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बुधवार, 23 मई 2018

युवा और गांधी

सोशल मीडिया के दौर में गांधी को लेकर समझ कम बनी है, भ्रांतियां ज्यादा फैली हैं। यही कारण है कि युवाओं के बीच गांधी को लेकर दिलचस्पी उस तरह नहीं दिखती जैसी कुछ दशक पहले दिखती थी

एक अमेरिकन कंसल्टेंसी कंपनी में काम करने वाला मेरा एक दोस्त भारत आया। वह तीन साल के अंतराल के बाद यहां आया। मैंने उसे एयरपोर्ट से लिया। घर जाने के रास्ते में मैंने सोचा कि उसे आसपास का एरिया दिखाता चलूं। असुरक्षा की भावना से घिरे होने के बाद भी मैंने दिल्ली की तारीफ की और उससे कहा कि पिछले तीन वर्षों के दौरान दिल्ली कितनी बदल गई है और इंडिया भी। जब हम राजघाट की ओर जा रहे थे तो मैंने उससे कहा कि शायद हम भारतीय लोग उस सपने की तरफ धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे हैं, जो सपने बापू ने कई साल पहले भारत को लेकर देखे थे। उसने मेरी तरफ नफरत के भाव से देखा और बड़े ही तीखेपन से सवालिया लहजे में कहा, 'क्या यह विकास पहले ही नहीं हो जाना चाहिए था?’ यह भी कि हम एक व्यक्ति को क्यों इस तरह भगवान बनाने पर तुले हैं रहे हैं, जिसने हमारी राष्ट्र की संरचना का स्थायी नुकसान किया है।

 मैं चकित रह गया, लेकिन मैंने चुप रहना ही बेहतर समझा। मैं दस साल से अधिक समय से उसे जानता था, जो हमेशा हमारे दोस्तों के बीच संतुलित और बौद्धिक तर्क के लिए जाना जाता था। उसने भारत के अलावा विदेश में इंजीनियरिंग और एमबीए की पढ़ाई की थी, लेकिन अब तक राष्ट्रपिता के प्रति अपमान की भावना रखता है। मेरे दिमाग में अनायास कौंधा कि देश के अन्य लाखों युवाओं को न तो गांधी को जानने का मौका मिला और न ही उनके विचारों को। आज वे गांधीजी के बारे में कैसा अनुभव करते हैं ? युवा भारत के लिए उनकी विरासत लंबे समय तक चलने वाली है या फिर उनके विचार शुरू से ही अव्यावहारिक रहे ?

 ऐसे ही कुछ सवाल थे, जो मेरी जेहन में उठ रहे थे। यहां इस बात को जानने की आवश्यकता थी कि आधुनिक भारत के परिपेक्ष्य में गांधी कितने प्रासंगिक हैं।

गांधी का वर्गीकरण

 मैंने गांधी को जानने के लिए सोशल मीडिया का सहारा लिया, जिसमें बड़ी संख्या में युवा अपना महत्वपूर्ण समय देते हैं। यह अपने-आप में आश्चर्य चकित करने वाला था कि सोशल मीडिया पूरी तरह से गांधी विरोधी बातों से भरी पड़ा है। इनमें फेसबुक, ट्विटर, वाट्स ऐप आदि लगभग सभी सोशल मीडिया साइट्स शामिल हैं। ये साइट्स जैसे गांधी को कोसने के अखाड़े बन चुके हैं। आए दिन, एक नया लेख या ऐतिहासिक तथ्य सामने आ जाता है, जो महज गांधी विरोधी विचारधारा को सामने लाता है। मजे की बात यह है कि ये तथ्य बार-बार एक-दूसरे को शेयर भी किए जाते हैं और री-ट्वीट भी किए जाते रहते हैं।

इससे सहज ही पता लगता है कि आए-दिन गांधी पर वैचारिक तौर पर हमला करने वालों की तादाद लगातार बढ़ रही है।

 हमारे पाठ्यक्रमों में गांधी के विचारों को विस्तार से दिया गया है, लेकिन क्या ये पाठ्यक्रम गांधी के विचारों से रूबरू कराने के लिए पूरी तरह से पर्याप्त और विश्वसनीय हैं। यह बात दीगार है कि गांधी सत्य, अहिंसा, समानता, सहिष्णुता, सत्याग्रह, ब्रह्मïचार्य व आत्मनिर्भरता आदि की बात करते हैं। चाहे समाजशास्त्र हो, दर्शनशास्त्र हो, राजव्यवस्था हो या फिर कोई अन्य समाजिक विज्ञान, जिनमें उक्त विचारों को जगह-जगह वगीकृत किया गया है। लेकिन जैसे कोई चीज काफी गूढ़ है या फिर हल्की-फुल्की, इसमें अंतर तलाशना मुश्किल हो जाता है। वैसे इस सच्चाई से इनकार नहीं किया जा सकता है कि गांधी को वर्गीकृत करना बिल्कुल ही कठिन है। उनके जीवन को लेकर असल में यह महसूस करना जरूरी है कि कैसे साधारण जीवन जीया जाता है और अपनी आदतों को परिष्कृत किया जा सकता है। यहां न कोई अतिशियोक्ति है और न ही कोई काल्पनिक शब्दावली, लेकिन हमारा युवा वर्ग अभी तक इसे जानने की बहुत अधिक जहमत नहीं उठाता है।

 मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय से दशर्नशास्त्र में पीएचडी कर रहे छात्र तरंग कपूर से संपर्क किया, जो पश्चिमी विचारों में गांधी के प्रभाव पर शोध कर रहे हैं। उन्होंने उदाहरणस्वरूप कुछ चीजों को स्पष्टता के साथ बताया।

मैंने एक बार पेप्सी की बोतल में बिस्कुट फिट करने की कोशिश की थी, क्योंकि बोतल का मुंह काफी संकुचित होता है। या कहें कि वह ऊपर से संकुचित और अंदर से खुला होता। मैंने बिस्कुट अंदर डालने में तेजी दिखाने की कोशिश की, परिणामस्वरूप बिस्कुट टूट गया और उसके टुकड़े चारो तरफ बिखर गए। कुल मिलाकर, गांधी के विचार व्यापक और उच्च नैतिकता से परिपूर्ण हैं। किसी को भी उन्हें जानने के लिए खुला दिमाग और लचीली सोच से काम लेना होगा, अन्यथा समझदारी में गलती की पूरी संभावना है।

क्या इसका मतलब गांधी के आदर्श बहुत न्यायसंगत हैं, जो आज की युवा पीढ़ी को बिल्कुल ही नहीं भाते और अव्यावहारिक लगते हैं? एक स्कूल की इतिहास अध्यापिका मीनू तलवार का उत्तर निश्चित तौर पर हां में था। उन्होंने कहा, 'मेरे अधिकतर छात्र गांधीजी के ब्रह्मïचर्य के संदेश की अपेक्षा हनी सिंह के 'चार बोतल बोदका’ की चालू दलील से ज्यादा सहमत होंगे। यह उन्हें भले ही क्षणिक तौर पर खुश करता है। गांधी के आदर्श नैतिकता व आत्मसंयम के लिहाज से बेहद जटिल हैं। जो आज की वास्तविकता में शून्य लगते हैं। इसीलिए छात्र ऐसे आदर्शांे से पीछा छुड़ाना ही बेहतर मानते हैं।’

 क्या आप गंगा को प्रदूषित करने के लिए गंगोत्री को जिम्मेदार ठहराते हैं ? इस सवाल के जवाब में नेशनल फिजिक्स लेबोरेटरी के रिसर्च एसोसिएट सुभाष चंदगा एकमत नहीं होते हैं। वे कहते हैं कि अपने-आप से सवाल पूछने की अपेक्षा गांधी के विचारों को दोषी मानना हमेशा आसान लगता है। आत्मविश्लेषण के प्रति कोई भी दिलचस्पी नहीं लेना चाहता है। खासकर, आज की युवा पीढ़ी। यहां बहुत ही धैर्य की जरूरत है, जो आज बेहद ही असंभव लगता है।

 तर्कों का विश्लेषण

 सुभाष के तर्क वैध लगते हैं। यदि हम दैनिक जीवन को आगे रखकर देखते हैं तो हम पाते हैं कि समाज कितना तेजी से बदल गया है। खासकर, पिछले दशक के दौरान। चाहे तर्कसंगत वाले वाद-विवाद हों या फिर आतार्किक, इसके लिए सोशल मीडिया ने कई तरह के मार्ग प्रशस्त कर दिए हैं। वैसे भी आज की तारीख में तो यह हर चीज के लिए एक ट्रेंड बन ही गया है। यहां यह कहा जा सकता कि गूढ़ जानकारी हासिल करने के लिए महज हेडलाइंस ही न पढ़ी जाए, बल्कि लेख के अंदर भी तथ्यों को गहनता के साथ देख लिया जाए। जो एक सशक्त राय के लिए बेहद जरूरी है। कुछ लम्हों के आनंद के दौर में किसी के पास गांधी को जानने का वक्त ही नहीं है। यदि, कोई सरसरी निगाह से फेसबुक पेज देखता है, जिसमें-'आई हेट गांधी’ और 'रेस्पेक्ट नाथूराम गोडसे’ आदि टिप्पणियां या बतकही शामिल है। उसके बाद यह महसूस करना बहुत ज्यादा कठिन नहीं है कि किस प्रकार विचार आसानी से बन रहे हैं और प्रयोग में आ रहे हैं। ऐसा लगता है कि इसके लिए फोटोशॉप और वाकपटुता भर की जरूरत होती है। इस तरह के सभी फेसबुक पेज में दो चीजें सामान्य ही दिखती हैं। इनमें अहम है गांधी के प्रति घृणा व नफरत का भाव, जिसके बहाने संबंधित तर्क और वास्तविकता से नाता आसानी से तोड़ा जा सकता है। सभी पेजों में ऐसी ही गूंज दिखती है। इन दिनों सोशल मीडिया पर इसी तरह के पूर्वाग्रह छाए रहते हैं।

 दिल्ली सरकार में काम करने वाले अनुराग कुंदू कहते हैं, 'मैं मानता हूं कि तथ्यों को पुष्ट किया जाना चाहिए। तथ्य तो किसी से छिपे नहीं हैं। कोई महात्मा गांधी की भगत सिंह की मौत की सजा में संदिग्ध भूमिका के बारे में सवाल कर रहा था तो मैंने तब गांधी द्वारा तब के वाइसरॉय लॉर्ड इरविन का भेजे खत की प्रतिलिपि दिखाई। वह शख्स मानता था कि यदि गांधीजी कोशिश करते तो भगत सिंह को फांसी नहीं होती। उसने जवाब दिया कि मैं गांधी के शब्दों में समझदारी दिखाने की जरूरत महसूस नहीं करता हूं।’ इसके आगे कुंदू कहते हैं कि उन्होंने उस मौके पर आगे शांत रहना ही बेहतर समझा।  साफ है कि इस दुनिया में दो प्रकार के लोग दिखते हैं, एक जो गांधी को मानते हैं और दूसरा जो उन्हें कुछ भी नहीं मानते हैं।

भावनात्मक प्रचार

 लेकिन हम गांधी के बारे में की जाने वाली आलोचना को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं। इस बारे तथ्यों और तर्कों को ठीक से देखना-परखना चाहिए। गांधी पर आरोप है कि वे साम्राज्यवादी कठपुतली थे। इसी परिप्रक्ष्य में लोग उन्हें खारिज भी करते नजर आते हैं। कुछ तथ्य यह बताते हैं कि उनका असहयोग आंदोलन भी दिखावटी था। यह भी माना गया है कि उनकी कोशिश के चलते ही क्रांतिकारियों के प्रयासों को बल नहीं मिल पाया। यह भी कि वे नेहरू में ही असीम विश्वास रखते थे, जबकि क्रांतिकारियों की आलोचना करते थे। एक मान्यता यह भी है कि वे हिंदुत्व एजेंडे को अव्यावहारिक मानते थे।

 वनस्थली विश्वविद्यालय की हिंदी की प्राध्यापक स्वाति सोनल कहती हैं कि इनमें बहुत से तथ्य सत्य हैं कि गांधी ने अपने आदर्शों को व्यक्तियों और घटनाओं से ऊपर रखा। इसीलिए चौरी-चौरा की घटना और पुलिस ऑफिसर सैंडर्स की हत्या पर उन्हें कोई आश्चर्य नहीं होता है। अन्य लोकप्रिय नेता सुभाषचंद्र बोस की अपेक्षा नेहरू पर उनकी निर्भरता सच थी। यद्यपि इसका कोई व्यावहारिक कारण जरूर रहा होगा।

 अपने जीवनकाल के बाद के वर्षों में गांधी यह अंदाजा लगा चुके थे कि कैसे भारतीय समाज आसानी से धर्म के आधार पर बंट सकता है। हालांकि, धर्मनिरपेक्षता उनकी प्राथमिकता में शामिल था। नेहरू में उन्होंने एसे राजनेता को देखा, जो देश की अनेकता को सुरक्षित रख सके।

उनके धर्मनिरपेक्ष मोड़ ने हिंदुत्व को नुकसान पहुंचाया, बहुत लोग इस बात का दावा करते हैं। वैसे यह स्थापना विवादास्पद ही माना गया। यह गांधी की समीक्षा में बड़ी चूक है। ज्यादातर एसे मुद्दे भावनात्मक हैं। जहां सही और गलत के बीच छोटी-सी रेखा है। ट्रायल के दौरान नाथूराम गोडसे का कोर्ट में दिया गया बयान इइस बात को बेहतर तरीके से साफ करता है। हां, नेहरू पर गांधी की निर्भरता जरूर उन्हें आज तक आलोचना के दायरे में लाती रही है।

 उधर, देश की असफलता के लिए अपेक्षाकृत कांग्रेस जिम्मेदार है। खासकर, पिछले 50 वर्षों में जिस तरह का शासन किया गया। आसानी से इसका दोषारोपण नेहरू पर शिफ्ट हो सकता है। यह अनुमान लगाना भी आसान हो सकता है कि देश के आज के दुर्भाग्य के लिए गांधीजी जिम्मेदार थे और उनका अहिंसा का मार्ग भी कई स्तरों में सुलह वाला रहा था।

पूर्ण-अपूर्ण गांधी

 कई चीजें हमें नेताओं, बड़े व्यक्तित्वों आदि में आदर्श तलाशनें में आसानी पैदा करती हैं। अकसर ऐसे में आधी-अधूरी जानकारी हमें बड़े लोगों के आदर्शों को निरस्त करने के लिए प्रेरित करती हैं। यहां हम एक व्यक्ति के बारे में बात कर रहे हैं, जिसने अलग पीढ़ी के माध्यम से सख्त संभावनाओं को भोगा है। इन सबके बाद वो यानी गांधी बहुत ज्यादा मानवतावादी थे। सत्य का प्रयोग उनकी जीवनयात्रा है और इस दौरान अपने कई दुर्गुणों को वे सुधार पाए। अपने युवाकाल में जब गांधी दक्षिण अफ्रीका गए तो शुरू में वे साम्राज्यवाद के पक्ष में थे पर अफ्रीका के काले लोगों के आरक्षण के भी पक्ष में खड़े हुए। यहां यह याद करना महत्वपूर्ण है कि वह कैसे इसे अपनी कमी मानते थे। बकायदा उन्होंने इस सोच में काफी परिवर्तन किया। नेल्सन मंडेला ने अपने लेख-गांधी- 'द प्रिजनर’ में लिखा है कि गांधी अंदरुनी तौर पर काफी परेशान हुए यह देखकर कि  जेल में या अन्य जगहों पर भारतीयों को अलग निगाह से देखा जाता था। गांधी व उनके विचारों को बेहद प्रासंगिक मानते हैं।



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