sulabh swatchh bharat

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2019

तोरुलता - बच्चों ने किया बेबस

तोरुलता के पति की मौत उसके लिए चौंकाने वाली नहीं थी, लेकिन जो बाद में हुआ वह जरूर चौंकाता है

उसकी उम्र14 वर्ष थी और वह 50 वर्ष का था। उसका, उस ढलती उम्र के व्यक्ति से विवाह हो गया। उसको शायद उस वक्त पता था कि ऐसा हो सकता है और ऐसा हुआ भी। वह जल्द ही विधवा हो गई।
पश्चिमी बंगाल के बालुरघाट की तोरुलता लंबे समय से विधवा हैं। उनके उम्रदराज पति को समय के साथ सांस की बीमारी ने घेर लिया और फिर उनकी मौत हो गई। उनके एक बेटी थी और दो बेटे थे। उनके तीनों बच्चों की शादी पिता के मरने से पहले ही हो गई थी।
तोरुलता कहती हैं कि यद्दपि उनके पति की मृत्यु हो गई थी, लेकिन वह अपनी सभी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों को निभा चुके थे और इसीलिए उसके ऊपर अब कोई भार नहीं था।”
वह बताती हैं, "मुझे हम दोनों की उम्र के बड़े अंतर के बारे में पता था। वह लंबे समय से सांस की बीमारी से पीड़ित थे। मुझे यह पता था कि जल्द ही या कुछ समय बाद, उनकी मौत हो जाएगी और मैं विधवा बन जाउंगी। इसीलिए यह मेरे लिए एक बड़ा झटका नहीं था। हां, यह बहुत दर्दनाक था, लेकिन मैं लड़ने की कोशिश कर रही थी।
तोरुलता अपने पति को खोने के दर्द से जल्द ही संभल गईं, क्योंकि उन्हें भरोसा था कि उसके बच्चे उसके पति के न रहने पर उसकी देखभाल करेंगे और कभी उसे अकेला नहीं महसूस होने देंगे। वे उसका वैसा ही ख्याल रखेंगे, जैसा जीवन उसने अपने पति के साथ बिताया था।
लेकिन जीवन इतना आसान नहीं है। कहा जाता है कि जिन पर आप सबसे अधिक भरोसा और विश्वास करते हैं, वही आपको सबसे अधिक चोट पहुंचाते हैं। यही, तोरुलता के साथ हुआ।
पिता की मृत्यु के बाद, दोनों बेटों और उनकी पत्नियों ने तोरुलता को भार के रूप में देखना शुरू कर दिया। अब वह परिवार में एक अवांछित व्यक्ति थी, क्योंकि वह विधवा हो चुकी थी। इन सबसे ऊपर, वह अब इतनी बूढी हो चुकी थी कि घर के किसी काम नहीं आ सकती थी, और इसने उसे एक बड़ा बोझ बना दिया। तोरुलता को धक्का सा लगा। उसने सोचा कि उसके पास बहुत से लोग हैं, लेकिन इसके विपरीत, उसके साथ अब कोई नहीं था।
उसके साथ सिर्फ असभ्यों जैसा व्यवहार ही नहीं होता था। वे उसे मारते थे, गालियां देते थे और तब तक नहीं रुकते थे जब तक कि वह दयनीय स्थिति में नहीं पहुंच जाती थी।
तोरुलता सुबकते हुए बताती हैं, "मुझे अक्सर पीटा जाता था। वे सब साथ खाना खाते थे और जब मैं अपने लिए भोजन मांगती थी, तो मुझे इसे खुद बनाने के लिए कहा जाता था। जब मैं कहती थी कि मैं बुजुर्ग हूं और मुझे सहायता चाहिए तो वे मुझसे कहते थे कि मैं किसी काम की नहीं हूं और मुझे खूब पीटा जाता था। मेरे बेटे, बहू, पोते कोई भी दया नहीं दिखाता था।"
निरंतर अपमान और शारीरिक दुर्व्यवहार ने उन्हें शारीरिक और भावनात्मक दोनों रूप से चोट पहुंचाई। तोरुलता ने पहले से पवित्र शहर वृंदावन के बारे में सुना था, लेकिन अब तक के जीवन में उन्होंने कभी भी नहीं सोचा था कि वह भविष्य में इस शहर को अपना घर बुलाएंगी। इतना सब कुछ झेलने के बाद, उन्होंने वृंदावन जाने का फैसला किया। वृंदावन आने वाली कई अन्य विधवाओं की तरह, वह भी पहले मीराबाई आश्रम गईं। वहां उन्होंने दिन में दो बार भजन किया, जिसके बदले में उन्हें 10 रुपए (5 रुपए सुबह और 5 रुपए शाम) और प्रसाद भोजन के रूप में मिला।
आज, तोरुलता, सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गनाइजेशन द्वारा संचालित विधवा आश्रम तुलसीवन में रहती हैं, जहां वह दो साल पहले आई थीं। वह, यहां एक सामान्य जीवन जी रही है।
वह बताती हैं, "जब मैंने घर छोड़ा, तो मुझे नहीं पता था कि जो मैं कर रही हूं वह गलत है या सही। मैं बस सभी यातनाओं और दुर्व्यवहार से दूर जाना चाहता थी। मैंने अपने बुरे से बुरे सपने में भी नहीं सोचा था कि मेरे अपने बच्चे मुझे ऐसे घाव देंगे कि मै अपने घर से बेघर हो जाउंगी। लेकिन अब मुझे लगता है, जो मैंने किया वह सही था। अब मैं लाल बाबा (डॉ. विन्देश्वर पाठक) की शरण में हूं। मेरे सिर पर छत है, जीवन में आराम, आत्मा के लिए भोजन है। लाल बाबा हमें दिवाली पर कपड़े उपहार में देते हैं।"
वह मुस्कुराते हुए कहती हैं, "मेरे जीवन में कुछ चीजें उम्मीदों के अनुरूप और कई अप्रत्याशित मोड़ लेकर आईं। लेकिन अब यह एक सीधी और चिकनी सड़क है। अब वृंदावन ही मेरा सच्चा घर है और यह घर बहुत शांतिपूर्ण है। मुझे खुशी है कि मेरे अंदर यहां आने का साहस था। जिंदगी अब सही चल रही है।" 



Bringing smiles to every face hindi ad copy %281%29

ऑडियो