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बुधवार, 19 सितंबर 2018

संदीप पांडेय - बापू के सपने का संदीप

इंजीनियर के रूप में एक चमकदार कैरियर छोड़ कर संदीप पांडेय ने गांव के लोगों को हर लिहाज से सशक्त करने का बीड़ा उठाया

पेशे से आईआईटी के प्राध्यापक और फिर आईएस अफसर बनने की तमन्ना रखने वाला एक युवा  हरदोई में अपने गांव से लखनऊ में अपने घर लौटकर आया। सफर में काफी थक जाने के बाद उसने अपनी मां से अपने लिए और अपने एक दलित साथी के लिए चाय बनाने की अपील की। उसकी मां ने उसके दलित साथी के लिए चाय तो बनाई पर उसे अलग कप में चाय दी गई। इस घटना ने उस युवक के मन पर इस बात की गहरी छाप छोड़ी कि जातिवादी और मध्यकालीन मानसिकता के कारण समाज के कुछ लोगों के प्रति आज भी भेदभाव बरता जाता है। असल में वह युवक शुरू से थोड़ा विद्र्रोही स्वभाव का था। दलितों और महिलाओं के उत्पीडऩ को लेकर उनके मन में गुस्सा बहुत पहले से था। उसने यह तय भी कर लिया था कि आगे चलकर वह समाज की इन बुराइयों के खिलाफ जरूर लड़ेगा। एक दिन उसके हाथ गांधी की आत्मकथा 'सत्य के प्रयोगÓ लगी। इस किताब से उन्हें दलितों और महिलाओं को न्याय दिलाने का जरिया और रास्ता दोनों मिला। खादी का कुर्ता-पायजामा और हवाई चप्पल पहने इस शख्स को लोग आज संदीप पांडेय के रूप में जानते हैं। गांधीवादी दर्शन को अपने सार्वजनिक जीवन के साथ अमल में उतारने वाले 51 वर्षीय पांडेय मैगसेसे पुरस्कार से सम्मानित हो चुके हैं। वे आज दलितों के उत्थान के साथ महिला सशक्तिकरण, गरीब बच्चों की तालीम और ग्रामीण इलाकों में सामुदायिक विकास के कई काम गांधीवादी मूल्यों के साथ कर रहे हैं। पांडेय बताते हैं, 'पहले मैं शिक्षा के प्रसार के जरिए सामाजिक बुराइयों पर काबू पाने की सोच से काम कर रहा था पर बाद में मुझे लगा कि जिन लोगों को दो जून की रोटी तक नसीब नहीं हो रही है, सबसे पहले हमें उनकी आजीविका के बारे में सोचना होगा। हमारे लिए इनके शोषण और उत्पीडऩ का मुद्दा भी अहम था। मुझे ध्यान आया कि जब आईआईटी कानपुर में फैकल्टी मेंबर था मजदूरों के बच्चों को पढ़ाने की एक योजना बनाई थी। साथ ही उस दौरान एक कॉपरेटिव भी बनाया गया था, जो इनके परिवारों को ठेकेदारों के जुल्म से बचाता था।Ó

संदीप पांडेय बाबा आम्टे से प्रभावति थे और देखते-देखते खादी बनियान और हॉफ पैंट पहनकर आईआईटी कैंपस में घूमने लगे। इसी दौरान उनका आईआईटी प्रबंधन से छात्रों को पढ़ाने, परीक्षा और मूल्यांकन के तरीके को लेकर तकरार हुआ।  1992 के दंगे के दौरान कानपुर में उन्होंने बचाव और राहत के काम में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। शहर में शांति बनी रहे इसके लिए जिला प्रशासन के कहने पर कानपुर के दंगा प्रभावित इलाकों में आईआईटी के छात्रों द्वारा नुक्कड़ नाटक खेले गए। इस बीच आईआईटी प्रबंधन के साथ उनका मन-मुटाव चलता रहा और आखिरकार उन्हें अपनी नौकरी छोडऩी पड़ी। वे घर लौट आए और प्रशासनिक सेवा की तैयारी में जुटे पर गांधावादी मू्ल्यों का आकर्षण उन्हें लगातार उनके विद्रोही मन को मथता रहा। इस भीतरी उछल-पुथल के बीच वे पीएचडी करने अमेरिका पहुंच गए। दिलचस्प यह कि वहां भी उन्होंने सरकार के इराक को लेकर नीति के विरोध में सत्याग्रह किया। अमेरिकी सरकार की विध्वंसी सामरिक नीति से तंग आकर उन्होंने आखिरकार हरदोई वापस लौट जाने का फैसला किया। वहां लालपुर गांव में उन्होंने आशा आश्रम बनाया और इसके साथ ही उन्होंने अपनी बाकी की पूरी जिंदगी गरीबों, दलितों और समाज के दूसरे वंचित तबकों के विकास के लिए समर्पित करने की शपथ ली। सेवा और सहयोग के तमाम तरह के कामों के बीच उन्होंने सूचना के अधिकार और भ्रष्टाचार विरोध के अभियान को भी हाथ में लिया। गौरतलब है कि यह तब कीबात है जब आटीआई कानून नहीं बना था और लोकपाल आंदोलन भी नहीं शुरू हुआ था। उसी दौरान उनके काम और अभियान को देखने और उससे जुडऩे अरविंद केजरीवाल भी आए थे। आज पांडेय पंचायत स्तर पर स्वावलंबन और लोक सशक्तिकरण के कई सफल मॉडल को खड़ा करने वाला देश का एक बड़ा नाम है। देश में रचनात्मक काम करने वाले लोगों और संस्थाओं को एक मंच पर लाने में भी उनका बड़ा योगदान है। 



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