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बुधवार, 18 जुलाई 2018

भगवान, झूठ न बुलवाए

महबूब खान की बेमिसाल फिल्म 'मदर इंडिया’ के किरदार सुखी लाला यादों में आज भी जिंदा है। सिल्वर स्क्रीन से निकल कर आम जिंदगी का हिस्सा बनने वाले इस किरदार को कन्हैया लाल ने अपने अभिनय से अमर बना दिया। नतीजा यह हुआ कि कन्हैया लाल दशकों लंबे अपने कैरियर में फिल्म दर फिल्म इसी किरदार को निभाते रह गए। ऐसा क्यों और कैसे हुआ? प्रस्तुत है असीम चक्रवर्ती की रिपोर्ट-

अभिनय के पैमाने पर देखें तो कई ऐसी भूमिकाएं होती हैं जो कालजयी बन जाती हैं। कई ऐसी होती जो इनसे दो कदम आगे बढ़ कर आम जन-जीवन के साथ ही रच-बस जाती हैं। 1957 में प्रदर्शित महबूब खान की अमर कृति 'मदर इंडिया’ से जुड़ी कोई भी चर्चा सुखी लाला के पात्र के बिना अधूरी है। सालों बीत गए पर आज भी इस फिल्म का शोषक साहूकार सुखी लाला बेहद प्रासंगिक हो कर हमारे आम जीवन में मौजूद है। आज भी गांव-देहात में सेठ-साहूकारों को चिढ़ाने के लिए लोग उन्हें सुखी लाला कह कर संबोधित करते हैं। दीगर बात यह है कि इनमें से बहुत सारे लोगों को यह पता नहीं है कि यह सुखी लाला शब्द कहां से आया। 1940 में पहली बार अपनी फिल्म 'औरत’ में एक धूर्त साहूकार के किरदार को पेश करते समय खुद महबूब खान ने भी कभी नहीं सोचा था कि वे एक अमरपात्र की रचना कर रहे हैं। और न ही इस पात्र को अपने सहज़ अभिनय से जीवंत करने वाले उत्तर प्रदेश से आए एक अनजान कलाकार पंडित कन्हैयालाल चतुर्वेदी को कहां पता था कि वे आम भारतीय ग्राम समाज की सच्चाई का आईना बनने जा रहे हैं।

बस सुखी लाला ही बदले नहीं गए

वह दौर श्वेत श्याम फिल्मों का था, इसीलिए 'औरत’ फिल्म की आशातीत कामयाबी के बावजूद लीजेंड फिल्मकार महबूब खान का मन पूरी तरह से संतुष्ट नहीं हुआ। उन्हें बार-बार ऐसा लगता था कि इस फिल्म के जरिए ग्रामीण समाज की जिस तस्वीर को वे पेश करना चाहते थे, वह पूरी तरह से आकार नहीं हो पाई। इस फिल्म को वह भूले नहीं। 17 साल बाद पूरी भव्यता के साथ उन्होंने इसे 'मदर इंडिया’ के नाम से बनाई। इस फिल्म का सबसे आश्चर्यजनक पहलू यह था कि सिर्फ  कन्हैयालाल ही एकमात्र ऐसे कलाकार थे, जिनका कोई विकल्प महबूब खान के पास नहीं था। उनके अलावा फिल्म 'औरत’ के किसी भी कलाकार को उन्होंने 'मदर इंडिया’ ने नहीं लिया। सन् 1960 में अपने एक इंटरव्यू में उन्होंने इसकी दिलचस्प वजह बताई, 'मैंने जब कन्हैयालाल से यह कहा था कि आप लाला की भूमिका फिर करने वाले हैं, तो उनके चेहरे पर चमक आ गई। जैसे उन्हें यकीन था कि यह रोल उनके पास ही आने वाला है। बात सच भी थी, 'मदर इंडिया’ की कॉस्टिंग फाइनल करने में थोड़ी अड़चन आई, लेकिन लाला की भूमिका में मैं कन्हैयालाल के अलावा किसी और को सोच नहीं पाया और न ही मुझे ऐसा कोई सुझाव मिला।’ 'मदर इंडिया’ के लिए नरगिस को ढ़ेरों मान-सम्मान मिला, पर इस फिल्म से संबंधित हर चर्चा में उन्होंने हमेशा मुक्त कंठ से कन्हैयालाल के अभिनय की तारीफ  की। 'मदर इंडिया’ इस शोषक साहूकार सुखी लाला को राधा का बेटा बिरजू जो सबक सिखाता है, सुखी लाला की कोई भी याद उनके बिना अधूरी है। मृत्यु के कुछ माह पहले सुनील दत्त ने भावुक होकर कहा था, 'ऐसे बेहतरीन कलाकार कम ही आते हैं। मैं तो अक्सर कैमरे के पीछे खड़े हो कर एकटक उनके परफॉर्मेंस को देखता था। कभी ऐसा नहीं लगता कि वो अभिनय कर रहे हैं। इतने विनम्र और सादगी पसंद इंसान थे कि उन्हें इस बात का जरा भी एहसास नहीं था कि वे कैमरे के सामने क्या चमत्कार कर जाते हैं।’

जब मुंबई के होकर रह गए

कन्हैयालाल ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे। संपन्न परिवार के कन्हैयालाल अभिनेता होने के साथ-साथ एक अच्छे कवि भी थे। नाटक लिखने का भी शौक था। चौथी कक्षा तक की पढ़ाई पूरी करने के बाद पाठ्य पुस्तकों से उनका जो नाता टूटा तो वह फिर कभी जुड़ नहीं पाया। लिहाजा अपने पुश्तैनी जनरल मर्चेंट की दुकान का थोड़ा बहुत काम संभालना शुरू किया। इसमें मन नहीं रमा तो आटे की चक्की का काम अनिच्छा से संभाल लिया। असल में बचपन से ही नाटकों के प्रति गहरे लगाव के चलते उनका मन किसी भी काम में नहीं लगता था। यह वह दौर था, जब अभिनय के कैरियर को बहुत सम्मानजनक दर्जा नहीं मिला था, लेकिन उनके बाल हठ के आगे परिवार वालों को झुकना पड़ा और उन्हें आगा खान कश्मीरी के नाटक 'आंख के नशे’ में तबले वाले की अहम भूमिका मिल गई। उन्हें लगा जैसे उन्होंने बहुत बड़ा कमाल कर दिया। बस वे नाटकों में अच्छे खासे व्यस्त हो गए। नाटकों के मंचन के सिलसिले में उन्हें मुंबई आना पड़ा और फिर वे पूरी तरह से मुंबई के हो कर रह गए। यहां उन्होंने स्वयं का लिखा अपना नाटक 'पंद्रह अगस्त के बाद’ का मंचन किया। इस नाटक की वजह से उन्हें जो तारीफ  मिली, उसने उन्हें फिल्मों का रास्ता दिखा दिया। फिल्मों में उन्हें छोटी-मोटी भूमिकाएं मिलने लगी। पहली बार फिल्म 'औरत’ में निभाए गए अपने रोल की वजह से उन्होंने अपने इर्द-गिर्द प्रशंसकों की भीड़ कर ली।

जब सुखी लाला टाइप्ड हो गया

फिल्मों में काम करने का यह सिलसिला जारी था। वे तब सिर्फ  यह देख कर खुश थे कि उनके अच्छे काम की सराहना हो रही थी। मगर 'मदर इंडिया’ ने सारी तस्वीर बदल दी। किसी किरदार की ऐसी अमिट पहचान बहुत कम ही देखने को मिलती है। मगर इस माइल स्टोन भूमिका ने उन्हें एक इमेज में भी ढ़ाल दिया, लेकिन उनके कलाकार मन ने इसे भी एक चुनौती के रूप में लिया। लकीर के फकीर ज्यादातर निर्माताओं को समझाने की बजाए वे ऐसे एक ढर्रे के रोल को ही हर बार एक नये अंदाज में पेश करते रहे। 'गंगा जमुना’, 'उपकार’, 'दुश्मन’, 'अपना देश’, 'गोपी’ आदि कई फिल्मों की अपनी भूमिकाओं को उन्होंने सहृदयता का जामा पहनाया। फिल्म 'गंगा जमुना’ में उनके साथ काम करने के दौरान अभिनय सम्राट दिलीप कुमार तक सहम गए थे। आज भी उनका जिक्र चलने पर दिलीप साहब हंस कर कहते हैं, 'मैं उनकी प्रस्तुति से बहुत घबराता था। संवाद अदायगी के दौरान वे जिस तरह से सामने वाले को रिएक्शन देते थे, उनका सामना करना बहुत मुश्किल होता था।’

सुपर स्टार राजेश खन्ना ने जिन फिल्मों में कन्हैयालाल के साथ काम किया था, उनमें 'दुश्मन’, 'अपना देश’ मुख्य है। काका का कहना था 'वे एकदम नेचुरल कलाकार थे। इतने परिपक्व कलाकार होने के बावजूद वे अपने दृश्यों को ध्यान से सुन कर बराबर रिहर्सल करते थे। 'दुश्मन’ फिल्म में उनका एक तकिया कलाम था 'कर भला तो हो भला...’ तब मैं फिल्म के निर्देशक दुलाल गुहा से मजाक में कहता था, दुलाल दा पंडित जी तो यह संवाद बोल कर सारा सीन ही चुरा ले जाते हैं।’ फिल्म 'धरती कहे पुकार के’ में कन्हैयालाल ने अभिनेता संजीव कुमार और जितेन्द्र के बड़े भाई की भूमिका की थी। पुरानी यादों में खो कर जितेंद्र बताते हैं, 'मेरी राय में तो इस फिल्म का सबसे यादगार पक्ष वही थे। मैं उन दिनों फिल्मों में नया-नया आया था। फिल्म की शूटिंग के बाद भी मुझे ऐसा लगता था कि मैं अपने बड़े भाई के साथ हूं। ऐसे आदर्श और मूल्यों का पालन करने वाले कलाकार आज कहां हैं। फिर 'मदर इंडिया’ की उनकी भूमिका तो हमेशा ही अभिनय के छात्रों के लिए एक अहम अध्याय की तरह है।’ शायद अभिनय के इस अध्याय के चलते ही सिने प्रेमी पंडित कन्हैयालाल चतुर्वेदी को कभी भुला नहीं पाएंगे। 



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