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मंगलवार, 25 जून 2019

शिक्षा का प्रथम सर्ग

'प्रथम' संस्था बच्चों तक शिक्षा की सुविधा पहुंचाने के साथ उन तमाम जरूरतों पर काम कर रही है, जिसकी किसी बच्चे को प्राथमिक से लेकर उच्च स्तरीय अध्ययन के दौरान जरूरत पड़ सकती है

'प्रथम' की शुरुआत वर्ष 1995 में म्युनिसिपल कॉरपोरेशन ऑफ ग्रेटर मुंबईयूनिसेफ और कुछ वरिष्ठ नागरिकों की साझी पहल से हुई। इसे एक चैरिटेबल ट्रस्ट के तौर पर शुरू किया गया। 'प्रथमको शुरू करने के पीछे मकसद था मुंबई में स्लम और गरीब इलाकों में रहने वाले बच्चों तक तालीमी पहुंच को मुमकिन और आसान बनाना। आज यह संस्था आकार और कामकाज-दोनों ही लिहाज से काफी बड़ी हो चुकी है। अपने जन्म के दो दशक के भीतर इस संस्था ने अपने शुरुआती मकसद के साथ शिक्षा को लेकर कई तरह के अभियान और प्रयोग किएजिसका नतीजा यह है कि आज की तारीख में शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाली देश की सबसे बड़ी गैरसरकारी संस्था है।

20 सूबों में विस्तार

दिलचस्प है कि जिस संस्था का जन्म महज एक क्षेत्र विशेष के स्लम और गरीब इलाके के बच्चों तक शिक्षा की पहुंच सुनिश्चित कराने के लिए हुआ थाआज वह देश के 20 सूबों के 47 लाख बच्चों तक अक्षर जागृति फैला रही है। संस्था के फ्लैगशिप प्रोग्राम का नाम है-'रीड इंडिया', जिसे वर्ष 2007 में शुरू किया गया। उल्लेखनीय है कि अपने आरंभ के तीन साल के भीतर ही 'प्रथमके इस कार्यक्रम की पहुंच 33 लाख बच्चों तक हो चुकी थी।

आज यह संस्था बच्चों तक शिक्षा की सुविधा पहुंचाने के साथ उन तमाम जरूरतों पर काम कर रही हैजिसकी किसी बच्चे को प्राथमिक से लेकर उच्च स्तरीय अध्ययन के दौरान जरूरत पड़ती या पड़ सकती है। कहना नहींं होगा कि यह एक बड़ा मिशन है। दरअसलयह संस्था आज शिक्षा को लेकर किसी इकहरी पहल के बजाय इस मुद्दे पर सर्व समावेशी दृष्टि से काम कर रही है। भारत जैसे देश में जहां शिक्षा के मूल्यांकन का प्राथमिक पैमाना आज भी साक्षरता दर है और वह दर भी वैश्विक औसत से सामान्य से लेकर लैंगिक आधार पर पीछे हैवहां इस दृष्टि को अमल में लाने की फिक्र ही अपने आप में क्रांतिकारी है।

असर-2016

साल के शुरू में ही एक ऐसी रिपोर्ट आईजिसने एक बार इस सच को जाहिर किया कि शिक्षा के क्षेत्र में अभी हमें बहुत आगे जाना है। दरअसलसवाल सिर्फ शिक्षा के प्रसार का नहींं हैबल्कि उसके साथ उसकी गुणात्मकता को भी समान रूप से बरकरार रखने का है। अच्छी बात यह है कि आज इस बारे में नीतिगत तौर पर सरकार भी मानती है कि अगर देश में नागरिक शक्ति को जागरूक और श्रमशक्ति को उन्नत बनाना हैतो तालीमी स्तर पर काफी सघनता से ध्यान देने की जरूरत है। इस दरकार को सरकार की नीतिगत समझ बनाने का श्रेय जाता है गैरसरकारी संस्था 'प्रथम एजुकेशन फाउंडेशनको। यह संस्था इस बाबत हर साल एक रिपोर्ट (एनुअल स्टेट्स अप एजुकेशन रिपोर्टजारी करती हैजिसे लोग 'असरके रूप में जानते हैं। 18 जनवरी 2017 को प्रथम ने 'असर-2016' जारी किया। यह उसकी तरफ से आई 11वीं रिपोर्ट है। यह रिपोर्ट मूल रूप से शिक्षा को लेकर एक सघन सर्वेक्षण और उसका विश्लेषण है। इससे राज्यों के प्रत्येक जिले के गांवों में बच्चों के पंजीकरण एवं प्रारंभिक अधिगम (लर्निंग आउटकमके विश्वसनीय आंकड़े उपलब्ध होते हैं। सर्वेक्षण में प्रत्येक जिले से 30 गांवों को और प्रत्येक गांव से 20 घरों को चुना जाता है। इस तरह कह सकते हैं कि यह एक सैंपल सर्वे है पर इसके सैंपल का आधार और चुनाव दोनों ही खासा वैज्ञानिक और विस्तृत है। मोटे तौर पर एक सालाना रिपोर्ट जारी करने में 3-16 वर्ष की आयु के लगभग 7,00,000 बच्चों की तालीमी स्थिति की जानकारी ली जाती है।

'प्रथमकी तरफ से वर्ष 2005 से यह रिपोर्ट लगातार जारी की जा रही है। वर्ष 2015 में इसका प्रकाशन किसी कारण नहींं किया गया था। वर्ष 2016 के रिपोर्ट के लिए 589 जिलों के 17,473 गांवों में कुल 3,50,232 घरों के लगभग 5,62,305 बच्चों पर सर्वेक्षण किया गया।

बात करें 'असर-2016' कीतो इसमें जो बातें खासतौर पर निकलकर सामने आईंउसमें वर्ष 2014 से 2016 के बीच राष्ट्रीय स्तर पर सभी आयु-वर्ग के पंजीकरण में वृद्धि की बात अहम है। जो बात चिंताजनक हैवह यह कि कुछ राज्यों में विद्यालय न जाने वाले बच्चों (6-14 आयु-वर्गकी संख्या में इजाफा हुआ है। ऐसे राज्यों में मध्य प्रदेश (3.4 प्रतिशत से 4.4 प्रतिशत), छत्तीसगढ़ (2 प्रतिशत से 2.8 प्रतिशतऔर उत्तर प्रदेश (4.9 प्रतिशत से 5.3 प्रतिशतशामिल हैं। यह रिपोर्ट शिक्षा के क्षेत्र में लैंगिक बराबरी के मुद्दे को भी तथ्यगत रूप में उठाती है। 'असर-2016' का यह खुलासा कि कुछ राज्यों में विद्यालय जाने से वंचित रही लड़कियों (11-14 आयु-वर्गका अनुपात आठ प्रतिशत से ज्यादा हैवाकई सरकार और समाज-दोनों के लिए चिंताजनक है। इसके अलावा निजी स्कूलों में पंजीकरण की स्थितिसरकारी स्कूलों में पढऩे वाले बच्चों की योग्यताविद्यालय में बच्चों की उपस्थिति की हालतस्कूलों में मौजूद सुविधाएं आदि को लेकर भी रिपोर्ट में कई महत्वपूर्ण निष्कर्ष हैं।

तीसरी के बच्चे नहींं पढ़ पाते पहली कक्षा की पुस्तक

पिछले कुछ सालों में बच्चों के पढऩे की क्षमता बढ़ी हैलेकिन वर्ष 2014 में कक्षा-3 के जहां 40 फीसदी बच्चे कक्षा एक के पाठ्यक्रम पढ़ सकते थेवह संख्या वर्ष 2016 में 42 फीसदी हो गई है। अक्सर ऐसी खबरें आती हैं कि बच्चों में पढऩे की क्षमता का उचित विकास नहींं हो रहा है। मौजूदा समय में 6-14 आयु वर्ग में पंजीकरण दर 96.9 फीसदी है। माध्यमिक शिक्षा की बात करें तो 15-16 आयु वर्ग के लड़के और लड़कियों की पंजीकरण दर में सुधार हुआ है। राष्ट्रीय स्तर पर वर्ष 2014 में यह अनुपात 83.4 फीसदी थाजो 2016 में बढ़कर 84.7 फीसदी हो गया।

ड्रॉप आउट

'असर-2016' यह बात खासतौर पर रेखांकित करता है कि सरकार की तमाम कोशिशों और कई आकर्षक योजनाओं के बावजूद ड्रॉप आउट रेट में कमी नहींं आई है। अगर माध्यमिक स्तर पर लड़कियों के ड्रॉप आउट रेट की बात करें तो 11-14 आयु वर्ग में यह संख्या फीसदी से अधिक है। इस मामले में राजस्थान और उत्तर प्रदेश काफी आगे हैं।

निजी स्कूलों का बढ़ता आकर्षण

देश भर में समान शिक्षा प्रणाली अपनाने की मांग भले उठ रही होलेकिन निजी स्कूलों के प्रति ग्रामीण इलाकों में आकर्षण बढ़ा है। ग्रामीण अंचलों में भी लोग चाहते हैं कि उसका बच्चा निजी स्कूलों में पढ़े। राष्ट्रीय स्तर पर 6-14 आयु वर्ग के 30.5 फीसदी बच्चे निजी स्कूलों में पंजीकृत होते हैंलेकिन अगर राज्यों के आंकड़ों पर गौर करें तो बिहार में 12.9 फीसदीझारखंड में 17.4 फीसदीआंध्र प्रदेश में 34.2 फीसदीकेरल में 54.8 फीसदीउत्तर प्रदेश में 52.1 फीसदी और पश्चिम बंगाल में 9.3 फीसदी बच्चे निजी स्कूलों में दाखिला लेते हैं। इस तरह देखें तो सबसे शिक्षित केरल में निजी स्कूलों में दाखिला लेने वाले बच्चों की संख्या सबसे अधिक है।

झारखंड से आगे बिहार

'असर-2016' के अनुसारराष्ट्रीय स्तर पर कक्षा-3 के 25.1 फीसदी बच्चे कक्षा-2 का पाठ पढऩे में सक्षम थे। इस मामले में बिहार राष्ट्रीय स्तर से पीछे है। बिहार में इस वर्ग के 20.7 फीसदीझारखंड के 16.4 फीसदी बच्चे कक्षा-2 का पाठ पढऩे में सफल रहे। केरल में यह संख्या 45.5 फीसदीमहाराष्ट्र में 40.7 फीसदीओडिशा में 35.4 फीसदी है। बिहार और झारखंड के आगे पश्चिम बंगाल और उत्तराखंड हैं। अगर कक्षा-8 के स्तर पर बात करें तो राष्ट्रीय स्तर पर 73 फीसदी बच्चे कक्षा-2 स्तर के पाठ्यक्रम पढऩे में सक्षम थेलेकिन इस मामले में बिहार के छात्रों की संख्या 75.1 फीसदीझारखंड में 67.8 फीसदीकेरल में 85.3 फीसदी है। अगर अकेले गणित की बात करें तो राष्ट्रीय स्तर पर कक्षा-8 के महज 43.2 फीसदी बच्चे ही भाग करने में सक्षम पाए गएजबकि बिहार में यह संख्या 62.3 फीसदीझारखंड में 42.7 फीसदीकेरल में 53 फीसदीगुजरात में 65.4 फीसदी और उत्तर प्रदेश में 37.4 फीसदी रही। दिलचस्प है यह देखना कि गणित के मामले में बिहार के छात्र केरल के छात्रों से बेहतर हैं।

मूलभूत सुविधाओं में सुधार

स्कूलों में पेयजल और शौचालयों की उपलब्धता की बात करें तो वर्ष 2016 में राष्ट्रीय स्तर पर 74.1 फीसदी स्कूलों में पेयजल की सुविधा मौजूद थी। बिहार के 89.5 फीसदीझारखंड के 81.5 फीसदीकेरल के 80.5 फीसदीउत्तर प्रदेश के 82 फीसदी स्कूलों में पेयजल की सुविधा मौजूद थी। अगर स्कूलों में लड़कियों के लिए शौचालय सुविधा की बात करें तो वर्ष 2016 में राष्ट्रीय स्तर पर 61.9 फीसदी स्कूलों में इसकी उपलब्धता थी। वहीं बिहार में 60.8 फीसदीझारखंड में 61.4 फीसदीकेरल में 78.8 फीसदीउत्तर प्रदेश में 51.5 फीसदी और पश्चिम बंगाल में 64.3 फीसदी स्कूलों में यह सुविधा थी। आंकड़ो पर गौर करें तो स्कूलों में लड़कियों को शौचालय मुहैया कराने में बिहार से अच्छा प्रदर्शन झारखंड का है। 'असर-2016' की रिपोर्ट के अनुसारवर्ष 2016 में राष्ट्रीय स्तर पर 20 फीसदी स्कूलों में बच्चों के लिए कंप्यूटर की सुविधा उपलब्ध थीलेकिन बिहार में यह संख्या 7.1 फीसदीझारखंड में 4.3 फीसदीकेरल में 89 फीसदीमहाराष्ट्र में 55.1 फीसदीकर्नाटक में 45 फीसदीउत्तर प्रदेश में 2.7 फीसदी और पश्चिम बंगाल में 3.5 फीसदी स्कूलों में ही कंप्यूटर की सुविधा उपलब्ध है। 



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