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सोमवार, 22 अप्रैल 2019

स्वाधीन भारत की पहली सरकार

आजादी के साथ भारत ने देश विभाजन का दंश जरूर झेला, पर राष्ट्रीयता की भावना को कमजोर नहीं पड़ने दिया। इसके पीछे सबसे बड़ी प्रेरणा राष्ट्रपिता महात्मा गांधी रहे। यही कारण है देश में जो पहली सरकार बनी, वह एक राष्ट्रीय चरित्र वाली सरकार थी, क्योंकि इसमें कई दलों और विचारों के लोग शामिल थे

भारत का स्वाधीनता आंदोलन जब 15 अगस्त, 1947 को अपने आखिरी मुकाम तक पहुंचा तो इसके साथ ही देश एक नए युग में प्रवेश कर गया। इतिहास के पन्नों में ये घटनाक्रम सुनहरे पन्नों पर अंकित है। 15 अगस्त को 32 करोड़ लोगों ने आजादी की सुबह देखी थी। आज हमारा देश जनसंख्या ही नहीं, बल्कि विकास के मामले में भी काफी आगे निकल गया है। पर हमारे लिए यह जरूरी है कि हम देश की स्वाधीनता से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों को जानें-समझें। 

एकसूत्र में बंधा देश
गौरतलब है कि दुनिया के कई देशों ने अपनी स्वाधीनता के लिए बड़ा संघर्ष किया है। पर भारतीय स्वाधीनता संघर्ष इस लिहाज से विलक्षण रहा कि इसमें जहां हिंसा की जगह अहिंसा को ज्यादा महत्व मिला, वहीं यह पूरे देश को एकसूत्र में बांधने का एक ऐतिहासिक अवसर भी बना। 
महात्मा गांधी के नेतृत्व में चले इस स्वाधीनता संग्राम को मिली सफलता की चमक देश के बंटवारे के कारण थोड़ी फीकी जरूर पड़ी, पर आजाद भारत में जिस तरह लोकतांत्रिक व्यवस्था ने पहले दिन से अपनी जड़ें गहरी जमाने की कोशिशें की, वह अद्भुत है। इस कोशिश की सबसे बड़ी मिसाल स्वतंत्र भारत में पहली सरकार है। यह कोई दलगत नहीं बल्कि राष्ट्रीय सरकार थी, क्योंकि इसमें कई दलों और विचारों के लोग शामिल थे। 

दलगत राजनीति से परहेज
दिलचस्प है कि स्वतंत्र भारत की पहली सरकार के चरित्र को दलीय न रहने देने के बजाय राष्ट्रीय और सर्व-समन्वयी बनाए रखने के पीछे भी सबसे बड़ी प्रेरणा राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ही थे। पंडित जवाहरलाल नेहरू के प्रधानमं​ित्रत्व में बने मंत्रिमंडल में पंडित श्यामा प्रसाद मुखर्जी को शामिल करने को लेकर तो उन्होंने खासतौर पर जोर दिया था। गांधीजी ऐसा इसीलिए कर रहे थे, क्योंकि तब उनके सामने सबसे बड़ा लक्ष्य देश में सामाजिक सद्भाव को कायम रखना था। वे नहीं चाहते थे कि देश में पहली सरकार ऐसी बने, जिसके मंत्रिमंडल को लेकर लोगों के बीच यह संदेश जाए कि इनमें कुछ खास वर्गों और विचारों का तो प्रतिनिधित्व है पर सबका नहीं है।

बापू की प्राथमिकता 
देश में शांति और सद्भाव तब गांधीजी के लिए इतना महत्वूर्ण था कि वे आजादी के दिन दिल्ली से हजारों किलोमीटर दूर बंगाल के नोआखली में थे, जहां उन्होंने हिंदुओं और मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक हिंसा को रोकने के लिए अनशन भी किया। गौरतलब है कि जब तय हो गया कि भारत 15 अगस्त को आजाद होगा तो जवाहर लाल नेहरू और सरदार वल्लभ भाई पटेल ने महात्मा गांधी को खत भेजा। इस खत में लिखा था, ‘15 अगस्त हमारा पहला स्वाधीनता दिवस होगा। आप राष्ट्रपिता हैं। इसमें शामिल हों अपना आशीर्वाद दें।’ गांधी ने इस खत का जवाब भिजवाया, जिसमें उन्होंने लिखा, ‘जब कलकत्ते में हिंदू-मुस्लिम एक-दूसरे की जान ले रहे हैं। ऐसे में मैं जश्न मनाने के लिए कैसे आ सकता हूं। मैं दंगा रोकने के लिए अपनी जान दे दूंगा।’
गांधी और देश की आजादी से जुड़ा एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि जवाहर लाल नेहरू ने ऐतिहासिक भाषण 'ट्रायस्ट विद डेस्टनी' 14 अगस्त की मध्यरात्रि को वायसराय लॉज (मौजूदा राष्ट्रपति भवन) से दिया था। दिलचस्प है कि तब नेहरू प्रधानमंत्री नहीं बने थे। रही बात बापू की तो भले इस भाषण को पूरी दुनिया ने सुना, लेकिन गांधी जी उस दिन नौ बजे सोने चले गए थे।

नियति से वादा
कई वर्ष पहले हमने नियति से एक वादा किया था और अब समय आ गया है कि हम अपना वादा निभाएं, पूरी तरह न सही पर बहुत हद तक तो निभाएं। आधी रात के समय, जब दुनिया सो रही होगी, भारत जीवन और स्वतंत्रता के लिए जाग जाएगा। ऐसा क्षण आता है, मगर इतिहास में विरले ही आता है, जब हम पुराने से बाहर निकल नए युग में कदम रखते हैं, जब एक युग समाप्त हो जाता है, जब एक देश की लंबे समय से दबी हुई आत्मा मुक्त होती है। यह संयोग ही है कि इस पवित्र अवसर पर हम भारत और उसके लोगों की सेवा करने के लिए तथा सबसे बढ़कर मानवता की सेवा करने के लिए समर्पित होने की प्रतिज्ञा कर रहे हैं...
ये वे शब्द हैं, जो आजाद भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने 15 अगस्त 1947 को देश की आजादी की घोषणा करते हुए कहे थे। आजादी की घोषणा होते ही देशवासियों की आंखों में सिर्फ सुनहरे सपने थे। जो कि वर्षों से अंग्रेजों की गुलामी की दास्ता से मुक्त हो चुके थे। यही वो पल था जब पंडित जवाहर लाल नेहरू ने प्रथम प्रधानमंत्री के रूप में पद ग्रहण किया और वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन ने पहले गवर्नर जनरल के रूप में अपना पदभार संभाला। भारत को अपना पहला वजीर-ए-आजम मिल चुका था, अब बस जरूरत थी सियासत को चलाने के लिए दूसरे सहयोगी मंत्रियों की। देश के पहले यूनियन कैबिनेट के गठन की रूपरेखा तैयार हो चुकी थी बस उसे मूर्त्त रूप देना बाकी था। इसके लिए राष्ट्रपिता की सलाह को सबने महत्व दिया। इस कैबिनेट में शामिल राजनेताओं में सरदार पटेल से लेकर डॉ. आंबेडकर तक कई दिग्गजों के नाम शामिल थे। पंडित नेहरू ने भी हर तरह के मतांतर को एक किनारे रखते हुए महात्मा गांधी की सलाह पर देश की पहली कैबिनेट को एक ऐसे गुलदस्ते की शक्ल दी।



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