sulabh swatchh bharat

शुक्रवार, 25 मई 2018

बुंदेलखंड में आएगी हरियाली

केन और बेतवा नदी का पानी जल्द ही एक-दूसरे से मिलने वाला है। इस जल मिलन से न सिर्फ मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के सूखाग्रस्त इलाकों में हरियाली आएगी, बल्कि वहां की गरीब जनता के लिए रोज़गार के नए अवसर पैदा होंगे

ऋग्वेद में जल, सामान्य रूप से नदियों तथा कुछ विख्यात नदियों की श्रद्धा के साथ चर्चा की गई है और उन्हें दैवी शक्तिसे युक्त होने के कारण पूजा योग्य माना गया है। इसी तरह भगवद गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि धाराओं में मैं गंगा हूं। नदियों का यह आध्यात्मिक पक्ष है, लेकिन इनका भौतिक पक्ष भी है और यह प्राचीन काल से ही रहा है। अगर नदियां आध्यात्मिक कारणों से पूजनीय हैं, तो भौतिक कारणों से भी जीवन का कारण रही हैं। इसीलिए समाज के साथ राज्य का भी दायित्व है कि वह इसका समुचित उपयोग सुनिश्चित करे। करीब 70 लाख की आबादी की जीवन दशा को प्रभावित करने वाली केन-बेतवा नदी जोड़ परियोजना को इसी रूप में देखा जा सकता है, जिसे जल्द शुरू किए जाने की संभावना प्रकट की जा रही है।

केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी केन-बेतवा नदी जोड़ परियोजना से ऐसी उम्मीद प्रकट की जा रही है कि यह मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में फैले सूखाग्रस्त और पिछड़े बुंदेलखंड के विकास में सहायक होगी। इस परियोजना को सरकार की सभी एजेंसियों ने अपनी मंजूरी दे दी है। सरकार का आकलन है कि इससे प्रति वर्ष दोनों राज्यों में कुल 6.36 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल में सिंचाई हो सकेगी- मध्य प्रदेश में 3.70 लाख हेक्टेयर और उत्तर प्रदेश में 2.66 लाख हेक्टेयर। इससे बुंदेलखंड में पेयजल भी उपलब्ध हो सकेगा। अनुमान के मुताबिक 55 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी पीने के लिए मिल सकेगा, जिससे बुंदेलखंड की करीब साढ़े तेरह लाख आबादी लाभान्वित होगी। इन सबके अलावा इससे 78 मेगावाट बिजली भी पैदा हो सकेगी। बाढ़ नियंत्रण, जल परिवहन, मछली पालन आदि इसके अन्य फायदे बताए जा रहे हैं। इस परियोजना से मध्य प्रदेश के छतरपुर, पन्ना, टीकमगढ, रायसेन और विदिशा जिले तथा उत्तर प्रदेश के महोबा, बांदा और झांसी जिले लाभान्वित होंगे।

सरकारी स्तर पर परियोजना के बहुत सारे लाभ गिनाए जा रहे हैं, लेकिन इसकी राह में कई अड़चनें भी थीं। सबसे पहले इसे वन, पर्यावरण एवं जनजाति मंत्रालय से मंजूरी चाहिए थी। रिर्पोट के मुताबिक पर्यावरण मूल्यांकन समिति ने इसे अपनी हरी झंडी दिखा दी है। इसी तरह जनजाति मंत्रालय ने भी परियोजना के प्रति अपनी सहमति प्रकट कर दी है, लेकिन पर्यावरण, वन एवं जलवायु मंत्रालय की वन सलाहकार समिति ने भी अपनी सहमति प्रदान कर दी है। खास बात यह है कि राष्ट्रीय वन्य जीव बोर्ड से इस परियोजना को मंजूरी मिल गई है। इससे केंद्र सरकार काफी राहत महसूस कर रही है, क्योंकि पर्यावरणविदों और वन्य जीव प्रेमियों के विरोध के मद्देनजर इसकी अनुमति मिलने की संभावना कम थी। दरअसल, केन-बेतवा नदी को जोडऩे पर पन्ना टाइगर रिजर्व क्षेत्र का करीब 4141 हेक्टेयर क्षेत्र पानी में डूब जाएगा। बाघों की संख्या गिरने पर पन्ना को बाघ संरक्षण के लिए एक आदर्श क्षेत्र के रूप में विकसित किया गया था। अभी वहां पर बाघों की संख्या 16 से ज्यादा बताई जा रही है, जबकि 2009 में वहां एक भी बाघ नहीं थे। ऐसी स्थिति में सरकार और बोर्ड बाघों के आवास को उजाडऩे की इजाजत नहीं दे सकते थे, लेकिन दूसरी तरफ  इंसानी जिंदगी का भी सवाल था। ऐसी हालत में बीच का रास्ता निकाला गया। मध्य प्रदेश सरकार ने वादा किया कि वह इसकी भरपाई के लिए 8000 हेक्टेयर वन भूमि देगी। लेकिन बोर्ड ने किसी प्रकार के भ्रम की स्थिति नहीं रहने दी। उसने साफ  तौर पर कह दिया कि पन्ना टाइगर रिजर्व को पास के वन्य जीव अभयारण्य रानी दुर्गावती (मध्य प्रदेश) और रनिपुर अभयारण्य (उत्तर प्रदेश) के साथ जोड़ दिया जाए, ताकि बाघों के प्राकृतिक आवास की भरपाई हो सके। साथ ही उसने इलाके में खनन के लिए नए पट्टे देने पर भी रोक लगाने की शर्त लगा दी है। बोर्ड ने राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण सेे इसकी निगरानी की अपेक्षा भी की है।

इस परियोजना के तहत मध्य प्रदेश में डौढन गांव के पास एक बांध बनाकर केन नदी के करीब 660 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी को 221 किमी लंबे नहर के जरिए बेतवा नदी में लाया जाएगा। अनुमान है कि इस परियोजना पर नौ से दस हजार करोड़ रुपए खर्च होंगे। लेकिन इसके लिए केंद्र और राज्य कितना धन खर्च करेंगे, यह मसला अभी नहीं सुलझ सका है। नीति आयोग ने यह सिफारिश की है कि राज्य इस परियोजना के लिए 40 प्रतिशत खर्च करें और केंद्र सरकार 60 प्रतिशत। केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय ने इसका विरोध किया है और उसने यह आग्रह किया है कि परियोजना की 90 या 100 प्रतिशत राशि उसके जरिए खर्च हो। जाहिर है जब तक यह मसला नहीं सुलझेगा,

तब तक इसके क्रियान्वयन में विलंब होगा।

आखिर सरकार को भूमि अधिग्रहण पर मुआवजा देने, विस्थापित परिवारों के पुनर्वास करने जैसे

कार्य भी करने होंगे। फंडिंग पैटर्न के समाधान के

बाद यह उम्मीद जताई जा रही है कि इसे कार्य रूप

देने में ज्यादा देर नहीं लगेगी, बशर्ते कोई अन्य अड़चन न खड़ी हो जाए। यह एक से अधिक राज्यों में बहने वाली नदियों को जोडऩे का पहला उदाहरण होगा।



Bringing smiles to every face hindi ad copy %281%29

ऑडियो