशिएटिव फॉर इम्पैक्ट इवैल्यूएशन (३आईई) संस्था ने इंडिया हैबिटेट सेंटर में दो दिवसीय कार्यक्रम आयोजित किया जिसका मुख्य उद्देश्य था पानी, स्वच्छता और शिक्षा के क्षेत्र में मौजूद तथ्यों और डेटा के इस्तेमाल के महत्व पर अपने भारतीय और विदेशी सहकर्मियों से चर्चा करना।       

विश्व भर में लगभग 946 मिलियन लोग खुले में शौच करते हैं, जिसमें से 490 मिलियन लोग सिर्फ भारत में हैं। भारत के गांवों में एक-तिहाई से भी कम लोगों के घर शौचालय हैं, और उससे भी कम लोग इसका इस्तेमाल करते हैं।  

यही वजह है कि 3आईई ने 'रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर कॉम्पैशनेट इकॉनामिक्स’ (राइस)के सहयोग से कम लागत वाले मूल्यांकनों को अनुदान प्रदान किया है जो ग्रामीण भारत में शौचालय के इस्तेमाल के प्रति जागरुकता बढ़ाने के प्रमाण जुटा सके। 3आईई की उप कार्यकारी निदेशक ज्योत्सना पुरी ने कहा, 'भारत में स्वच्छता संकट से निपटने के लिए लगातार और समन्वित प्रयासों के लिए उच्च गुणवत्ता वाले सबूत द्वारा निर्देशित होने की जरूरत है। हमें यह जानने के प्रयास करने होंगे कि कौन से कार्यक्रम सफल हैं और कौन से नहीं।’

वाटर सप्लाई एंड सैनिटेशन कोलाबोएटिव के निदेशक क्रिस विलिअम्स ने अपने संबोधन में कहा, 'खुले में शौच को समाप्त करने के लिए, आप को सभी स्तरों पर यानी समुदाय से ले कर, ब्लॉक, जिला और राज्य के अधिकारियों तक सभी के साथ संवाद करने की जरूरत है। सिर्फ इतना ही नहीं कि आप सिर्फ खुले में शौच मुक्त होने कि बात करते रहें, साथ ही साथ शौच के बाद स्वच्छता के बारे में भी बात की जानी चाहिए।’

कुछ इसी तरह की विडम्बना शिक्षा के क्षेत्र में है। 3आईई की एक नई रिपोर्ट में कहा गया कि हाल में हुए शोधों में शिक्षा के क्षेत्र में अधिकाधिक निवेश करने पर जोर दिया गया है, लेकिन केवल अधिक धन निवेश ही इस क्षेत्र की समस्याओं का समाधान नहीं है। इस क्षेत्र की समस्याओं पर ध्यान आकर्षित करने के लिए 3आईई ने अब्दुल लतीफ जमील 'पोवर्टी एक्शन लैब’ (जे-पल) के सहयोग से वैश्विक शिक्षा जैसे महत्वाकांक्षी विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया। पैनल में सरकार, सिविल सोसाइटी और शिक्षा विशेषज्ञों ने भाग लिया। इनमे पूर्व पत्रकार संजॉय नारायण, दिल्ली के उप मुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया की सलाहकार आतिशी मारलेना, सेंट्रल स्क्वायर फाउंडेशन के चयरमैन और संस्थापक आशीष धवन, किरण भट्टी वरिष्ठ फेलो सेंटर फॉर पालिसी रिसर्च, प्रणव कोठारी, वाईस प्रेसिडेंट, लार्ज स्केल एजुकेशन प्रोग्राम, एजुकेशन इनिशिएटिव और प्रथम एजुकेशन फाउंडेशन की सीईओ रुक्मिणी बनर्जी मुख्य थे।

आतिशी मारलेना ने कहा, 'अगर शिक्षा के क्षेत्र में किसी पालिसी के बेहतर होने की सम्भावना के पर्याप्त प्रमाण है तब भी हमें उस पालिसी को लागू करने के लिए सिस्टम तो चाहिए। ज्यादा से ज्यादा शोधकर्ताओं को सिस्टम में शामिल करने की जरूरत है, ताकि हम समय समय पर उनसे सलाह ले कर पॉलिसी बना सकें।

वहीं रुक्मिणी बनर्जी का कहना था कि हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हर क्षेत्र में प्रमाण व्यवस्थित हो और सभी तक डेटा की पहुंच हो।

किरण भट्टी ने भी अपने संवाद में इसी तरह का जिक्र किया कि हमें शिक्षा में मौजूद डेटा को केंद्रीकृत करने की बहुत जरूरत है। और हमें यह भी देखना होगा कि भारत में शिक्षा की वास्तविक स्थिति से जुड़े हुए हों।



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