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सोमवार, 20 अगस्त 2018

समय ने सिखाया सबक

नशे की नींद टूटी तो जेल की सलाखें इंतज़ार कर रही थीं। नशा, नींद और जेल के बीच पत्नी, मां और पिता का साथ छूट गया। बचा तो सिर्फ पश्चाताप। बुरी संगत और आदतें किस हद तक बर्बादी के रास्ते पर ले जाती हंै, पढि़ए संजय दत्त की जुबानी

सबसे पहले तो यह साफ  कर दूं कि मैंने खुद से जुड़े सारे विवाद के पन्नों को ठंडे बस्ते में डाल दिया है, लेकिन अपने अतीत की कई बातों को चाहकर भी भूला नहीं पाता हूं। क्योंकि, मैं आज भी उन कटु बातों से सबक लेता रहता हूं। मैंने 1971 में पापा की फिल्म 'रेशमा और शेरा’ में बतौर बाल कलाकार काम करने के बाद 1981 में हीरो के तौर पर अपनी शुरूआत की। मेरी पहली फिल्म 'रॉकी’ थी। आज जब पीछे मुड़ कर देखता हूं, तो बहुत सारी फिल्मी यादें उभर आती हैं। 35 साल के इस फिल्मी सफर में 120 से ज्यादा फिल्में मैंने की है। इनमें से कई ऐसी फिल्में है,जिनकी आज मैं चर्चा भी नहीं करना चाहता हूं। मगर 'विधाता’, 'नाम’, 'ईमानदार’, 'हथियार’, 'क्रोध’,'थानेदार’, 'सड़क’, 'साजन’, 'यलगार’ , 'गुमराह’, 'दुश्मन, 'हसीना मान जाएगी’,'वास्तव’,'मिशन कश्मीर’, 'कुरुक्षेत्र’, 'एलओसी’, 'मुन्नाबाई एमबीबीएस’, 'मुसाफिर,'परिणीता’,'लगे रहो मुन्नाभाई’,'शूटआट एट लोखंडवाला’,'अग्निपथ’,'पीके’ आदि ऐसी कई फिल्में हैं, जिनकी यादें मेरे जेहन में हमेशा रहेंगी।

पापा मेरे सबसे बड़े संबल

मुझे परिवार के लोगों का ही नहीं सिने रसिकों और दोस्तों का भी बहुत प्यार मिला है। मेरा काफी वक्त बोर्डिंग स्कूल में बीता है। उन दिनों कई ऐसे बच्चे मेरे दोस्त बने, जिनकी संगत में मुझे हरगिज नहीं आना चाहिए था। इस वजह से तब मुझे बड़े बाप का बिगडै़ल बेटा कहा जाता था। आज वे सारी बातें मुझे बहुत कचोटती हैं। असल में मैं अपनी मम्मी का बहुत दुलारा था। उन दिनों मैंने उनके प्यार का बहुत गलत फायदा भी उठाया। ऐसे में अपने दोस्तों के साथ मैं कब नशे का आदी हो गया,मुझे पता ही नहीं चला। उन दिनों की एक घटना का जिक्र करना चाहता हूं, एक दिन हीरोइन का डोज लेकर मैं सोने चला गया। कुछ देर बाद भूख की वजह से मेरी नींद टूटी। अपने घर के सहायक को बुलाकर को मैंने खाना मांगा। मेरी बात सुनकर वह रो पड़ा। उसने बताया -संजू बाबा आप पूरे दो दिन बाद नींद से उठे है। फिर भी पूरे नौ साल मैं इसमें फंसा रहा। यह मुक्ति भी मुझे तब मिली,जब मेरे पिता एकदम मेरे पास खड़े हो गए। यह उनके धैर्य का ही परिणाम था कि मैं पूरी तरह से नशे के नियंत्रण से बाहर निकल आया।

एक बात का दुख है

मुझे हमेशा इस बात का दुख रहेगा कि पापा मेरी इस मुक्ति को देख नहीं पाए। मेरे पापा गांधीवादी थे। न सिर्फ  वह खुद बेहद अनुशासित थे, बल्कि अपने बच्चों को भी स्टार के बच्चों की तरह बड़ा नहीं किया था। हमें बस-ऑटो से स्कूल जाना पड़ता था। एक दिन पापा ने मुझसे पूछा था-क्या तुम मेरा सम्मान करते हो या मुझसे डरते हो। मैंने कहा-'मैं आपका सम्मान करता हंू। उन्होंने झट कहा-तुम झूठ बोल रहे हो, तुम मुझसे डरते हो। इसकी वजह यह है कि तुम जानते हो कि तुम मुझसे कुछ छिपा रहे हो।’ इसके बाद ही मैंने पापा से जाकर कहा कि ड्रग का नशा मुझे खत्म कर रहा है। मैं खुद अपने आपको पहचान नहीं पा रहा हंू।

कैसे-कैसे ड्रग

मुझसे अक्सर पूछा जाता है कि आप किस तरह के ड्रग के आदती हो गए थे। सच कहूं, तो ऐसा कोई ड्रग नहीं था,जो उन दिनों मैंने नहीं लिया हो। पापा को जब पता चला,तो वह मुझे मयामी के रिहाब सेंटर में ले गए। वहां डॉक्टर ने एक फार्म में मुझे ऐसे सारे ड्रग के नाम पर टिक लगाने के लिए कहा जो मैं लेता था। तब मैं सारे पर टिक लगाने के लिए मजबूर था। डॉक्टर चौंक पड़े थे। उन्होंने पापा से कहा-यह लड़का अभी तक जिंदा कैसे है। अब अमेरिका के डाक्टर तो नहीं जानते थे कि घी-लस्सी जैसे पौष्टिक आहार खाकर हम बड़े हुए हैं।

भारत नहीं लौटना चाहता था

अमेरिका के एक रिहाब सेंटर में नशे की लत से मुक्ति पाने के बाद भी भारत नहीं लौटना चाहता था। जबकि मेरे पापा हर कदम पर मेरे साथ थे। असल में ड्रग पेडलर की दहशत का साया मुझ पर इस कदर बरकरार था  कि मैं देश में आकर उनसे छुप कर रहना चाहता था, लेकिन मैंने आत्मविश्वास को टूटने नहीं दिया। 1985 में मैंने 'जान की बाजी’ से कम बैक किया। इसके बाद 'ताकतवर’ , 'थानेदार’, 'सड़क’, 'साजन’, 'खलनायक’ जैसी कई हिट फिल्मों के साथ मेरा नाम जुड़ा। मेरा एक सुखी संसार था। बीवी रिचा शर्मा से मेरी पहली मुलाकात अमेरिका के रिहाब सेंटर में हुई। फिर परिचय बढ़ा। शादी हुई। मैं बेटी त्रिशाला का पिता बना। मैं एक बहुत अच्छा जीवन जी रहा था,लेकिन अचानक रिचा के ब्रेन ट्यूमर ने सब कुछ खत्म कर दिया।

मेरा शुद्धिकरण

इसके बाद लंबा भटकाव और कुछ विवाद....जो कई वर्षो तक मेरा पीछा करते रहे। अभी एक साल पहले मैं उनसे पूरी तरह से मुक्त हुआ हूं। पांच साल पहले मेरी जिंदगी में मान्यता आई। उसके आने के बाद से जिंदगी में एक ठहराव आया है। जेल की जिंदगी ने भी मुझे काफी बदला है। जेल के कर्मी के तौर पर हर रोज मुझे पचास रुपए मिलता था। वहां मैं कागज के लिफाफे बनाने से लेकर

लिखा-पढ़ी तक का काम करता था। जेल के रेडियो स्टेशन वाईसीपी का एकमात्र संचालक मैं ही

था। जेल में मिले 3800 रुपए का उपयोग मैंने

अपने दैनिक इस्तेमाल की चीजों में किया।

सच कहूं तो जेल से आने के बाद मेरा सारा इगो टूट चुका है। खूनी-अपराधियों के साथ मेरा उठना-बैठना, खाना-पीना सब कुछ चलता था। इस वजह से अभिजात्य वर्ग का अहंकार अब और मेरे भीतर नहीं है। ईश्वर के प्रति मेरा विश्वास और दृढ़

हुआ है। शायद ईश्वर ने मुझे सही रास्ता दिखलाने के लिए जेल भेजा था।

युवाओं से कुछ कहना है

मैं अपने युवा दोस्तों को सिर्फ  एक ही बात कहना चाहता हूं कि दोस्तों के आग्रह या दबाव में आकर कुछ भी मत करो। मैं ऐसा कभी नहीं कहूंगा कि मैंने दोस्तों के दबाव पर ड्रग लेना शुरू किया था। इतना बड़ा झूठा मैं नहीं हूं। पर कई बार दोस्तों के ग्रुप के साथ ताल मिलाने के चक्कर में बहुत सारे बच्चे खराब रास्ते पर निकल जाते हैं।

या कई बार कोई प्रिय दोस्त जिस सब्जेक्ट को लेकर पढता है, बहुत सारे बच्चे वही सब्जेक्ट

पढऩा शुरू कर देते हैं। अपनी निजता और पसंद

को बनाए रखना बहुत जरूरी है। मुझे खुशी है कि इतने साल तक सेल्यूलाइड से दूर रहने के बावजूद आज भी मेरे फैंस के बीच मेरा क्रेज बदस्तूर कायम है। मैं जानता हूं कि कुछ लोग आज भी मुझे

सही तरह से माफ  नहीं कर पाए हैं। फिर भी

यह क्रेज क्यों...मेरे करीबी दोस्त कहते हैं कि

असल में मैं परदे के बाहर भी 'लार्जर दैन लाइफ ‘ जैसी शख्सियत हूं। पर मैं अपने आपको बहुत अदना सा व्यक्ति मानता हूं। अपने इमेज की परवाह न करते हुए मैं एक हाड़-मांस का आदमी हूं। जो आवेग में आकर रो पता है,गलती होने पर माफी मांग लेता है। बार-बार प्यार में पड़ता है। कुछ ऐसा ही जीवन तो एक आम आदमी का होता है। मैं भी बस वैसा ही हूं।



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