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मंगलवार, 13 नवंबर 2018

तोता पंडित

जोरावर सिंह का दिमाग एकबारगी खाली हो गया। डी.वाई.एस.पी. के रूप में यह उनका पहला छापा था और पहला ही फुस्स! शहर के बदनाम गुंडे कमाल को दबोचने आए थे। इनफार्मर-विनफार्मर, रेकी-वेकी, लाव-लश्कर हर तरह से चाक-चौबंद मगर पूरा घर फांका। पुलिस के सिपाहियों के बूटों की खट-खट और एक परिंदे की 'टें-टें’ के सिवा कुछ नहीं।

'ये कौन बोल रहा है-कमाल?’ जोरावर सिंहकी भौंहें सिकुड़ीं।’

'कमाल तो फुर्र हो गया हुजूर,’ पड़ोस के दर्जी शुभान मियां ने कहा,'यह तो कमाल का तोता है-मिट्ठूमियां!’

'अकेले रहता था कमाल?’ बीवी-वीबी, बच्चे-बच्चे...?

'अब हुजूर ऐसे लोगों की क्या तो बीवी और क्या तो बच्चे! जब जरूरत पड़ी उठवा ली, मन भर गया छोड़ दी।’

'हूं...! तो फिर ये तोता कहां से आ टपका?’

'हुजूर ये तोता तो उसकी रखैल रंडी हुस्ना बाई का है। किसी सेठ की ऐशगाह में जाने लगी तो नजराना देती गई कमाल को।’

हवलदार दीन मुहम्मद ने खैरख्वाही जताते हुए पिंजरे के पास जाकर खालिश लखनवी अंदाज में आदाब बजाई, 'आदाब अर्ज है मिट्ठू मियां!’

'दुत्त स्साला!’ बोली दगी या गोली!

यह तो वैसे ही हुआ कि आप किसी को माला पहनाने चलें और वह आपको थप्पड़ रशीद कर दे।

दीन मुहम्मद अप्रतिभ हुए।

'कुछ पता चला? क्या कहता है कमाल का तोता?’ जोरावर सिंह ने पूछा

'हुजूर यह तो गाली बकता है।’ हवलदार ने झेंपते हुए कहा,

'उस साले कमाल ने इस हरामी को आसाम की खालिश मिर्ची खिलाई है।’

'अब रंडी और गुंडे के पास रह कर यह सीखता भी क्या हुजूर!’ शुभान मियां ने कहा।

सिंह को कौतुक सूझा, पिंजरे के पास गए, पूछा, 'क्यों बे, कहां गया कमाल?’

शुभान से पूछा गया तो उसने लाचारी प्रकट कीं, हुजूर सुना नहीं?

जवाब में तोते ने 'टें-टें’ करते हुए कुछ कहा तब दीन मुहम्मद ने साफ करके बताया-'चुप बे हरामी के पिल्ले!’

यह सुनते ही सिंह साहब के दिमाग का पारा ब्वाइलिंग प्वाइंट पर जा चढ़ा, 'इसी साले को ले चलो।’

सो जनाब, इस तरह मिट्ठूमियां अशदपुर थाने लाए गए।

साहब का मूड एकदम से उखड़ गया था। इस उखड़े मूड को ठीक करने के लिए किसी बिलायती शराब की दुकान से 'जानीवाकर’ आया।

साहब एक घूंट भरते और पिंजरे को एक लात मारते, एक लात मारते और एक घूंट भरते।

मिट्ठूमियां हर वार पर 'अब साले!’ या इससे भी फोहस गाली बकते। उन्हें छड़ी से कोंचा गया। पानी-वानी डाला गया। मिट्ठूमियां की गालियां बढ़ती गईं और साहब का पारा भी,

आखिर उन्होंने हुक्म दिया,'इस हरामी मिट्ठूमियां का एफ.आई.आर लिखो।’

'जी..?’ दीन मुहम्मद ने हकलाते हुए पूछा।

'सुना नहीं? एफ.आई.आर!’

घोड़े की पछाड़ी और अफसर की अगाड़ी नहीं पडऩा चाहिए। एफ.आई.आर लिखी गई।

फोनो-फोन दूर-दूर तक खबर फैल गई।

एस.पी.साहब पहले तो देर तक हंसते रहे फिर बोले,

'आप का सिर तो नहीं फिर गया मिस्टर सिंह। तोते पर एफ.आई.आर! अगर कहीं ऊपर वालों को खबर हो गई कि आपने न सिर्फ तोते पर एफ.आई.आर. किया है, बल्कि उस पर टॉरचर भी किए जा रहे हैं तो जानते हैं क्या होगा-तोता होगा पिंजरे के बाहर और आप होंगे पिंजरे के अंदर!’

सिंह साहब का नशा हिरन हो गया, फौरन सरेंडर कर गए- 'छोड़ दे रहे हैं सर।’

'यह नेक काम तो आपको पहले करना चाहिए था महात्मन, अब तो बात फैल गई है। कोई भी आला अफसर पूछेगा, 'कहां है वो आपका अभियुक्त, माने करामाती तोता, आप क्या जवाब देंगे?’

एस.पी.साहब ने आखिर में कहा, 'छोडऩे की बात भी भूल जाइए मिस्टर सिंह अब तो उच्चतम मान की सुरक्षा का प्रबंध कीजिए, तोते को कुछ हो न जाए।’

जोरावर सिंह को नया बोधिसत्व प्राप्त हुआ कि नशा बुरी चीज है, चाहे वो दारू की हो या पोज़ीशन की। खुद पर लाख-लाख लानतें भेज रहे थे, गुस्से में क्या गलती कर बैठे! अब इस हरामजादे को 'जेड सुरक्षा’ प्रदान करनी पड़ेगी। दामाद की तरह रखना पड़ेगा कौन उठाएगा नाज-नखरे इसके? कौन करेगा देख-रेख इस मरदूद की? कहीं मर-मरा गया तो गई नौकरी! दारोगा सुल्तान अहमद जी से पूछा, 'कौन कर सकता है इसकी हिफाजत?’

ऐसा कठिन सवाल अहमद के सामने कभी आया न था। अभी वे इसका हल सोच ही रहे थे कि द्वारपाल के रूप में खड़े होम गार्ड सनातन मिश्रा ने कहा, 'हुजूर अपने पंडित जी राम पियारे महाराज!’

'क्या?’ मिस्टर सिंह की आंखें सिकुड़ीं’।

'सर, पुलिस के सिपाही बनने के पहले तोता ही तो पालते थे। वहां उपस्थित सभी सिपाहियों ने मिश्रा का समर्थन किया, कारण, यह बात सबको मालूम थी कि पंडित राम पियारे महाराज सिपाही बनने से पहले

ज्योतिषाचार्य हुआ करते थे और कपाल पर राम-नाम छाप कर और रामनामी ओढ़ कर चबूतरे पर तोते से सगुन विचारने का काम करते थे। कई सिपाहियों और छोटे-मोटे अफसरों ने भी उनकी सेवाएं ली थीं। कचहरी के ऐन सामने वे एक चबूतरे पर बैठते। उनके सामने पिंजरे में एक तोता होता और पिंजरे के सामने लिफाफों में छपा हुआ भाग्य फल। भाग्य जानने वाला पैसा देता, पंडित जी पिंजरे का द्वार खोल देते। तोता पिंजरे से निकल कर कोई लिफाफा खींच कर वापस पिंजरे में लौट जाता।

कुछ एक मामलों में तोते की भविष्यवाणी गलत निकली तो उनके श्वसुर, जो किसी आला अफसर के घर पूजा-पाठ करते थे, ने उन्हें पुलिस की नौकरी दिलवा दी। मामला वहां भी इतना आसान न था। भर्ती में एक दौड़ दौडऩी थी। अब रामपियारे ठहरे चबूतरे पर बैठने वाले जीव, कभी दौड़े होते तो न दौड़ पाते! पर जैसा कि होता आया है, नियुक्ति रामपियारे जी की ही हुईं। कई कंडीडेट कुरमुराए-यह तो सरासर धांधली है मगर कुरमुराने वालों में अतं-अंत तक एक ही जवान टिका रहा-सनातन मिश्रा! सो सनातन मिश्र का मुंह बंद करने के लिए उसे होमगार्ड में रख लिया गया। जैसा कि होता आया है, हर थाने के अंदर एक मंदिर होता है। अमूमन वह मां काली या हनुमान जी का हुआ करता है। पुलिस के सिपाही से लेकर चोर-उचक्के तक अपनी यात्रा सफल होने की मिन्नत और मनौती करने के बाद ही प्रस्थान करते हैं। असदपुर के इस थाने में भी हनुमान जी का मंदिर था। पंडित रामपियारे नाम मात्र के ही पुलिस के सिपाही थे उनका असल काम था पूजा करना। किसी रेड-वेड या छापे-वापे में उन्हें डïï्यूटी तभी दी जाती, जब कोई छुट्टïी पर गया होता। पूजा-वूजा पूरी करते-करते दोपहर हो जाती,तब उनका थाने में पदार्पण होता। बड़े बाबू, छोटे बाबू, मुंसी, हवलदार सभी को प्रसाद और आशीर्वाद प्रदान कर लंच के लिए रवाना करते और अंदर स्टूल पर विराजमान होते। माने रामपियारे गेट के अंदर होते और सनातन मिश्र गेट के बाहर। पंडित होने के नाते क्या बड़े, क्या छोटे सभी उनका सम्मान करते। बस एक सनात ही अकड़ू खां बना दूसरी ओर ताकता रहता। ऐसे में प्यास हो, न हो, पंडित राम पियारे को प्यास लग जाती। बड़े प्यार से सनातन को पुकारते, 'मिसिर भैया, जरा पानी तो पिलाना। तुम तो जानते हो, तुश्वहें छोड़ किसी और के हाथ का पानी पीते नहीं हम।’

मिश्रा कुढ़ कर रह जाता, 'स्साला बेइमान! मेरी नौकरी छीन कर राज कर रहा है। गहरी मुस्की मधुरी बानी, दगाबाज की यही निशानी!’

जोरावर सिंह ने पंडित जी को बुला भेजा, 'हनुमान जी के साथ इस तोते की देखभाल का जिम्मा आज से आपका। ख्याल रहे आप दुनिया के सबसे सज्जन सिपाही हैं तो यह दुनिया का सबसे दुर्जन तोता। आप के मुंह से हमने गाली कभी सुनी नहीं और इसे गाली छोड़ कर कुछ आता नहीं।’ 'यह भी याद रहे कि यह अभियुक्त है और आप सिपाही!’

पंडित रामपियारे परम प्रसन्न हुए-

विधि वस सुजन कुसंगति परहीं,

फणि मणि सम निज गुन आचरहीं।

'अहोभाग्य मेरा। आपका लाख-लाख धन्यवाद साहब, आपने शुकदेव मुनि की सेवा का हमें अवसर दिया।’ पंडित रामपियारे जी प्रसन्न हुए। उन्होंने पिंजरे को गंगाजल से धोया और मि_ïूमियां को भी। अपने नाश्ते के लिए भिंगोए चने से थोड़ा चना निकाल कर धोयी हुई प्याली में रखा, साथ ही कुछ लाल मिर्चियां भी। एक अलग प्याली में पानी रखा फिर हाथ जोड़ कर बोले, 'अहो भाग्य मेरे शुकदेव महाराज। आप तब तक निवृत्त-विवृत्त हो लें, मैं आपके लिए कुछ और देखता हूं।’

अपनी मीठी जबान के लिए थाने भर में मशहूर थे पंडित जी। कहते हैं, सपने में भी भूल से किसी को अपशब्द नहीं कहा फिर मिट्ठूमियां तो उनके 'शुकदेव महाराज’ बन चुके थे। जब तक वे उनके लिए पका हुआ अमरूद ले आते, वे निबटान से निवृत्त हो चुके थे। अब वे अद्र्घोन्मीलित आंखों के तोताचश्म हो चुके थे। पंडित जी ने हाथ जोड़ कर उन्हें बड़े प्यार और मनुहार से निवेदित किया, 'महाराज फल ग्रहण करें।’

'दुत्त साला!’ तोते ने पंडित जी को पुराने अंदाज में जवाब दिया।

पंडित जी को ठेस लगी। सामने ही थाने की हाजत में गांधी जी के तीन बंदरों की तरह पकड़े गए तीन बदमाश और ऐन दरवाजे पर उनका सनातन शत्रु सनातन मिश्रा बक ध्यान लगाए देख रहे थे। किसी तरह खुद को संभाला, 'ऐसा नहीं बोलते, 'सित्ता राम’ बोलो बेटा 'सित्ता राम!’

'दुत्त साला!’

हाजत के तीनों कैदी और सनातन ताली बजा कर हंसने लगे, 'वाह बेट्टïा! तुमने हम सभी की बेइज्जती का बदला एक साथ ले लिया।’

पंडित जी खिसिया उठे पर धीरज न छोड़ा। अमरूद को अंदर रखा, प्याली में पानी डाला और बाहर चले गए।

दारोगा अहमद साहब ने तंज कसा, 'पंडित जी ने मिट्ठूमियां से तोते को शुकदेव महाराज तो बना दिया, अब उसकी गालियां छुड़वा दें तो उन्हें उस्ताद मान लें।’

उधर तोते की कीर्ति दूर-दूर तक फैल रही थी। थाने के हर स्टाफ का गालियों से सत्कार करने के बाद उसने हर आगंतुक का सत्कार उसी अंदाज में करना शुरू किया। एस.पी.साहब और पुलिस के कुछ आला अफसर आए, उनका भी।

'सज्जन और दुर्जन की लड़ाई है। देखें कौन जीतता है।’ एस.पी.साहब ने कहा। इस तोते को न सुधार पाए तो तुम्हारी छुट्टी!’

सुबह-शाम भोजन-पानी देते समय पंडित जी तोते को अपने मीठे आचरण से सुधारने का यत्न करते और तोता था कि उनकी हर कोशिश को दुत्कार देता। हाजत के कैदी और सनातन मिश्रा ताली बजाते और हुड़के जाते। अगला दिन आता फिर उसका अगला दिन...फिर उसका अगला दिन। हर दिन विक्रम बेताल की कथा की पुनरावृत्ति होती। सनातन धीरे से डंक मारता-

'लगे रहो मुन्ना भाई।’ पंडित रामपियारे अगले दिन और भी मीठे अंदाज में तोते को रटाते-'बोलो बेट्टïा सित्ता राम!’

समय बीतता जा रहा था बल्कि बीत गया था। एस.पी.साहब का कभी भी दौरा हो सकता है।

और लीजिए आ गई परीक्षा की घड़ी। पुलिस विभाग और अन्य विभागों के कई अफसरों के जूतों की धमक दूर से ही सुनाई देने लगी। करीब आते ही आवाजें धीमी पडऩे लगीं।

'तू साला!’

'तू हरामी का पिल्ला!’

'तू..................’

'तू.................’

अरे यह तो अपने पंडित जी की आवाज है। पहली बार उनके मुंह से गालियां बरस रही थीं। इतनी सड़ी गालियां तो मिट्ठूमियां को भी न आती होंगी!



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