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सोमवार, 22 अप्रैल 2019

विलियम वर्ड्सवर्थ - प्रकृति और सौंदर्य का क्लासिक कवि

अंग्रेजी कविता को प्रकृति और प्रेम की तरफ मोड़कर भाषा और शैली का सम्मोहक संसार रचने वाले विलियम वर्ड्सवर्थ आज भी अपनी कविताओं और काव्य लेखन को लेकर अपने मौलिक विचारों के लिए पढ़े और सराहे जाते हैं

विलियम शेक्सपीयर की ख्याति के कारण अंग्रेजी साहित्य में रहस्य और शोक का प्रभाव काफी बढ़ा। कई आलोचकों की यह भी राय है कि विश्व साहित्य में अगर ट्रेजडी की बात आएगी, तो बाजी अंग्रेजी साहित्य मार ले जाएगा और इसका बहुत बड़ा श्रेय शेक्सपीयर को जाएगा। पर इस छवि को जिन साहित्यकारों ने अपने श्रेष्ठ लेखन के बल पर बदला, उनमें विलियम वर्ड्सवर्थ का नाम प्रमुखता से लिया जाएगा। वर्ड्सवर्थ मूलत: कवि थे। उन्होंने अंग्रेजी साहित्य को रोमांस की वह उड़ान दी, जिसमें बिंब से लेकर भाषा तक को लेकर एक नया सम्मोहन था। यही कारण है कि आज भी उन्हें अंग्रेजी साहित्य में रोमांस का सबसे बड़ा कवि माना जाता है। वे रोमांस को एक क्लासिक ऊंचाई देने में सफल रहे। उनके परिदृश्य और दार्शनिक गीत दुनिया की काव्य विरासत को आज तक धन्य कर रहे हैं।

युगीन प्रभावों के बीच
वर्ड्सवर्थ के कार्यों को युगीन संदर्भ में देखा जाना चाहिए। 18 वीं शताब्दी में अंग्रेजी साहित्य में प्रमुख प्रवृत्ति क्लासिज्म थी। हालांकि सदी के अंत तक भावुक और रोमांटिक गीतों में बदलाव की प्रवृति भी आई। कई मामलों में यह उस युग की प्रमुख प्रवृतियों द्वारा निर्धारित किया गया था, क्योंकि रूसो के कार्यों ने सामाजिक और राजनीतिक विचारों और साहित्य में सामान्य रूप से एक महान भूमिका निभाई थी। उनके द्वारा जीवन के उदात्त पथ की चर्चा के साथ मानवीय अनुभवों- भावनाओं और व्यक्तित्व के मनोविज्ञान के चित्रण ने उस समय के शिक्षित समाज पर पर बड़ा प्रभाव डाला था। इसके अलावा अंग्रेजी साहित्य में पहले से ही सोनेट, प्रकृति की छवियों और सूक्ष्म अनुभवों वाले गीत बनाने का अनुभव था। शेक्सपीयर, चौसर और मिल्टन लेखन कविता के क्षेत्र में उतरे लोगों को अलग से अधिक प्रभावित कर रहे थे। इन युगीन प्रभावों के साथ वर्ड्सवर्थ ने सैम्युअल टेलर कॉलरिज की सहायता से अंग्रजी सहित्य में गीतात्मक गाथागीत के साथ रोमांस के नए युग का सूत्रपात किया। वर्ड्सवर्थ की प्रसिद्ध रचना 'द प्रेल्यूड' है, जो कि एक अर्ध आत्मचरितात्मक काव्य माना जाता है। इसके साथ ही उन्होंने प्रकृति के सौंदर्य को भाषा देने का अनूठा प्रयोग किया, इस प्रयोग में सौंदर्य और प्रेम जिस तरह गले मिलते हैं, वह अद्भुत है। 

परिवार और शिक्षा
जॉन वर्ड्सवर्थ और ऐन कूक्सन के पांंच बच्चों में से दूसरे विलियम वर्ड्सवर्थ का जन्म 7 अप्रैल 1770 को कौकर माउथ, कंबरलैंड, इंग्लैंड के उत्तर पश्चिम क्षेत्र में हुआ था। उनके पिता जेम्स लोथर, अर्ल ओफ लोन्स्डेल के कानूनी प्रतिनिधि थे और अपने संपर्क और योग्यता के बूते छोटे शहर में बड़ी हवेली में रईसी के साथ रहते थे। उनकी मृत्यु 1783 में हुई थी। वर्ड्सवर्थ के पिता अक्सर व्यापार के सिलसिले में घर से बाहर रहते थे, हालांकि वे बेटे को पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करते थे। वर्ड्सवर्थ को विशेष रूप से मिल्टन, शेक्सपीयर और स्पेंसर का साहित्य पढ़ने के लिए प्रेरित किया गया था। इसके अतिरिक्त उन्हें पिता के पुस्तकालय का उपयोग करने की भी पूरी छूट थी। 
वर्ड्सवर्थ के चार भाई-बहन थे। डोरोथी वर्ड्सवर्थ, जिसके वे सबसे ज्यादा करीब थे, वह एक कवयित्री थीं। सबसे ज्येष्ठ रिचर्ड वकील थे और जहाज के कप्तान थे।  क्रिस्टोफर कैंब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज में पढ़ाते थे। वर्ड्सवर्थ की मां की मृत्यु के बाद 1778 में उनके पिता ने उन्हें हॉक्शीड ग्रामर स्कूल, काशायर (अब कंब्रिया में) और डोरोथी को यॉर्कशायर में रिश्तेदारों के साथ रहने भेज दिया था। वह और वर्ड्सवर्थ नौ सालों तक एक दूसरे से नहीं मिल पाए थे। 

साहित्य में दस्तक
वर्ड्सवर्थ नें साहित्य के क्षेत्र में अपनी शुरुआत 1787 में की जब एक यूरोपीय पत्रिका में उनकी कविता प्रकाशित हुई। उसी वर्ष वे सेंट जॉन्स कॉलेज, कैंब्रिज जाने लगे और 1791 में उन्हें बीए की डिग्री प्राप्त हुई। पहले दो साल की गर्मियों की छुट्टियों के लिए वे हॉकशीड लौट आते थे और वहां की सुंदर प्रकृति के बीच अपनी छुट्टियां बिताते थे। 1790 में उन्होंने यूरोप की पैदल यात्रा की। फिर विस्तृत रूप से आल्प्स, फ्रांस, स्विट्जरलैंड और इटली के आसपास के इलाकों की यात्रा की।
18वीं शताब्दी के अंत में कवियों की शैली रूढ़ और निरूपयोगी हो गई थी। वर्ड्सवर्थ ने तो परंपरागत भाषा-शैली का और भी तीव्र विरोध किया। आधुनिक युग में जिस प्रकार टी.एस. इलियट और एजरा पाडंड ने बोलचाल की भाषा के प्रयोग का समर्थन किया, वैसे वर्ड्सवर्थ ने अपनी प्राकृतिक और स्वाभाविक भाषा शैली का समर्थन किया। वर्ड्सवर्थ काव्यगत युक्तियों, मानवीकरण, वक्रोक्ति तथा पौराणिक दंत कथाओं, भावाभास आदि को काव्य के लिए उपयुक्त नहीं मानते थे।
शैली और भाषा का नया संसार
18वीं सदी में नव-अभिजात्यवादी युग में भाषा के निम्न और उच्च दो रूप प्रचलित थे। दैनिक जीवन की भाषा को निम्न कहा जाता था, दूसरी उच्च भाषा जो कृत्रिम, बोझिल और आडंबरपूर्ण हो गई थी वर्ड्सवर्थ ने इसका त्याग किया। स्वछंदतावादी कवि विलियम वर्ड्सवर्थ के काव्य रचना संबंधी विचार विशेष रूप से इनके ‘प्रिफेस टु लिरिकल बैलेउस’ में प्राप्त होते हैं। 
वर्ड्सवर्थ के विचार नए और मौलिक तो थे ही, पूर्ववर्ती विचारों से भी अलग थे। जिन कुछ बातों पर उन्होंने खासतौर पर जोर दिया, वे हैं-  
- अच्छी कविता जोरदार भावनाओं की सहज और स्वतः स्फूर्त उद्गार होती है।
- कविता के लिए विषय भी महत्त्वपूर्ण।
- काव्य में जनसामान्य में प्रचलित भाषा के प्रयोग पर बल।
- अलंकारों का स्वाभाविक प्रयोग हो पर यांत्रिक ढंग पर उनकी भरमार नहीं।
- कवि की दृष्टि में मानव और प्रकृति तत्त्वतः एक दूसरे के लिए ही हैं और मानव मन, प्रकृति के सुंदर और रोचक गुणों का दर्पण है। इसी प्रकार कविता ज्ञान का सूक्ष्म तत्त्व और उसका प्राण-वायु है। ज्ञान का आरंभ और अंत कविता ही है। इस प्रकार वर्ड्सवर्थ के काव्य संबंधी विचार भावुकतापूर्ण होते हुए भी व्यावहारिक और तत्त्वपूर्ण हैं।
अन्य काव्य तत्त्वों की भांति ही भाषा के विषय में भी वर्ड्सवर्थ ने कृत्रिमता एवं जटिलता की अपेक्षा भाषा के सारल्य तथा स्वाभाविकता से ओत-प्रोत रूप का ही समर्थन किया। यही कारण है कि उन्होंने गद्य भाषा का भी पक्षपात किया है।

भाषा में सरलता के हिमायती
वर्ड्सवर्थ भाषा में सरलता के पक्ष में तो वे किंतु उनका यह मत बिल्कुल नहीं था कि काव्य भाषा ग्राम्यता के दोष से दूषित और अटपटी हो। वर्ड्सवर्थ ने स्पष्ट किया कि जो कवि जन-सामान्य के लिए काव्य सर्जन में प्रवृत होता है, उसे कभी भी कृत्रिम एवं कल्पित भाषा की छूट नहीं दी जा सकती। वे यह भी मानते थे कि यद्यपि कवि विशुद्ध रूप से जन भाषा में कविता नहीं कर सकता, फिर भी उसे काव्य भाषा का चयन जनभाषा से करके ही सदा उससे निकट का संबंध स्थापित रखना चाहिए। चुनाव करते समय काव्य के लिए आवश्यक परिमार्जन एवं परिवर्तन का अधिकार तो उसे रहता ही है।
वर्ड्सवर्थ का मानना था कि ग्रामीण अपनी निम्न स्थिति के कारण सामाजिक गर्व से मुक्त होकर सरल स्वाभाविक अभिव्यक्ति करते हैं। उनकी वाणी में सच्चाई तथा भावों में सरलता होती है। गद्य-पद्य में या गद्य और छन्दोबद्ध रचना में कोई तात्विक भेद नहीं हो सकता। वर्ड्सवर्थ की भाषा संबंधी इस अतिवादी मान्यता का परंपरा तथा वास्तविकता के साथ स्पष्ट विरोध है। गद्य-पद्य का अंतर केवल छंद के कारण नहीं होता, अपितु वाक्य विन्यास, पद चयन आदि के कारण होता है।
वे मानते थे कि प्राचीन कवियों ने वास्तविक घटनाओं से जन्म लेने भावों का आधार लेकर काव्य रचना की। चूंकि उनकी अनुभूति और भाव प्रबल थे, इसलिए सहज ही उनकी भाषा प्रभावी और अलंकृत हो गई। बाद के कवि यश की कामना से काव्य रचना करने लगे, जिससे भाषा में कृत्रिमता आ गई। एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी के हाथ में जाकर भाषा जटिल, कृत्रिम और वागडिम्बयुक्त हो गई। ऐसी भाषा को वर्ड्सवर्थ ने त्याज्य बताया।

राजकवि
वर्ड्सवर्थ को 1838 में डरहम विश्वविद्यालय से सम्मान स्वरूप सिविल लॉ की डिग्री प्राप्त हुई। इस साल ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से भी उन्हें वही सम्मान प्राप्त हुआ। 1842 में सरकार ने उन्हें अलग से सम्मानित किया। 1843 में वे रॉबर्ट सौदी की मृत्यु के बाद राजकवि बन गए। प्रारंभिक रूप से उन्होंने यह कहते हुए कि वे बहुत बूढ़े हैं, यह सम्मान लेने से इनकार कर दिया था। पर ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री रॉबर्ट पील के मनाने पर उन्होंने यह सम्मान स्वीकार कर लिया था।

‘द प्रेल्यूड’
विलियम वर्ड्सवर्थ कि मृत्यु 23 अप्रैल 1850 को गंभीर बीमारी से हुई। उनकी मृत्यु के कुछ महीने बाद, उनकी पत्नी मैरी ने उनके द्वारा लिखी गई आत्म-कथात्मक कविता ‘द प्रेल्यूड’ को प्रकाशित किया। 1850 में यह कविता शुरुआती तौर पर लोगों पर अपना प्रभाव छोड़ने में विफल रही। हालांकि अब यह कविता उनकी श्रेष्ठ रचनाओं में एक मानी जाती है।



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