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रविवार, 24 मार्च 2019

कबाड़ का कारोबार

गली-गली घूम कर कबाड़ खरीदने वाले कबाडि़ए तो आपने बहुत देखे होंगे, लेकिन कबाड़ के इस कारोबार के सहारे कंपनी चलाने का आइडिया मध्य प्रदेश के तीन छात्रों के दिमाग में आया और वहीं से शुरू हो गया एक और स्टार्ट अप 'भंगारचंद डॉट कॉम’

मध्य प्रदेश के विदिशा जिले की रहने वाली सीमा एक टोल फ्री नंबर पर फोन करती हैं। फोन करने के कुछ देर बाद भंगारचंद का कर्मचारी उनके घर आता हैं। और उनका कबाड़ ले जाता हैं। कबाड़ के बदले में वह सीमा को पैसे भी देता हैं। सीमा इससे बेहद खुश हैं। पहले सीमा को कबाड़ फेंकने के लिए घर से बाहर जाना पड़ता था, लेकिन अब बाहर जाने की जरूरत नहीं पड़ती है। विदिशा शहर में सीमा जैसी हजारों लोग अपने घरों का कबाड़ इसी तरह भंगारचंद को देते हैं। 'भंगारचंद’ एक वेस्ट मैनेजमेंट कंपनी है। इसे इंजीनीयरिंग के तीन छात्रों ने अप्रैल 2015 मिल कर शुरू किया। इन छात्रों का नाम सूर्यप्रताप सिंह, शशांक शर्मा और प्रशांत रघुवंशी है। ये छात्र विदिशा के सम्राट अशोक टेक्निकल इंस्टीट्यूट में पढ़ते हैं। अब तक कंपनी से तकरीबन 2000 लोग जुड़ चुके हैं। 'भंगारचंद’ फिलहाल विदिशा शहर में काम कर रही है, लेकिन जिस तेजी से इसके ग्राहक बढ़ रहे हैं, उसे देखते हुए आने वाले समय में इसे अन्य शहरों में भी शुरू करने की योजना है।  भंगारचंद कंपनी का कर्मचारी घर आता है और इलेक्ट्रानिक कांटे से कबाड़ तौल करके ले जाता है। और कबाड़ का भुगतान तत्काल कर देता है। 

डस्टबिन देखकर आया आइडिया

ईको क्लब के तहत अशोक टेक्निकल इंस्टीट्यूट में जगह-जगह डस्टबिन लगाएं गए थे। छात्रों को कॉलेज में डस्टबिन देखकर 'भंगारचंद डॉट काम’ नाम से स्टार्टअप का आइडिया दिमाग में आया। 'भंगारचंद’ के सीईओ शशांक शर्मा बताते हैं, 'कॉलेज में डस्टबिन में कचरा देखकर हम लोगों को आईडिया मिला कि हमें कचरे के अलावा कबाड़ के सामान पर भी ध्यान देना चाहिए। कबाड़ को रिसाइकिल करने के मकसद से 'भंगारचंद डॉट काम’ शुरू किया गया है।’    

छोटी राशि से शुरू किया स्टार्टअप

डस्टबीन से छात्रों को कंपनी का आइडिया तो मिल गया, लेकिन उसे शुरू करने के लिए पूंजी (पैसे) की जरूरत थी। तीनों उस वक्त कॉलेज में पढ़ रहे थे। लिहाजा, इनके पास पैसे नहीं थे। लेकिन कहते हैं न कि मंजिले उन्हीं को मिलती है जिनके सपनों में जान होती है, पंखों से कुछ नहीं होता हौसलों से उड़ान होती है’। तीनों छात्रों के हौंसले बुलंद थे। इन लोगों ने घर से मिलने वाले पॉकेट मनी

से 'भंगारचंद’ की शुरूआत की। मात्र 20,000

रुपए की छोटी राशि से 'भंगारचंद’ की शुरूआत हुई। 

कॉलेज का मिला सपोर्ट

तीनों छात्रों के सपने को पंख लगाने में कॉलेज प्रबंधन ने भरपूर मदद की। मैनेजमेंट अपने कॉलेज का कबाड़ 'भंगारचंद’ को ही बेचता है। शहर में घूम-घूमकर कबाड़ बीनने वाले लोगों को 'भंगारचंद’ कंपनी से जोड़ा और उन्हें बकायदा ट्रेनिंग दिया गया। ऑनलाइन और टोल फ्री नंबर

के जरिए कबाड़ बेचने की पहल विदिशा के साथ पूरे देश में लोकप्रिय हो रही है। शशांक बताते हैं, 'देश के अन्य शहरों में भी इसे शुरू करने

के लिए फोन आते रहते हैं। आने वाले समय में

हम दूसरे शहरों में भी काम शुरू करेंगे।’ दिन प्रतिदिन 'भंगारचंद’ के ग्राहकों की संख्या बढ़ रही है। और साथ ही व्यापार भी बढ़ रहा है। छात्रों की ऑनलाईन कबाड़ खरीदने की यह अनोठी

कोशिश है।



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