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सोमवार, 20 मई 2019

स्वच्छता और सत्याग्रह

स्वच्छता की कमी एक अदृश्य हत्यारे की तरह है। गांधी जी को गंदगी में हिंसा का सबसे घृणित रूप छिपा हुआ दिखता था। इसीलिए वह सामाजिक-राजनीतिक, दोनों ही तरह की स्वतंत्रता के मार्ग में स्वच्छता और अहिंसा को सहयात्री की तरह मानते थे

महात्मा गांधी जी ने आजादी हासिल करने के अपने अहिंसक आंदोलन की समूची अवधि के दौरान स्वच्छता के अपने संदेश को जीवंत बनाए रखा। नोआखाली नरसंहार के बाद अहिंसा के अपने विचार और व्यवहार की अग्निपरीक्षा की घड़ी में गांधी जी ने अपने इस संदेश को जन-जन तक पहुंचाने का कोई अवसर नहीं गंवाया कि स्वच्छता और अहिंसा एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।   
एक दिन नोआखाली के गड़बड़ी वाले इलाकों में अपने शांति अभियान के दौरान उन्होंने पाया कि कच्ची सड़क पर कूड़ा और गंदगी इसलिए फैला दी गई है, ताकि वह हिंसाग्रस्त इलाके के लोगों तक शांति का संदेश न पहुंचा पाएं। गांधी जी इससे जरा भी विचलित नहीं हुए और उन्होंने इसे उस कार्य करने का एक सुनहरा अवसर माना जो सिर्फ वही कर सकते थे। आस-पास की झाड़ियों की टहनियों से झाड़ू बनाकर शांति और अहिंसा के इस दूत ने अपने विरोधियों की गली की सफाई की और हिंसा को और भड़कने से रोक दिया। उनके लिए ‘स्वस्थ तन, स्वस्थ मन’ की कहावत में कोई मूर्त अभिव्यक्ति अंतर्निहित नहीं थी, बल्कि इसमें एक गहरा दार्शनिक संदेश छिपा हुआ था। 
स्वच्छता की कमी एक अदृश्य हत्यारे की तरह है। गांधी जी को गंदगी में हिंसा का सबसे घृणित रूप छिपा हुआ दिखता था। इसीलिए वह सामाजिक-राजनीतिक, दोनों ही तरह की स्वतंत्रता के मार्ग में स्वच्छता और अहिंसा को सहयात्री की तरह मानते थे। गांधी जी पश्चिम में स्वच्छता के सुचिंतित नियमों को देख चुके थे, इसीलिए वे इन्हें अपने और अपने करोड़ों अनुयायियों के जीवन में अपनाने का लोभ संवरण नहीं कर पाए। हालांकि इसके लिए उन्होंने जो कार्य शुरू किया उसमें से ज्यादातर अब भी अधूरे ही हैं।    
‘वर्षों पहले मैंने जाना कि शौचालय भी उतना ही साफ-सुथरा होना चाहिए जितना कि ड्राइंग रूम’, गांधी जी का यह कथन स्वच्छता अभियान के दौरान बार-बार उद्धृत किया जाता है। अपनी जानकारी को ऊंचे स्तर पर ले जाते हुए गांधी जी ने अपने शौचालय को (सेवाग्राम आश्रम में) शब्दश: पूजास्थल की तरह बनाया क्योंकि उनके लिए स्वच्छता दिव्यता के समान थी। शौचालय को इतना महत्व‍ देकर ही जनता को इसके महत्व के बारे में समझाया जा सकता है। इस पर अमल के लिए हमें गंदगी में रहने के बारे में अपनी उस धारणा में बदलाव लाना होगा जिसके तहत हम स्वच्छता को आम बात न मानकर एक अपवाद अधिक मानते हैं।  
देश को 2 अक्टूबर 2019 तक खुले में शौच से मुक्ति दिलाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य उसी दिशा में उठाया गया पहला कदम है। देश भर में 5 करोड़ से ज्यादा घरों में से हर एक में शौचालय का निर्माण करने का वादा एक चुनौती भरा लक्ष्य है, लेकिन ‘शौचालय आंदोलन’ को ऐसे ‘सामाजिक आंदोलन’ में बदलना, जिसमें शौचालयों का उपयोग आम बात बन जाए, तभी संभव है जब हम गांधी जी के जीवन से सबक लें। अन्य बातों के अलावा हमें शौचालयों की सफाई करने और सीवेज के गड्ढों को खाली करने के बारे में गांव के लोगों की अनिच्छा जैसी सामाजिक-सांस्कृतिक वर्जना को दूर करना होगा। कोई भी इस समस्या की गंभीरता का अनुमान उस तरह से नहीं लगा सकता जिस तरह गांधी जी ने खुद इसका आकलन किया था। एक बार जब कस्तूरबा गांधी जी ने शौचालय साफ करने और गंदगी का डब्बा  उठाने में घृणा महसूस की थी तो गांधी जी ने उन्हें  झिड़की दी थी कि अगर वह सफाईकर्मी का कार्य नहीं करना चाहतीं तो उन्हें गृह-त्याग कर देना चाहिए। स्वच्छता उनके लिए अहिंसा की तरह, या शायद इससे भी ऊंची चीज थी। गांधी जी के जीवन के इस छोटे-से मगर महत्वपूर्ण प्रकरण में एक बहुमूल्य संदेश निहित है। अपने बाकी जीवन में इस पर अमल करते हुए कस्तूरबा ने अनजाने में ही ‘स्वच्छता ही व्यवहार है’ का परिचय दे दिया। देश में चल रहे स्वच्छता अभियान के लिए यह प्रेरक संदेश हो सकता है। आखिर यही तो वह व्यवहार-परिवर्तन है, जिसके संदेश को स्वच्छ भारत मिशन के जरिए करोड़ों लोगों के मन में बैठाने का प्रयास किया जा रहा है।



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