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मंगलवार, 25 जून 2019

मेनुका - हर खालीपन को भर देता है वृंदावन

जीवन में उसे सब कुछ मिला, लेकिन अचानक पति के न रहने पर, जो खालीपन उसकी जिंदगी में आया उसको भरने का कोई रास्ता न था

एक विधवा जीवन की शून्यता, ऐसा खालीपन है जिसे भरा जाना नामामुकिन सा लगता है। और जब इस शून्यता में, समाज की बंदिशें जुड़ जाती हैं, तो उसकी वेदना असहनीय हो जाती है। कुछ ऐसी ही कहानी है, पश्चिमी बंगाल के सिलीगुड़ी की रहने वाली मेनुका पाल की।
10 साल की उम्र में मेनुका की शादी 18 साल के आदमी से कर दी गई थी। उस वक्त शादियां कम उम्र में ही हो जाया करती थीं, शायद यही समाज का रिवाज था। इस रिवाज को मेनुका ने भी निभाया और उस उम्र में, जब उसे शादी के मायने भी नहीं पता थे, वह अपने पति के साथ रहने उसके घर चली गई।
किसी नए सामान्य जोड़े की तरह, उन दोनों ने भी जिंदगी के ढेरों सपने सजाए और अपनी खूबसूरत कहानी लिखने की कोशिशें शुरू की। उसके पति की आमदनी बहुत ज्यादा तो नहीं थी, लेकिन जीवन आसानी से आगे बढ़ सके और वो दोनों खुशहाल पल बिता सके, इतनी जरूर थी। जिंदगी की इसी भागदौड़ और संघर्षों के बीच उसने 3 लड़कियों को जन्म दिया।
मेनुका कहती हैं, ‘मेरी शादी बहुत कम उम्र में हो गई थी, लेकिन मेरे पति ने कभी मुझे ये अहसास नहीं होने दिया कि अपना घर छोड़कर आई हूं। हम दोंनों अपनी छोटी सी जिंदगी में बहुत खुश थे। मैंने 3 बेटियों को जन्म दिया, मेरे पति 2 लड़कियों के बाद एक बेटा चाहते थे। लेकिन लड़की होने पर भी, उसे कोई परेशानी नहीं थी और वो खुश थे। हमने अपने बच्चों को बहुत प्यार से बड़ा किया।’
जब लड़कियां बड़ी हो गईं, तो मेनुका और उनके पति ने अपनी क्षमता के अनुसार खूब धूम-धाम से तीनों लड़कियों की शादी की। शादी के बाद जब लड़कियां अपने घर चली गईं तो दोनों पति-पत्नी ही एक-दूसरे का सहारा बने। मेनुका को बच्चों के बिना घर में अकेलापन लगने लगा, लेकिन उसके पति ने उसे संभाला और दोनों इस मुश्किल वक्त में एक-दूसरे का हाथ मजबूती से थामे रहे।
मेनुका भावुक होकर कहती हैं, ‘हमारे समाज में तो बेटियों को पराया ही समझा जाता है। उनका अपना घर तो उनके पति का घर होता है। हमने अपने बच्चों को बहुत प्यार से पाला था, जब वो घर से चले गए, तो बहुत अकेलापन लगता था। बच्चों के बिना, मेरे पति भी बहुत परेशान रहने लगे थे। लेकिन हम दोनों ने एक-दूसरे को संभाला और सच्चे साथी की तरह सहारा बने रहे।’
लेकिन शायद जिंदगी को कुछ और मंजूर था, उसे अभी सबसे बड़ा इम्तिहान लेना था। लगभग 20 साल पहले मेनुका जब 55 साल की थी, उनके पति गुजर गए और उनकी जिंदगी में छोड़ गए वैधव्य का वो खालीपन, जिसे शायद किसी भी भावनात्मक रिश्ते से नहीं भरा जा सकता था। 
मेनुका ने कई बार सोचा कि वो अब अपनी लड़कियों के पास चली जाए और वहीं रहे। लेकिन समाज का दकियानूसी चेहरा उसके सामने आ जाता था, जिस पर साफ-साफ लिखा था, मां-बाप बेटियों के यहां नहीं रह सकते हैं। मेनुका भी इस सच को पढ़ चुकी थी और बेटियों के यहां न जाकर, अकेले ही, वैधव्य के सफेद रंग के साथ अपना जीवन जिए जा रही थी।
मेनुका बताती हैं, ‘पति के गुजर जाने के बाद, मेरा मन अशांत सा रहने लगा। बहुत अकेलापन सताता था और ऊपर से बढ़ती उम्र में शरीर भी साथ छोड़ रहा था। मुझे आराम की जरुरत थी। कई बार मन किया कि बेटियों के यहां चली जाऊं, पर समाज क्या सोचेगा, ये बात बार-बार मन आ जाती थी। अगर सच कहूं तो मुझे भी कहीं न कहीं बेटियों के घर जाना सही नहीं लग रहा था, अब चाहे इसे समाज का डर कहो या कुछ और। लेकिन ये भी सच है कि अकेले मुझे जिंदगी बोझ लग रही थी और मुझे शांति भरी जिंदगी की तलाश थी।’
पति की मौत के 10 साल बाद, जब मेनुका शांति की तलाश में तीर्थ यात्रा पर थी, वह वृंदावन पहुंची। इस पवित्र शहर में राधा-रानी और कान्हा की भक्ति में मेनुका का मन रमने लगा। उसे लगा कि शायद यहां उसका अकेलापन दूर हो सकता है और उसे, वह शांतिभरी जिंदगी मिल सकती है, जिसकी उसे तलाश थी। क्योंकि वृंदावन में मेनुका जैसी कई अन्य महिलाएं भी थीं जो वैधव्य के सफेद रंग में लिपटी जिंदगी जी रही थीं, लेकिन उनकी जिंदगी में ठहराव था और संतुष्टि का भाव भी।
अब, मेनुका पिछले 10 सालों से वृंदावन में रह रही हैं। लेकिन वह अब अपने जीवन को मुकम्मल मानती हैं। मेनुका एक विधवा आश्रम में रहती हैं, जहां पर विधवाओं की सारी जिम्मेदारी सुलभ सोशल सर्विस आर्गेनाइजेशन द्वारा उठाई जाती है। साथ ही, उनके गुजारे के लिए हर महीने दो हजार रुपए भी दिए जाते हैं।
मेनुका खूबसूरत मुस्कान बिखेरते हुए कहती हैं, ‘पति के जाने के बाद, मैं अधूरी हो गई थी। लेकिन वृंदावन ने मुझे फिर से पूरा कर दिया। यह धरती सच में बहुत पावन है जो सबके दुःख हर लेती है। मुझे लाल बाबा (डॉ. विन्देश्वर पाठक) जहाज में घुमाते हैं, कई धार्मिक जगहों पर ले जाते हैं और वो सब देते हैं जिसकी हमें जरुरत होती है। मैं उनकी शरण में खुश हूं और जिंदगी का अब एकमात्र फलसफा कान्हा की भक्ति है।’
मेनुका के शब्दों में अगर कहें तो ढेर सारे दुखों के बाद भी, सार्थक परिपूर्णता वृंदावन में आकर मिल जाती है।



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