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मंगलवार, 25 जून 2019

हार जाएगा एचआईवी वायरस!

एचआईवी संक्रमण से एड्स में तब्दील होने की प्रक्रिया सुस्त पड़ रही है और यह कम संक्रामक हुआ है। वायरस में आ रहे बदलाव से इस महामारी को रोकने के प्रयास में मदद मिल सकती है

दुनियाभर में एचआईवी और एड्स का खतरा कम हुआ है। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में हुए एक वैज्ञानिक अध्ययन के मुताबिक हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली के अनुसार बदलाव आने के कारण एचआईवी वायरस कमजोर पड़ रहा है। अध्ययन के अनुसार अब एचआईवी संक्रमण से एड्स में तब्दील होने की प्रक्रिया सुस्त पड़ रही है और यह कम संक्रामक हुआ है। वायरस में आ रहे बदलाव से इस महामारी को रोकने के प्रयास में मदद मिल सकती है।
कुछ वायरोलॉजिस्ट तो यहां तक मान रहे हैं कि इस वायरस में बदलाव आने की प्रक्रिया जारी रहने के कारण इसका धीरे-धीरे लगभग हानि रहित हो जाने की संभावना है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत, चीन और पाकिस्तान उन 10 देशों में शामिल हैं, जहां 2016 में एशिया एवं प्रशांत क्षेत्र में नए एचआईवी संक्रमण में सबसे ज्यादा वृद्धि हुई है। एड्स पर अपनी रिपोर्ट में यूएनएड्स ने कहा है कि इस खतरनाक रोग के खिलाफ संघर्ष में पहली बार पलड़ा भारी हुआ है, क्योंकि एचआईवी वाइयरस से संक्रमित 50 फीसदी लोगों को अब इलाज उपलब्ध है जबकि 2005 के बाद पहली बार एड्स से संबंधित मौतों की संख्या तकरीबन आधी रह गई है।
एशिया प्रशांत क्षेत्र में नए संक्रमण के ज्यादातर मामले भारत, चीन, इंडोनेशिया, पाकिस्तान, वियतनाम, म्यांमार, पापुआ न्यू गिनी, फिलीपींस, थाईलैंड और मलेशिया में हैं। पिछले साल इन देशों में क्षेत्र के 95 फीसद से ज्यादा एचआईवी के संक्रमण के मामले हुए। एशिया प्रशांत क्षेत्र में एचआईवी के नए संक्रमण की वार्षिक  संख्या पिछले छह साल के दौरान 13 प्रतिशत गिरी है। 2010 में यह संख्या 3,10,000 थी जबकि 2016 में यह संख्या 2,70,000 थी।

संक्रमण शक्ति
एचआईवी का विषाणु रूप बदलने में माहिर है। मानव शरीर के प्रतिरक्षा प्रणाली के अनुकूल खुद को ढालने और उसके असर से बच निकलने के लिए यह बड़ी तेजी और सहजता से खुद को बदलता है। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर फिलिप गोल्डर कहते हैं, ‘एचआईवी वायरस के सामने मुश्किलें लगातार बढ़ रही हैं। अब इसे जीवित रहने के लिए खुद में बदलाव लाना पड़ रहा है।’ उनका मानना है कि बदलाव से वायरस की संक्रमण शक्ति को कमजोर हो रही है, जिसके चलते इसके एड्स में बदलने में ज्यादा वक्त लगता है।
‘प्रसीडिंग ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज’ के जांच परिणाम भी यही बताते हैं कि एंटीरेट्रोवायरल दवाइयों के असर के कारण एचआईवी कमजोर पड़ रहा है। प्रोफेसर गोल्डर का कहना है, ‘20 साल पहले एचआईवी वायरस को एड्स का रूप लेने में 10 साल लगते था जबकि अब इसमें साढ़े बारह साल लग जाते हैं।’ हालांकि समूह ने चेतावनी भी दी है कि एचआईवी के कमजोर पड़ने के बावजूद यह अभी भी खतरनाक है और इससे एड्स हो सकता है।

रोजाना दवा से छुटकारा 
डॉक्टरों ने एचआईवी के 12 मरीजों की प्रतिरोधक प्रणाली यानी उनकी बीमारियों से लड़ने की क्षमता बढ़ाने के लिए जीन थेरेपी का इस्तेमाल किया है और इसके नतीजे काफी उत्साहजनक हैं। ऐसे में इस बात संभावना बढ़ गई है कि मरीजों को एचआईवी के संक्रमण पर काब़ू पाने के लिए रोजाना दवा लेने की जरूरत न पड़े। 
एचआईवी या ह्यूमन इम्युनोडेफिशिएंसी वायरस से एड्स नाम की बीमारी होती है, जो शरीर में रोग से लड़ने की क्षमता को कम या खत्म कर देती है। जीन थेरेपी के दौरान मरीज की श्वेत रक्त कोशिकाओं को उनके शरीर से निकाल कर उनमें एचआईवी प्रतिरोधक क्षमता विकसित की गई और उन्हें दोबारा शरीर में डाल दिया गया। ‘न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन’ में प्रकाशित एक छोटे अध्ययन में कहा गया है कि यह तकनीक पूरी तरह से सुरक्षित है।

टी-सेल में बदलाव
इस अध्ययन में बताया गया है कि कुछ लोग बेहद दुर्लभ म्यूटेशन या कोशिकाओं में होने वाले परिवर्तन वाले होते हैं, जो उन्हें एचआईवी से बचाता है। म्यूटेशन के तहत प्रतिरोधक प्रणाली के तहत आने वाले टी-सेल की संरचना में बदलाव आता है और वायरस भीतर दाखिल नहीं हो पाते हैं और अपनी संख्या को बढ़ा नहीं पाते हैं। टिमोथी रे ब्राउन ऐसे पहले व्यक्ति हैं, जो एचआईवी से मुकाबला करने में कामयाब रहे और उनकी सेहत में सुधार हुआ। ल्यूकिमिया ट्रीटमेंट के दौरान उनकी प्रतिरोधक प्रणाली काफ़ी कमज़ोर हो गई थी और फिर म्यूटेशन के जरिए किसी दूसरे व्यक्ति की मदद से वह इसे वापस पा सके। अब पेंसिलवेनिया यूनिवर्सिटी में शोधकर्ता बीमारियों से लड़ने की क्षमता बढ़ाने के लिए मरीज की प्रतिरोधक क्षमता का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसके तहत खून से लाखों टी-सेल लिए गए और प्रयोगशाला में उनकी संख्या को अरबों तक बढ़ा दिया गया।

उम्मीद की रोशनी
चिकित्सकों ने टी-सेल के अंदर डीएनए का संपादन किया ताकि उनमें शील्डिंग म्यूटेशन का विकास किया जा सके। इसे सीसीआर5-डेल्टा-32 के नाम से भी जाना जाता है। इसके बाद करीब दस अरब कोशिकाओं को दोबारा शरीर में डाला गया, हालांकि करीब 20 प्रतिशत कोशिकाएं ही सफलता के साथ संशोधित हो सकीं। फिर जब मरीज को चार सप्ताह तक दवा नहीं दी गई तो ये पाया गया कि शरीर में असंरक्षित टी-सेल की संख्या तो तेजी से घटी, लेकिन संशोधित टी-सेल टिकाऊ साबित हुईं और कई महीने बाद तक खून में बनी रहीं।
पेंसिलवेनिया यूनिवर्सिटी में क्लीनिकल सेल एंड वैक्सीन प्रोडक्शन फैसिलिटी के निदेशक प्रोफेसर ब्रूस लेविन ने बताया, ‘यह पहली पीढ़ी का संपादन है जिसका प्रयोग अब से पहले कभी भी इंसानों पर नहीं किया गया था।’ उन्होंने बताया, ‘हम इस तकनीक का इस्तेमाल एचआईवी में कर सके हैं और नतीजों से पता चलता है कि यह सुरक्षित और व्यावहारिक है। इससे एचआईवी के इलाज में काफी मदद मिलेगी।’

 



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