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बुधवार, 18 जुलाई 2018

'हम ही हैं सरकार!’

बांस, जंगल और मानुष बचाने की मुहिम एक छोटे से गांव से शुरू हुई, क्योंकि जंगल उनके जीवन का आधार था और बांस अर्थव्यवस्था की रीढ़। बांस और जंगल के सहारे अपनी अस्मिता को बचाने की लड़ाई ने इस गांव को अपनी सरकार बनाने और चलाने की प्रेरणा दी

क्या कोई ऐसा देश भी है इस भूमंडल में जहां मंदिर नहीं है, मस्जिद नहीं है, गिरिजाघर नहीं है, धर्म नहीं, जाति नहीं, ऊंच नहीं, नीच नहीं, गालियां नहीं है, स्तुतियां नहीं है, चोरी नहीं, बलात्कार नहीं, दारू नहीं, हत्या नहीं और आत्महत्या भी नहीं। बांस हो या कोई भोजपत्र, धान हो या दूसरी कोई फसल, अल्टीमेट मालिक ग्राम समाज है, जहां ग्राम समाज के निर्णय के बिना कोई पत्ता तक नहीं हिलता, जहां एक औरत भी 'ना’ कर दे तो 'हां’ न हो।

प्रात: आठ बजे का गढ़चिरौली (महाराष्ट्र)। घने जंगलों के पुराने-पुराने, ऊंचे-ऊंचे दरख्तों से बमुश्किल छन-छन कर पूर्वाह्नï की धूप कई राहें खोल देती है। जिस राह से भी आना हो एक बार जरूर आ जाओ मेंढा-लेखा। आखिर इस मेंढा-लेखा में है क्या? धानौरा तहसील जाने वाली मुख्य सड़क से दाईं ओर आधे फर्लांग की दूरी पर जमीन पर उगा बेहद मामूली गांव ही तो हैं-मेंढा-लेखा। औचक चले जाइए तो वहां संभव है आपके स्वागत में कोई नाटा कृष्णकाय बहुत ही मामूली आदमी आकर खड़ा हो जाए- देवाजी तोपाजी, उम्र 60 के आसपास (यह स्थिति 2012 की थी)। हमारी टीम को देखकर धंसे खपरैलों और फूस के घरौंदों से बिल-बिलाकर कुछ ग्रामवासी निकल आए। हम उन्हें देख रहे थे और वे हमें। दोनों एक-दूसरे के लिए अजूबे। गांव के लोगों द्वारा मिलकर बनाए गए सभाघर में स्त्री-पुरुष आकर बैठते हैं। तोपा जी हाथ जोड़कर खड़े हो जाते हैं- 'इतने बड़े-बड़े लोग हमारे गांव में आए हैं, हम स्वागत करते हैं।’

'हमने आपके बारे में काफी सुना है, सो देखने चले आए।’

'ऐसा क्या है हमारे गांव में जो आपके गांव में नहीं है? जो सूरज आपके यहां चमकता है वो सूरज हमारे यहां भी। जो तारे वहां दिखाई पड़ते हैं, वो यहां भी, जो हवा वहां बहती होगी, वो हवा यहां भी।’

'माना। फिर भी कुछ तो है जो हमसे अलग पहचान देती है आपको। वह क्या है, यही देखने तो आए हैं इत्ती दूर से चलकर। हमारा फोन तो मिला होगा आपको।’

'हां।’

'तोपा जी आपका धर्म कौन-सा है?’

तोपा जी के चेहरे से लगा, सवाल उनकी समझ में नहीं आया।

'हमारे एक मित्र ने स्पष्ट किया, हम धर्म पूछ रहे हैं, जैसे हिंदू, इस्लाम, ईसाई वगैरह, वगैरह’...।

'धर्म? पता नहीं! आप पूछेंगे तो नहीं बता पाएंगे।’

'आप लोगों को क्या कहा जाता है?’

'कोया’ तोपा जी ने बताया।

हम चौंके?, 'कोया का मतलब’

'आदमी।’

'आदमी माने गोंड?’

'बाहर से आने वाले अपने हिसाब से मतलब निकालते रहते हैं।’

'अच्छा ये बताइए आपके देवता कौन हैं?’

'हमारे गांव के देवता.....’ देवाजी अटकते से लगे- 'बूढ़ा देव, सात देव, पांच देव, छह देव! बस्तर का अबूझमाड़ देखें हैं, उसी का विस्तार है यह। दादा-परदादा-लकड़दादा की बात है सात किलोमीटर पर छत्तीसगढ़ का राजनाद गांव है।’

एक दूसरे आदमी ने बताया, 'कुछ लोगों ने धर्म बदला था।’ बदला माने नया धर्म अपनाया था। छोड़कर फिर लौट आए। हिंदू धर्म में?’

'हम न हिंदू, न मुसलमान, न ईसाई, न बौद्ध। बस कोया हैं साहब, कोया। क्या आदमी के लिए आदमी बने रहना ही काफी नहीं है?’

हमें पूरी तरह निरुत्तर कर दिया उस बूढ़े ने। आगे क्या बोलें कुछ देर तक समझ में नहीं आया। फिर हमारे मित्र प्रेम ने पूछा- 'आप लोग कुल कितने हैं यहां?’

'मेंढा-लेखा में 105 कुटुंब और 500 लोग हैं।’

वैसे तो वे स्वयं को एक घोषित कर रहे थे, लेकिन थोड़ी देर में लगा कि थोड़ी दिक्कत है। एक औरत ने बताया-'हमारा हियी कोई बड़-छोट नहीं होता सब कोया समान’, लेकिन एक दूसरी औरत ने कहा कि शादियों में गोत्र का अंतर देखते हैं, जैसे एक शादी हुई थी, वे सात देव थे हम पांच देव।

'अच्छा, बारात के खाने-पीने की व्यवस्था कौन करता है?’

'लड़के वाले’

'आपके यहां लड़की जाती है ब्याहने या लड़का आता है?’

'लड़की जाती है ब्याहने’

 'पंडित जी तो आते होंगे ना’

'वो क्या होता है?’

'अरे वही जो विवाह कराता है, पुजारी।’

यह बात उनके समझ में न आई। कई औरतों में पूछ-पुछौव्वल होने लगी। सब हंसने लगे।

'हमरा यहां कोई पंडित-संडित नहीं होता, सरपंच बियाह कराता है।’

'नाच-वाच तो होता होगा? जैसे झाड़ी-पट्टी वाले.....’

'ये मुल्गा वालों का काम हैं, चाहेंगे तो करेंगे।’

देवाजी ने 1927 से अब तक की सारी परतें निश्छल भाव से खोल रखी थीं। फिर कहा, 'आप लोग इंटरनेट पर इन चीजों को देख सकते हैं, कभी देखा है?’

हम एकबारगी झेंप गए।

'खैर जो इंटरनेट पर नहीं है, वह जान लीजिए।’ तोपा जी ने हमें शर्म से उबारते हुए बताया कि किस तरह 1950 से 1980 तक बांस के व्यापारी और कागज की मिल वाले भर गए।

हमारी नजरें चारों तरफ चक्कर लगाने लगीं नजदीक की पहाडिय़ों पर बांस ही बांस-वेणुवन!

'कोया लोग तो अबूझमाड़ से आए हुए जंगली थे। एक जमाना वह भी था जब बाहर का आदमी आता तो हम भागकर जंगलों में जा छुपते।’

'और एक जमाना ये है कि आप 2003 में डरबन, दक्षिण अफ्रीका के विश्व पार्क में लेक्चर देने गए थे, दुनिया में कितने-कितने लोग अध्ययन करने आ रहे हैं आप लोगों पर, आप आईकॉन बने हुए हैं।’ हम में से किसी ने खीझ कर कहा-'गलत...गलत...गलत..! हीरालाल जी, वृक्षमित्र जी, देवाजी तोपाजी हमारे आईकॉन नहीं हो सकते। हमारे आईकॉन सचिन, माधुरी दीक्षित या अभिताभ बच्चन हैं। हमारे एक सदस्य ने निर्विकार तोपा जी से पूछा-'तोपा जी आप इन्हें जानते हैं क्या?’

'इन्होंने देश के गरीब आदमियों के लिए जान दी है क्या?’

तोपा जी के मासूम सवाल ने हमें फिर शर्म से डूब मरने के लिए प्रेरित किया।

तोपा जी इतिहास बता रहे थे। '1970 में मध्य प्रदेश में एक डैम बनाकर सरकार ने हमारा भला करना चाहा। पनबिजली बनती। हमने देखा कि डूब और कटाव में हमारा जंगल ही तहस-नहस हो जाएगा। 1982 में मेंढा-लेखा और आस-पास के क्षेत्रों ने विरोध किया। बाबा आम्टे, बहुगुणा जी, बी.डी शर्मा जी और सब आ गए। वहां से लौटकर हमने चार-पांच साल गहरे सोच-विचार के बाद तय किया कि ढुलमुल तरीका छोड़कर क्यों न हम स्वराज और स्वशासन का पुख्ता आधार बनाएं। हमने एक छोटा डैम, कच्चा रास्ता और ये पंचायत भवन, जहां सब बैठे हैं, सब अपने हाथ से बनाए हैं। सब शेतकरी हैं। मूलत: शिकारी। जंगल हमारा आधार है और बांस हमारा मेरुदंड।’

बांस बचाओ, जंगल बचाओ, मानुष बचाओ का आंदोलन मेंढा-लेखा से शुरू हुआ। उटंग साड़ी, उटंग धोती, लहराते हाथ, जवान बच्चे, एकाध बूढ़े। नेतृत्व दे रहे थे बाबा आम्टे, अभयबंग, वृक्षमित्र, हीरालाल, बी.डी शर्मा और नारा गूंज रहा था 'दिल्ली-बंबई में हमारी सरकार, हमारे गांव में हम ही सरकार’। हम तय करेंगे कि चिरौंजी का रेट क्या होगा, तेंदू पत्ते का रेट क्या होगा, महुआ का रेट क्या होगा, बांस का रेट क्या होगा। 118 हेक्टेयर जंगल पर हमने बांस का बेड़ा बनाकर सीमा बना दी है। यहां हमारे परमिशन के बिना पत्ता भी नहीं खड़क सकता। किसी कमिश्नर ने ऑर्डर भेजा था अंग्रेजी में, हमने लौटा दिया- 'हमसे कुछ कहना है तो हमारी भाषा में कहो।’

सबसे आश्चर्य था वहां का 'कुरमा घर’, जहां मासिक धर्म के समय औरत को ससम्मान रखते थे, ताकि उसे कोई काम न करना पड़े। गाय-भैंस का दूध कोई नहीं पीता, दूध, बछड़ों, पाड़ो के पालन के लिए है।

समूचे देश में तीन लाख से ज्यादा कृषक आत्महत्याएं हो चुकी थीं। हमने पूछा 'यहां किसी ने आत्महत्या की।’ कोया लोगों को मुंह आश्चर्य में खुला रह गया। कैसी आत्महत्या। ईश्वर, जाति, मंदिर, घूस, शराब, कपट की तरह आत्महत्या भी उनके लिए अपरिचित शब्द था।



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