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मंगलवार, 25 जून 2019

गांधी के शौचालय से फ्लश टॉयलेट तक

सुलभ की स्थापना का पचासवां वर्ष शुरु हो चुका है। इन वर्षों में टॉयलेट के क्षेत्र में कितने बदलाव आए, उसका स्वरूप तब से अब तक कितना और कैसे बदला अपने निजी अनुभवों के आधार पर बता रहे हैं संजय त्रिपाठी

अगले वर्ष गांधी जी के जन्म के 150 साल हो जाएंगे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 2019 तक देश के सभी घरों में शौचालय बन जाने का लक्ष्य रखा है। आज देश के सभी स्कूलों में शौचालय बन गया है और घरों में बनाए जा रहे है। देश खुले में शौच से मुक्त होने जा रहा है, लेकिन एक समय वह भी था जब खुले में शौच को हम विवश थे। आइए 50 साल पहले की स्थिति से आपको रूबरू कराते हैं।
सुलभ का स्थापना वर्ष और मेरे जन्म का वर्ष एक ही है। अगले दो साल में हम दोनों 50 के हो जाएंगे। मेरी नजर में व्यक्ति के अंदर चेतना शायद तब से जागृत हो जाती है जब वह खुद से खाने और शौच के लिए जाने लगता है। मैंने रसोई घर में जाकर खुद से खाना कब शुरू किया यह तो याद नहीं, लेकिन सुलभ में अपनी सेवा देते- देते और सुलभ संस्थापक को सुनते-सुनते वे दिन जरूर याद आ गए जब मैं स्वयं शौचालय जाने लगा था।
वैसे मेरा जन्म तो आरा जिला के शाहपुर गांव में हुआ, लेकिन जन्म के कुछ महीने बाद ही मैं डुमरांव आ गया और यहीं मेरी चेतना जागृत हुई। बिहार के बक्सर जिले का डुमरांव। बिस्मिला खां को डुमरांव महाराज के दरबार में शहनाई बजाने वाले दिन भी इसी बहाने याद आ गए। 
डुमरांव टीचर ट्रेनिंग स्कूल में मेरे पिता स्व. विन्ध्यवासिनी दत्त त्रिपाठी शिक्षक थे। हम वहां शिक्षकों के बने क्वाटर में रहते थे। आंगन के एक कोने में शौचालय। मुझे याद है आंगन को पार कर चार सीढ़ी चढ़ कर हम उसमें जाते थे। पक्की ईटों से बना कच्चा शौचालय। बदबू से भरे उस शौचालय में लोहे की एक बाल्टी और एक लोटा। बैठने के लिए दो पायदान और गड्ढा जिसमें हमारा मल गिरता था।
मुझे यह याद नहीं कि उनका नाम क्या था, हां एक महिला थी जो हमारे शौचालय का मैला साफ करने आती थी। वह भी सप्ताह में तीन दिन। डालडा के टीन में मल लेकर उन्हें नहर के पास फेंकने जाते हुए भी देखा था। आज यह लेख लिखते हुए मुझे उनकी वो आवाज भी याद आ रही है, ‘ऐ मलकिनी कुछ खाए के मिली। ठीक से साफ कर दे ले बानी। आ तनी राख होखे त द। कोयला और कुनाई के चूल्हे पर खाना बनता था और राख एक परात में इसके लिए ही रखा जाता था। शौच साफ करने के बाद वो राख से गीले को सुखाती थी।
वो कहां से आती थीं, मैं नहीं जानता। लेकिन हां वो अकसर दोपहर में ही आती थी। उनके लिए एल्युमिनियम की थाली आंगन में ही रखी रहती थी। मां उन्हें उसी थाली में खाना देती थी। मुझे याद आ रहा है कि जब मां उन्हें खाना देती थी या थाली धोने के लिए पानी देती तो वो अपनी साड़ी घुटने तक उठा लेती थी। शायद छुआछूत का उनका कोई अपना अलग ही तरीका हो। हां, मां ने उन्हें कभी बासी खाना नहीं दिया।
पूरे कैंपस में शिक्षकों के क्वाटर को छोड़कर और कहीं भी शौचालय नहीं था। प्रशिक्षु शिक्षकों के हॉस्टल, कार्यालय और प्राथमिक विद्यालय में सिर्फ मूत्रालय थे। मूत्रालय क्या एक कोना होता था, जो सिर्फ बरसात के पानी में ही धुलता था। नहीं तो कभी-कभी सिर्फ चूना छिड़क दिया जाता था। 
कैंपस के पास ही दो नहरें बहती थीं। एक बड़ी नहर तो दूसरी छोटी नहर। डुमरांव महाराज द्वारा निर्मित एक तालाब भी कैंपस के पास ही था। प्रशिक्षु शिक्षक सुबह और शाम नहर किनारे लोटा लेकर जाते। स्कूल के बच्चे भी तालाब के किनारे बैठ जाते थे। घर के बदबूदार शौचालय में मुझे उल्टी होती थी। मैंने भी स्कूल के बच्चों के साथ कभी-कभी खुले में शौच करने की कोशिश की, लेकिन वह मुझसे हो ना सका। हां कभी-कभार सूअरों का झुंड आता था और शौचालय का मल खाकर उसे साफ कर देता था। कभी-कभी तो उनको भगाना पड़ता था जब कोई शौच के लिए बैठा हो और वे झुंड बनाकर घुस आते थे।
डुमरांव से कभी-कभार गांव शाहपुर जाना होता था। गांव में भी वैसा ही शौचालय। वही चार सीढ़ी ऊपर वाला। वही पुरानी-सी लोहे की एक बाल्टी और एक लोटा। गांव का मेरा घर काफी बड़ा है। आंगन, जिसके चारों ओर कमरे और उसके कोने में दो शौचालय। एक महिलाओं के लिए, एक पुरुषों के लिए। बच्चे किसी में चले जाते थे। शौचालय के पीछे बाड़ी। इसी बाड़ी की तरफ शौचालय के मल की निकासी का रास्ता था। बड़का बाबूजी का परिवार तब गांव में ही रहता था। छठ या गर्मी की छुट्टियों में हमारा पूरा परिवार जुटता था।
शौचालय साफ करने वाली जब आती तो पीछे की गली से आवाज देती, ‘मलकिनी केवाड़ी खोलीं।’ बड़की माई उसकी आवाज पहचानती थी और घर के किसी सदस्य को कहती, ‘खड़ी के दरवाजा खोल द मेहतरानी आइल बाड़ी।’ जब हम सभी जुड़ते तो बड़की माई उस महिला को स्पष्ट कहतीं, ‘ए मेहतरानी एको दिन नागा मत करिह पूरा परिवार जुटल बा। आ होली कि दिन आ जइह पूआ पूरी लेबे।’ वह भी हां में सर हिला देती।
गांव में मैला साफ करने वाली को रोज खाना नहीं मिलता था। महीने में कुछ अनाज दे दिया जाता था। उस समय मेरे गांव के चार-पांच घरों में ही शौचालय हुआ करते थे जिसकी सफाई का जिम्मा उसी का था। उसका परिवार कहां और किस अवस्था में रहता था यह नहीं जान पाया। सच कहूं तो तब उनकी नारकीय जिंदगी को लेकर कोई संवेदना नहीं थी। यह संवेदना आई है सुलभ से जुड़ने के बाद। जब मैं संस्था से जुड़कर ऐसी महिलाओं और उनके परिवार से मिला।
मेरा परिवार बहुत बड़ा था। जब हम सभी जुटते थे तो पास में दो कोस पर हमारी बुआ रहती थीं शाहपुर थाना और पोस्ट के अंतर्गत ही आता है सोनवर्षा गांव। बुआ का घर हमारे घर से थोड़ा छोटा था लेकिन वही दलान, आंगन वही, खड़ी या बाड़ी, वही कुंआ, वही चापाकल। लेकिन वहां शौचालय नहीं था। बाड़ी में ही घर की महिलाएं जाती थीं। पुरुष भागड़,अपने वक्र आकार को छोड़कर नदी जब सीधी हो जाती है यानी भाग जाती है तो वहां भागड़ बन जाता है। एक झील की तरह निर्मित हो जाता है भागड़। हैंडपंप और कुंआ को छोड़कर पानी का सबसे बड़ा स्रोत यह भागड़ ही था। जहां गांव के लोग नित्य क्रियाकर्म से लेकर, कपड़ा धोने और गाय और बैल को पानी पिलाने तक का काम करते थे। 
हम सोनवर्षा अपनी बुआ के लिए खड़ी में बने शौचालय का प्रयोग करते थे। मेरी बुआ उसे ‘गांधी बाबा का शौचालय कहती थीं। होता यूं था कि दो-तीन फीट का एक गड्ढा खोद दिया जाता था और उसमें मल त्याग किया जाता था। जब वह भर जाता तो मिट्टी और पुआल डालकर उसे ढंक दिया जाता था। बाड़ी या खड़ी का आहता होता था। लेकिन इतना खुला-खुला कि जो लोग शहर से यहां आते उन्हें मुश्किल होती। ऐसा ही एक मजेदार वाकया याद आ रहा है। मेरा परिवार देश के अन्य शहरों और विदेशों में रहते हुए भी संयुक्त था। फुफेरी बहन की शादी थी और हम सभी सोनवर्षा में जुटे थे। अमेरिका और कनाडा से मेरे दो चचेरे भाई भी उस शादी में आए थे। उन्हें नहीं पता था कि यहां शौचालय नहीं हैं। शौच के वक्त जब बुआ ने कहा, मेरे यहां तुम्हारे शहरों जैसा शौचालय नहीं है मेरे यहां तो ‘गांधी बाबा’ वाला शौचालय है और जब उसे दिखाया तो वे असमंजस में पड़ गए। दोनों वहां गए तो जरूर, लेकिन जल्द ही लौट पडे़। दो दिन तक ‘गांधी बाबा’ के शौचालय में आते-जाते रहे, लेकिन उन्हें शौच नहीं हो रहा था। तीसरे दिन हम भागड़ में नहाने गए। वे दोनों भाई भी। तभी उन दोनों में से एक भाई को शौच महसूस हुआ और उसने डुबकी लगाकर शौच कर दी। शौच करने और डुबकी लगाने के बाद जब वे पानी से बाहर निकले उनका पूरा शौच उनसे पहले पानी की सतह पर था और उनके निकलते ही उनके सर पर। फिर तो उसी भागड़ में पाखाना और उल्टी दोनों ही किया। उनकी तबियत खराब हो गई और बिना शादी देखे वे पटना लौट गए।
गांव डुमरांव के कच्चे शौचालय और ‘गांधी बाबा’ के शौचालय के बाद हमने तीसरा शौचालय बिहार के ही पटना जिला के विक्रम में देखा। बाबूजी का तबादला डुमरांव से विक्रम हो गया था। यहां के टीचर ट्रेनिंग स्कूल में हमें गेस्ट हाउस वाला र्क्वाटर मिला था और पूरे कैंपस में एक मात्र यही क्वाटर था जिसमें फ्लश वाला टॉयलेट था। टूटा हुआ फ्लश। मल बहाने के लिए वही बाल्टी, वही लोटा। लेकिन मैं बहुत खुश था क्योंकि यहां बदबू नहीं थी। मां ने उसे एसिड वगैरह से धोकर चमका दिया था। मुझे उत्सुकता थी यह जानने की कि टॉयलेट का शौच जाता कहां है।
फिर एक दिन अचानक टॉयलेट जाम हो गया। कितना भी पानी डाला जाता वह निकल नहीं रहा था। पूरा भर गया। दो तीन दिन तक यही स्थिति बनी रही। हमारे आने से पहले वह गेस्ट हाउस काफी दिनों से बंद पड़ा था और टॉयलेट का सिस्टम किसी को पता नहीं। सीवर सिस्टम तो था नहीं और हमें यह भी पता नहीं था कि इसका गड्ढा कहां है। फिर सामने आए रामजीवन जिनके बारे में इसी सप्ताहिक अखबार में मैंने लिखा था कि ‘रामजीवन हमारे लिए अछूत नहीं थे।’ रामजीवन सेंटर के अन्य घरों के कच्चे शौचालय की सफाई करते थे। उन्हें पता था कि शौचालय का गड्ढा कहां है। दो मजदूरों को एक जगह घास छीलने और मिट्टी हटाने का आदेश दिया। घास और मिट्टी हटी, सीमेंट का एक गोलाकार ढक्कन दिखाई दिया। उसे हटाते ही मल और पानी का भरा गड्ढा दिखाई दिया। अब उसे फेंकना था। दारू का पैसा मांगा गया और कंटेनर से उसे निकालकर दूर जाकर फेंका गया। पिफर खपच्ची मार कर उस शौच को निकाला गया जो शौचालय में जाम पड़ा था। इसके बाद हर छह महीने पर यह प्रक्रिया दुहराई जाने लगी। जब तक हम विक्रम से पटना नहीं आ गए। पटना के अंबेडकर रोड स्थित शांति विहार कॉलोनी में फ्लश तो मिला, लेकिन वही सैप्टिक टैंक और उसे साफ करने की वही प्रक्रिया। काश तब सुलभ के टू-पिट टॉयलेट की जानकारी हमें होती।



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