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शुक्रवार, 22 जून 2018

स्वच्छता अभियान को नई रफ्तार

नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनते ही 15 अगस्त 2014 को स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से देश में साफ- सफाई की नई संस्कृति का आह्वान किया और स्वच्छ भारत अभियान का ऐलान किया। इस अभियान ने चमत्कारिक असर पैदा किया और अब हर ओर दिखने लगा है कि देश बदल रहा है

करीब एक शताब्दी पहले, 4 फरवरी 1916 को बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के शिलान्यास के अवसर पर पंडित मदन मोहन मालवीय के बुलावे पर गांधी जी भी पहुंचे थे। अपने भाषण में गांधी ने दूसरी बातों के अलावा काशी विश्वनाथ मंदिर के आसपास फैली गंदगी पर भी बोला। अपने संबोधन में उन्होंने कहा 'बीती शाम मैं विश्वनाथ मंदिर गया था और जब उन तंग गलियों से गुजरा तो स्वत: एक विचार मेरे मन को छू गया। फर्ज कीजिए, अचानक कोई अंजान व्यक्ति इस मंदिर में दर्शन करने आता है और यहां फैली गंदगी देखकर इसकी निंदा करता है। क्या उसकी निंदा उचित नहीं होगी? क्या सही मायने में यह भव्य मंदिर हमारे चरित्र का प्रतिबिंब है? क्या यह सही होगा कि हमारे मंदिरों की गलियां और रास्ते उतने ही गंदे रहें जितने अभी हैं? अगर हम अपने मंदिर तक को साफ-सुथरा नहीं रख सकते तो स्वराज की क्या नींव रखेंगे?’ 2014’ में नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद की बागडोर संभाली और स्वतंत्रता दिवस पर अपने भाषण के दौरान उन्होंने सफाई पर महात्मा गांधी के विचारों को अभिव्यक्त किया। इसके अलावा देशवासियों को स्वच्छता के महत्व के बारे में याद दिलाया। यह केवल बयानबाजी नहीं थी बल्कि एक इशारा था। उनका कहना था ''बड़ी और गंभीर बातों का बड़ा महत्व होता है, बड़ी-बड़ी घोषणाओं का भी महत्व होता है लेकिन कभी-कभी बड़ी घोषणाएं बड़ी उम्मीदें लेकर आती हैं और अगर उम्मीदें पूरी न हों तो फिर निराशा का सामना करना पड़ता है।”

दो साल से ज्यादा वक़्त बीत गया और इतने दिनों में काफी बदलाव भी आए हैं। यह बदलाव, जिसकी नींव प्रधानमंत्री ने शुरुआत में ही रखी, आज एक आंदोलन का रूप ले चुका है। यह आंदोलन एक उम्मीद लेकर आया है। कारगर योजना और ठोस प्रयास से सदियों पुरानी मानसिकता और आदतों को बदला जा सकता है। जब कहीं कोई पटेल जैसा सज्जन अपनी सोसाइटी को साफ करने का प्रण करता है या सुनीता कुमारी जैसी स्त्री जो ससुराल जाने से सिर्फ  इसीलिए मना कर देती है क्योंकि वहां शौचालय नहीं है, तब इस बात का प्रमाण मिलता है कि छोटी-छोटी कोशिशों से ही बड़ी उपलब्धि हासिल होती है।

मोदी के उस भाषण को अगर दोबारा याद किया जाए तो उनका कहना था 'अगर देश की 125 करोड़ की आबादी यह प्रण लेने को तैयार हो जाए कि वे कूड़ा नहीं फैलाएगी तो दुनिया की कोई भी ताकत हमारे शहरों और कस्बों को मैला नहीं कर सकती।’

 

लालफीताशाही की परंपरा को तोड़ा

प्रधानमंत्री ने जब स्वच्छता का बिगुल बजाया, उन्हें मालूम था कि यह अभियान कितना कठिन होगा। एक ऐसे देश में, जहां अफसरशाही कार्यप्रणाली द्वारा संचालित होती है और कछुए की चाल चलती है, समयबद्ध लक्ष्य को पूरा करना बहुत बड़ी चुनौती है। इसी वजह से मोदी ने दोहरी नीति अपनाई। इस नीति के तहत अलग-अलग मंत्रालयों के लिए बिल्कुल साफ-सुथरा एजेंडा अपनाया गया जिसमें पीएमओ द्वारा लगातार दवाब डाला गया ताकि निचले स्तर के मंत्रालयों को इससे प्रेरणा मिल सके। हर मंत्रालय के लिए लक्ष्य निर्धारित किए गए जिनकी झांकियां और कार्य-पद्धति कुछ इस प्रकार हैं-

पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय को स्वच्छ भारत मिशन का आधार बनाया गया ताकि सामूहिक स्वच्छता की कोशिशों में तेजी लाई जा सके और 2019 तक खुले में शौच की समस्या को पूरी तरह से खत्म किया जा सके। इस मंत्रालय को व्यक्तिगत शौचालय, सार्वजनिक स्वच्छता परिसर, स्वच्छता संबंधी सामग्री उत्पादकों की मदद, ग्रामीण स्वच्छता को प्रोत्साहित करने और ठोस और तरल कचरा प्रबंधन परियोजनाओं का कार्य सौंपा गया। इस पूरे मिशन की फंडिंग को मनरेगा से अलग कर लिया गया ताकि अनावश्यक विलंब या किसी तरह की भ्रांतियों को टाला जा सके।

शहरी विकास मंत्रालय को स्वच्छ भारत मिशन का शहरी भाग संभालने दिया गया। इन्हें स्पष्ट लक्ष्य दिए गए कि सभी 4041 स्थानीय शहरी इलाकों में व्यक्तिगत घरेलू शौचालय एवं सार्वजनिक शौचालयों का निर्माण किया जाए।

मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने 'स्वच्छ विद्यालय मुहिम की शुरुआत की जिसके अंतर्गत नए शौचालयों को बनवाने का प्रावधान है और लड़के एवं लड़कियों के लिए अलग-अलग शौचालय बनवाने की भी योजना है। इसके अलावे ऐसे शौचालयों की मरम्मत करवाई जा रही है जो या तो खराब हैं या फिर काफी दिनों से काम नहीं कर रहे हैं। इस मुहिम को पूरा करने के लिए सर्व शिक्षा अभियान, राष्ट्र माध्यमिक शिक्षा अभियान और स्वच्छ भारत कोष की ओर से फंडिंग की जा रही है। इस फंडिंग मॉडल की सबसे अनोखी खासियत यह है कि पीएसयू (केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम) और कॉर्पोरेट जगत भी इस मुहिम में शामिल हो रहे हैं ताकि वे अपने सीएसआर फंड का प्रयोग में लाने के लिए प्रेरित हो सकें। इन सब प्रयासों को देखकर ही गंभीर बदलाव देखे जा सकते हैं।

स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने 'कायाकल्प’ स्कीम की शुरुआत की जिसमें सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं के तहत स्वच्छता, स्वास्थ्य और संक्रमण की रोकथाम को बढ़ावा दिया जा रहा है। सर्वश्रेष्ठ केंद्र, सरकारी अस्पतालों या संस्थानों को नकद इनाम दिया जाएगा।

महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने सभी आंगनबाड़ी केंद्रों में संपूर्ण बाल विकास योजना के तहत शौचालय मुहैया करवाया।

प्रत्येक मंत्रालय के स्पष्ट कार्य और उनकी गतिविधियों के प्रतिनिधिमंडल द्वारा इन उद्देश्यों को काफी हद तक पूरा किया गया। इस प्रयास में पर्याप्त कार्यान्वयन क्षमताओं से इन मंत्रालयों को बल मिला जिसमें प्रशिक्षित कर्मियों, वित्तीय प्रोत्साहन एवं प्रणालियों और योजना एवं निरीक्षण की प्रक्रिया भी शामिल हैं। लेकिन इन तमाम प्रयासों में सबसे अहम प्रयास है लोगों की आदतों को बदलना, जिसमें अधिकारियों के पारस्परिक संवाद, जिम्मेदारियों के मानकों को तय करना और प्रभावी पुरस्कार और परिणाम प्रणाली शामिल हैं। जिनके पिछले कार्य के रिकॉर्ड सही हैं उन्हें निर्धारित कार्य सौंपे गए और उनके कार्यों का निरीक्षण भी किया गया।

चूंकि यह प्रधानमंत्री की सबसे खास परियोजना है, इनके व्यवधान और विकास को पीएमओ द्वारा ही निरीक्षण एवं संचालन किया जाता है। कुछ मामलों में तो राज्य स्तर के अधिकारियों को पीएमओ के निर्देशानुसार चुना गया है। मंत्रियों को पीएमओ की तरफ से सख्त निर्देश दिए गए हैं कि वे स्वच्छ भारत के एजेंडा को ज्यादा से ज्यादा महत्व दें और इसे गंभीरता से लें। उन्हें यहां तक निर्देश दिए गए हैं कि वे इसके परिचालन में अपनी भागीदारी भी निभाएं। और यही वजह है कि भारत के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ कि मंत्रीगण सड़कों पर झाड़ू लिए साफ-सफाई  करते दिखे। इसका सबसे प्रभावकारी बदलाव अधिकारी वर्ग की मानसिकता एवं रवैए में आया।  

स्वच्छ भारत की जो कल्पना प्रधानमंत्री ने की उसकी बदौलत निचले स्तर के अधिकारियों को भी प्रेरणा मिली और वे इस मुहिम को पूरा करने में जुट गए। तंबाकू, गुटखा और पान चबाकर थूकने वाले बाबुओं को उनके वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा इस मुहिम में ज्यादा से ज्यादा भाग लेने को प्रोत्साहित किया गया क्योंकि गंदगी लाने में इनकी पीकों का अहम योगदान रहा है। प्रत्येक कार्यालय एवं विभाग में स्वच्छता और जागरूकता अभियान के संचालन के लिए अलग-अलग निर्देश दिए गए जिसकी वजह से सरकारी दफ्तरों में, जो आजतक गंदगी का प्रमुख पर्याय हुआ करते थे, बदलाव की एक लहर दौड़ गई।   

आम आदमी के व्यवहार में परिवर्तन

प्रधानमंत्री शायद यहां तक आकर थम गए होते, क्योंकि धीरे-धीरे अधिकारी वर्गों में अपेक्षित बदलाव तो आ ही रहे थे, लेकिन स्वच्छता को व्यापक रूप देने के लिए जरूरी है कि आम आदमी भी इसे अपनाए और अपने व्यवहार में शामिल करे। वह आम आदमी जो बदलाव तो चाहता है लेकिन खुद में कोई बदलाव नहीं लाना चाहता। ऐसी मानसिकता को आम आदमी के तरीके से ही बदला जा सकता था। शायद यही वजह थी कि मोदी ने प्रधानमंत्री की तरह नहीं बल्कि एक आम आदमी की तरह ही इस अभियान में लोगों को शामिल भी किया और प्रेरित भी, यहां तक कि लोगों से स्वच्छता कायम रखने की विनती भी की।

मौलिक विधियों का पालन करते हुए बड़े-बड़े नेताओं को ग्राम पंचायतों और अलग-अलग ब्लॉकों में देखा गया। जिला स्तर के अधिकारियों को भी पूरे जोश से जागरूकता अभियान में सक्रिय देखा गया जहां वे पंचायत सभाओं में लोगों को स्वच्छता के लिए जागरूक करते दिखे। इसके लिए उन्हें प्रशिक्षित किया गया। यहां तक कि संबंधित साधन भी मुहैया कराए गए। चूंकि वे एक ही समुदाय के लोग हैं इसलिए ऐसे नेता अपने लोगों के बीच जाकर उन्हें बेहतर तरीके से स्वच्छता के बारे में समझाने के साथ प्रेरित कर पाते हैं।

यह तरीका एक मास्टर स्ट्रोक साबित हुआ। इस प्रयास से ऐसे स्थानीय नेताओं की क्षमता उभरकर बाहर आई जिन्होंने गावों और कस्बों में अपने लोगों को प्रेरित किया। और हां, इसी वजह से स्वच्छता केवल एक जागरूकता अभियान बनकर ही नहीं रह गया बल्कि सशक्तिकरण का एक कारगर साधन भी बन गया। इन स्थानीय नेताओं के प्रयासों को उपयुक्त रूप से पुरस्कृत भी किया गया जो अपने अथक प्रयासों से इस अभियान को एक पड़ाव तक ले गए। इस तरह की सफलता ने आस-पास के गांवों में ऐसी लहर-सी जगा दी ताकि वे भी ऐसी उपलब्धियों से प्रेरित हो सकें। कुछ ऐसी ही बात प्रधानमंत्री मोदी ने लाल किले की प्राचीर से 125 करोड़ की जनता को संबोधित करते हुए कही कि हम एक-दूसरे का हाथ पकड़ कर आगे चलें और एक-दूसरे की प्रेरणा भी बनें।

कायाकल्प

मशहूर और बड़ी हस्तियों से प्रेरित और आकर्षित होने की हम लोगों की आदत है। इन हस्तियों द्वारा किए गए समर्थन से हम अपने व्यवहार में बदलाव भी ले आते हैं। यही कारण है कि प्रधानमंत्री ने अपनी लोकप्रियता और प्रतिभा का इस्तेमाल करते हुए भारतीय सेलिब्रिटीज को अपने स्वच्छता अभियान का अभिन्न हिस्सा बनाया ताकि आम जनता इसे देखकर प्रेरित हो सके और अपने व्यवहार और समाज में परिवर्तन ला सके। अमिताभ बच्चन, सलमान खान, प्रियंका चोपड़ा, कमल हासन और सचिन तेंदुलकर जैसे कुछ नाम ऐसे हैं जिनसे प्रेरित होकर इस अभियान के प्रति लोगों का नज़रिया बदलने के साथ-साथ विश्वास भी बढ़ा। यह मोदी मंत्र का ही तो जादू था कि शशि थरूर ने विपक्ष में होते हुए भी इस अभियान से जुडने के लिए मोदी के निमंत्रण को तहे दिल से स्वीकार किया।

इसके बाद हर सेलिब्रिटी ने कई और सेलिब्रिटी के नाम नियुक्त किए जिससे ऑनलाइन और ऑफ लाइन जागरूकता कार्यक्रमों की एक लहर-सी दौड़ गई। चूंकि ज्यादा से ज्यादा व्यापार जगत और मीडिया के लोग इस मुहिम में शामिल हुए, 'स्वच्छ भारत मिशन’ को खूब प्रचार मिला और लोगों के बीच यह काफी लोकप्रिय भी हुआ।  

विज्ञापन जगत में भी इस अभियान को काफी स्थान और महत्व मिला फिर चाहे वो प्रिंट, टीवी या सोशल मीडिया के माध्यम ही क्यों न हो। आजकल हर जगह बस इसी अभियान की चर्चा और समर्थन की बात होती है। इस अभियान को और हवा देने के लिए बीच-बीच में मोदी अपने भाषणों और सम्मेलनों में इसकी चर्चा करते रहते हैं, फिर चाहे वो मन की बात हो, स्वतंत्रता दिवस पर भाषण हो या कोई राष्ट्रीय सम्मेलन ही क्यों न हो, 'स्वच्छ भारत मिशन’ का जिक्र जरूर होता है। इसका परिणाम यह हुआ कि जो विषय रोज सोशल मीडिया में सिर्फ एक समस्या के समाधान के रूप में देखा जाता था आज एक चर्चित विषय या यूं कहें कि सबसे खास विषय बन गया है। इस जागरूकता मिशन के चलते लोगों में एक उम्मीद जगी है, क्योंकि लोग अब गंदगी और मलबे को दूर करने के उपाय ढूंढने में लग गए हैं।

आपको याद दिला दें कि 2 अक्टूबर 2014 को जब स्वच्छ भारत मिशन की शुरुआत की गई थी तब कई लोगों ने खासकर विपक्ष ने चुटकी लेते हुए मोदी का मजाक भी उड़ाया था। उनका मानना था कि मोदी किसी निरर्थक प्रयास में जुट गए हैं और जनता को भ्रमित कर रहे हैं। इतना ही नहीं, अगर खुद उनके अपने फैंस, भक्त या चाहने वालों की बात करें तो शक तो उन्हें भी था। लेकिन यह मोदी के अथक प्रयास का ही नतीजा है कि यमुना का जल स्तर कुछ हद तक बढ़ा है। इस अभियान के अंतर्गत काफी कार्य किए जा चुके हैं और अभी काफी कुछ करने बाकी हैं लेकिन हां, इतना तो तय है कि मोदी के दृढ़ संकल्प और प्रयास ने कई लोगों को प्रभावित किया यहां तक कि अपनी ओर आकर्षित भी किया। उनकी इस कोशिश का दूरगामी असर तो होगा ही साथ ही यह देश की आत्मा को भी एक नया रूप देगा।

आंकड़े हमेशा बदलाव का सही स्वरूप नहीं दिखा पाते। जहां हर समस्या का दोष एक-दूसरे पर मढऩे की आदत हो, जो लापरवाही और निष्क्रियता का गढ़ हो, वहां मोदी के मिशन को आंकड़ों से नहीं आंका जा सकता। आने वाली पीढ़ी को शायद इस स्वच्छता क्रांति के असर की कहानी कम ही मालूम हो लेकिन उनके सामने एक बदले हुए भारत की तस्वीर जरूर होगी जिसको बनाने का सुनहरा सपना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देखा है और उनकी सोच उस बदली हुई तस्वीर में साफ दिखेगी।   

 

एक नज़र में

प्रधानमंत्री मोदी के स्वच्छता अभियान ने पकड़ी गति, समाज की बदलने लगी मानसिकता

राजनीतिक वर्ग, नौकरशाह और सेलिब्रिटीज भी इस अभियान को बढ़ा रहे आगे

स्वच्छता का मतलब गलियों को साफ करना, शौचालय बनाना नहीं बल्कि सोच और व्यवहार बदलना है

हाईलाइट

देश में स्वच्छता को लेकर उम्मीदों से कहीं ज्यादा बदलाव दिखने को मिल रहा है

मोदी ने अपने करिश्मे के सहारे ही फिल्मी सितारों को स्वच्छता अभियान के साथ जोड़ा



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