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सोमवार, 22 अप्रैल 2019

वर्जीनिया वुल्फ - नारीवादी संघर्ष की अक्षर धुरी

20वीं सदी के आरंभ में जब देश और समाज हर तरह की पराधीनता से जूझ रहे थे। उसी दौर में वर्जीनिया वुल्फ महिलाओं को स्वतंत्रता का नया अर्थ समझा रही थीं

वर्जीनिया वुल्फ अपने बेहतरीन उपन्यासों और निबंधों के लिए जानी जाती हैं। उन्हें औरतों के लिए साहित्य की दुनिया में जगह बनाने के लिए जाना जाता है। जहां उनकी रचनाएं अब भी प्रासंगिक बनी हुई हैं, वहीं उनके कई उपन्यासों पर बेहतरीन फिल्में भी बन चुकी हैं।
वर्जीनिया वुल्फ का जन्म 25 जनवरी, 1882 को लंदन के केन्सिंगटन में हुआ था। उनका नाम पूरा एडेलीन वर्जीनिया स्टेफन है। उनके माता-पिता प्रतिष्ठित लोग थे। उनकी परवरिश भी साहित्यिक माहौल में हुई थी। वह काफी कम उम्र से ही लिखने लगी थीं।
1895 में उनकी मां का निधन हुआ, जिसके बाद वह मानसिक रूप से टूट गईं। 1904 में उनके पिता का निधन हो गया। यह भी वह बर्दाश्त नहीं कर पाईं। लेकिन इसी साल उनकी पहली रचना दिसंबर में ‘टाइम्स लिटरेरी सप्लीमेंट’ में प्रकाशित हुई। 1912 में उन्होंने लियोनार्डो वुल्फ से शादी कर ली। इसके बाद उनका असल साहित्यिक करियर शुरू हुआ। वह उस वक्त के जाने-माने लेखकों के ब्लूम्सबरी ग्रुप में शामिल हो गईं।

साहित्यिक योगदान
1915 में उनका पहला उपन्यास ‘द वोयेज आउट’ पब्लिश हुआ। इससे उन्हें काफी ख्याति मिली। उन्होंने इसके बाद इस दुनिया से जाने तक लिखा। उनके प्रसिद्ध उपन्यासों में ‘ऑरलैंडो’, ‘मिस डैलोवे’, ‘बिटवीन द एक्ट्स’, ‘नाइट एंड डे’ और ‘द इयर्स’ हैं। उनका प्रसिद्ध निबंध है- ‘ए रूम ऑफ वन्स ओन’। उन्हें उनके साहित्यिक योगदान के लिए मार्गरेट एटवुड और गैब्रिएल गार्सिया मार्खेज की श्रेणी में रखा जाता है। वर्जीनिया वुल्फ का लेखन 1970 के नारीवादी संघर्ष में आंदोलनकारियों के लिए प्रेरणास्रोत था।
वर्जीनिया वुल्फ को लोग जन्मजात प्रतिभावान मानते हैं। ऐसा उनके जीवन को देखकर भी लगा है। बचपन से ही साहित्य में वह पूरी तरह रच-बस गई थीं। उन्होंने इंग्लिश क्लासिक्स से लेकर विक्टोरियन लिटरेचर तक को पढ़ा और दुनियाभर में महिलाओं को लेखन और जीवन जीने के बिंदास सूत्र दिए। वह न सिर्फ पश्चिम में ही लोकप्रिय थीं, बल्कि दुनिया भर में उनकी लेखनी का जादू सिर चढ़कर बोला। 
वर्जिनिया वुल्फ अपने बचपन ने इंग्लिश क्लासिक्स और विक्टोरियन लिटरेचर को पूरी तरह घोलकर पी गईं लेकिन वर्जीनिया वुल्फ ने लेखन की शुरुआत 1900 में की। उनका पहला उपन्यास ‘द वोयेज आउट’ 1915 में प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास को उनके पति लियोनार्ड वुल्फ के प्रकाशन संस्थान हॉगर्थ प्रेस ने छापा था। उनके श्रेष्ठ उपन्यासों में ‘मिसेज डैलोवे (1925)’, ‘टू द लाइटहाउस (1927)’, ‘ऑरलैंडो (1928)’ खास तौर से पहचाने जाते हैं। उन्होंने एक लंबा निबंध ‘अ रूम ऑफ वन्स ओन’ भी लिखा, जिसमें उनका कहना था कि अगर औरतों का फिक्शन लिखना है तो औरत के पास अपना पैसा और कमरा होना चाहिए।
वर्जीनिया वुल्फ की यादगार उक्तियां उन्हें आज भी लोकप्रिय बनाए हुए हैं और उनकी कही बातें आज भी भविष्य के राइटर्स के लिए सूत्र वाक्य हैं। उन्होंने ऐसा ही एक सूत्र ‘ए रूम ऑफ वन्स ओन’ नामक अपने लेख में दिया है, जिसमें वह लेखन करने वाली महिलाओं के लिए अलग कमरे की बात करती हैं।  इसे पढ़कर साफ लगता है कि 20वीं सदी की शुरुआत में ही वर्जीनिया दुनियाभर की महिलाओं की निजता और उनकी सुरक्षा के सवाल को उठा रही थीं। उनके आगे यह साफ हो गया था कि पुरुष, परंपरा और समाज के बीच स्त्री के जीवन में अपना कुछ नहीं रह जाता है। 
कुछ आलोचकों ने माना है कि वर्जीनिया वुल्फ ने महिलाओं की रचनात्मक सक्रियता पर जोर दिया है, इसलिए वह एकांत की बात करती हैं। पर वर्जीनिया के जीवन और विचार को को देखें तो वह लगातार इस बात पर जोर दे रही थीं कि महिलाओं को अपने भीतर की ताकत और क्षमता पहचाननी होगी और यह तभी होगा जब वह खुद को लेकर जागरूक होंगी। जो दुनिया है और जो परिवेश है, उसमें महिला के गुम हो जाने का खतरा है। इसलिए वह पर्सनल स्पेस की बात करती हैं, उसकी पूरजोर तरीके से वकालत करती हैं। 
वर्जीनिया का ही एक और विख्यात कथन है- ‘महिला होने के नाते मेरा कोई देश नहीं है। एक महिला होने के नाते पूरी दुनिया मेरा देश है।’ साफ है कि वह संभावना और रचनात्मक ऊर्जा के साथ महिलाओं के आगे नए सपने और नए अवसरों का द्वार खोल रही थीं। दिलचस्प यह कि 20वीं सदी के आरंभ में जब देश और समाज हर तरह की अधीनता से जूझ रहा था, वर्जीनिया वुल्फ महिलाओं को स्वतंत्रता का नया अर्थ समझा रही थीं। 

कई किताबों पर बनीं फिल्में
वर्जीनिया वुल्फ की किताब ‘ऑरलैंडो’ पर 1992 में फिल्म बनी थी, जिसमें टिंडा स्विल्टन ने काम किया था। फिल्म को सैली पोटर ने डायरेक्ट किया था और आईएमडीबी पर इसे 7.2 की रेटिंग हासिल है। यही नहीं, ‘मिसेज डैलोवे’ पर भी फिल्म बन चुकी है। 1997 में बनी इस फिल्म को काफी पसंद किया गया था और इसे एक बेहतरीन फिल्म भी बताया गया था। उनकी कई कहानियों को टीवी धारावाहिकों में उकेरा गया। उनके लिखे पत्रों पर आधारित फिल्म ‘वीटा और वर्जीनिया’ पर पोस्ट प्रोडक्शन में काम चल रहा है। 

मौत की त्रासदी
वर्जीनिया की मौत उनकी जिंदगी जितनी ही त्रासदी से भरी हुई है। उन्होंने आत्महत्या कर ली थी। उन्होंने इंग्लैंड के ससेक्स ​िस्थत अपने घर के पास की नदी में खुद को डुबो लिया था। उस वक्त वह महज 59 साल की थीं। 
उस वक्त उन्होंने डायरी लिखी थी और अपने पति को लिखे उनके आखिरी पत्र से पता चलता है कि वह कितने गहरे अवसाद में डूबी हुई थीं। उनकी डायरियों से पता चलता है कि वह मौत के प्रति कितनी आसक्त होती जा रही थीं।



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