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बुधवार, 19 सितंबर 2018

स्वच्छता का सिपाही

दुनिया में एक तिहाई लोगों की साफ-सुथरे शौचालयों तक पहुंच नहीं है, लेकिन जैक सिम ने शौचालयों के बारे में जागरुकता फैलाने की इस चुनौती को स्वीकार किया है

मैं अक्सर लोगों से पूछता कि वो दिन में कितनी बार खाना खाते हैं, और उन्हें इसका जवाब मिलता है। लेकिन जब मैं उनसे पूछता हूं कि वे कितनी बार शौचालय जाते हैं, तो उन्हें इसका कुछ पता नहीं होता है। यह बहुत ही आश्चर्यजनक है कि उन्हें शौचालय जैसी मूल आवश्यकता के बारे में नहीं पता। टाइम्स मैगज़ीन को दिए एक इंटरव्यू में स्वच्छता के सिपाही और वल्र्ड टॉयलेट ऑर्गनाइजेशन के संस्थापक जैक सिम का यह कहना है।

पर वह धीरे धीरे इस सोच को बदल ही नहीं रहे, बल्कि शौचालय व्यवसाय के अवसर के रूप में प्रचारित कर रहे हैं। उनके द्वारा शौचालय दिवस के रूप में चुना गया 19 दिसंबर का दिन अब विश्व स्वस्थ्य संगठन, जो शौचालय की इस स्थिति से काफी परेशान है, द्वारा भी अपना लिया गया है।

लेकिन डब्लूएचओ क्यों परेशान है? स्वाभाविक है, क्योंकि उसके मुताबिक 34 लाख लोग गंदे पानी में पैदा हुई बीमारियों से मर जाते हैं और सबसे ज्यादा डायरिया से, जो हर वर्ष विश्व के लगभग 17 अरब लोगों को प्रभावित करता है।  विश्व में लगभग 2.4 अरब लोगों के पास शौचालय की सुविधा नहीं हैं, जिसमें से आधी आबादी यानि 1.2 अरब लोग, तो भारत के ही हैं। इससे पता चलता है कि दुनिया में लगभग दो तिहाई लोगों के घर में शौचालय नहीं है।

सिम कार्ड

लेकिन सिंगापुर के स्वच्छता के सिपाही जैक सिम, जो कि एक रिटायर्ड कंस्ट्रक्शन एंड रीयल एस्टेट इंटरप्रेन्योर हैं, उन्होंने इस मुद्दे पर जागरुकता फैलाने का एक दूसरा ही तरीका ढूंढ निकला है। वो कहते हैं कि अगर शौचालय को शान की एक निशानी की तरह प्रचलित किया जाए तो लोग इसे अपने घरों में बनवाने में अधिक रुचि दिखाएंगे। वे कहते हैं कि बहुत से गरीब लोग पैसे इकठ्ठे

कर के मोबाइल फोन खरीदने को बेताब रहते हैं। मैं चाहता हूं कि लोग घर में शौचालय बनवाने में अपनी शान समझें, जिस तरह लोग कोई कीमती सामान खरीद कर इतराते हैं।

स्वच्छता को व्यवसाय के रूप में प्रचलित करने के लिए जैक दो तरह की पद्धतियां अपनाते हैं। पहली एडवोकेसी। सिम का कहना है,'जिस चीज की चर्चा न हो हम उसे सुधार नहीं सकते, इसीलिए हम इस विषय पर बड़े स्तर पर चर्चा करते हैं।  हम शौचालय को इस तरह प्रचारित करते हैं जैसे कि वह कोई सुंदरता की वस्तु हो और बढिय़ा व्यापार का जरिया हो।’  

शौचालय एक व्यवसाय

दूसरी पद्धति कार्योन्मुख है। 'हम समुदायों को फ्री टॉयलेट की सुविधा देने में विश्वास नहीं रखते। हम एक स्थाई स्वच्छता से प्रेरित आर्थिक तंत्र बनाने और सामुदायिक स्वामित्व स्थापित करने में विश्वास करते हैं, उनका सेनिशॉप मॉडल लोकल इंटरप्रेन्योर और सेल्स एजेंट्स, जो कि अपने समुदाय में बदलाव के दूत बनते हैं, के लिए रोज़गार पैदा करने में काफी कारगर साबित हुआ है। हम चौकीदारों और सफाई कर्मचारियों को भी इस क्षेत्र में अच्छी सुविधा देने के लिए प्रेरित करते हैं। शुरुआत में इस मुद्दे पर बात करना भी चुनौतीपूर्ण था, क्योंकि कोई भी इस बदबूदार चीज के बारे में बात करना क्यों चाहेगा? राजनेता हो या मीडिया या फिर नीति निर्धारक सभी शौचालय का नाम सुन कर भाग खड़े हुए। इनका भागना तो स्वाभाविक था, लेकिन मानव हित की बात करने वाले लोग जब इस पर बात करने से कतराने लगे तब हैरानी हुई। लेकिन अब यह संस्था धीरे-धीरे अपने प्रयासों में सफल होती दिख रही है।  

वल्र्ड टॉयलेट ऑर्गनाइजेशन जैसी संस्था के अथक प्रयास से संभव हो सका की डब्लू एच ओ / यूनिसेफ ज्वाइंट मॉनिटरिंग प्रोग्राम में इस वर्ष यह बताया गया की अच्छे शौचालयों के  इस्तेमाल का स्तर 1990 से 2015 तक 54 से बढ़ कर 68 प्रतिशत हो गया है। हालांकि शत प्रतिशत शौच मुक्त विश्व पाना एक सपने जैसा है, लेकिन जैक सिम जैसे लोग अपनी मेहनत से दुनिया को हर रोज इस सपने के और करीब ले जा रहे है।



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