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सोमवार, 22 अप्रैल 2019

मिथिला पेंटिंग की बहुराष्ट्रीय छटा

पाब्लो पिकासो जैसे विश्वविख्यात पेंटर भी जिस मिथिला पेंटिंग को देखकर प्रभावित हुए थे, आज चित्रकला की वह लोकशैली एक लोक-उद्यम का नाम है

आज भले मिथिला पेंटिंग ‘मधुबनी पेंटिग’ के नाम से जानी जाती हो, लेकिन सही मायनों में इसे मिथिला पेंटिंग नाम देने से ही व्यापक विस्तार मिलता है। 70 और 80 के दशक में इस पेंटिंग की धूम जर्मनी, फ्रांस, स्विट्जरलैंड, अमेरिका, जापान आदि देशों की कलादीर्घाओं में खूब रही। पश्चिमी कलाप्रेमी आज भी चित्रकला की इस शैली पर मुग्ध हैं, पर इसे बाजारवादी प्रसार के लिए अपेक्षित प्लेटफार्म नहीं मिल पा रहा है। 
नए दौर में सीता देवी और गंगा देवी की चित्र शैली और विषय वस्तु ने इस कला को नई जुबान दी। कहते हैं कि पाब्लो पिकासो जैसे विश्वविख्यात पेंटर भी मिथिला पेंटिंग को देखकर प्रभावित हुए थे। सीता देवी और गंगा देवी जैसी चित्रकारों की विदेश यात्राओं और वहां उन्हें मिले सम्मानों ने मिथिलांचल के गांव की महिलाओं को इस कला की ओर नए सिरे से आकृष्ट किया। 

आर्चर का लेख
1934 में बिहार में भारी भूकंप आया था, जिसमें जान-माल की काफी क्षति हुई थी। बताते हैं कि भूकंप पीड़ितों को सहायता पहुंचाने के दौरान तत्कालीन ब्रितानी अफसर और कला प्रेमी डब्ल्यू जी. आर्चर की निगाहें क्षतिग्रस्त मकानों की भीतों पर बनी चित्रों पर पड़ी। उन्होंने इन चित्रों को अपने कैमरे में कैद कर लिया। बाद में वे इस कला के संग्रहण और अध्ययन में जुट गए। वर्ष 1949 में ‘मार्ग’ जैसी प्रतिष्ठित पत्रिका में उन्होंने ‘मैथिली पेंटिग’ नाम से एक लेख लिखा, जिसमें इस कला में प्रयुक्त बिंबों और प्रतीकों का विवेचन है। इसमें चित्रों के आध्यात्मिक अर्थ और विभिन्न शैली की पड़ताल की गई है। इस लेख के बाद देश-विदेश के कलाप्रेमियों की नज़र इस चित्रशैली पर गई। 

बदला रंगों का इस्तेमाल
60 के दशक में ऑल इंडिया हैंडिक्राफ्ट बोर्ड की तत्कालीन निदेशक पुपुल जयकर ने मुंबई के कलाकार भास्कर कुलकर्णी को मिथिला क्षेत्र में इस कला को परखने के लिए भेजा। बिहार सरकार वर्षों से मधुबनी में एक संग्रहालय बनाने की बात करती रही है, लेकिन अभी तक उसे अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका है। बहरहाल, इन वर्षों में मिथिला चित्र शैली की विषय वस्तु और भाव ही नहीं बदले, बल्कि रंग भी बदले हैं। पहले प्राकृतिक तौर पर मिलने वाली रंगों का ही इस पेंटिंग में इस्तेमाल होता था। मसलन, हरी पत्तियों से हरा, गेरू से लाल, काजल और कालिख से काला, सरसों और हल्दी से पीला, सिंदूर से सिंदूरी, पिसे हुए चावल, दूध और गोबर से बने रंगों से ही कलाकार चित्रों को उकेरते थे, लेकिन वर्तमान में ज्यादातर कलाकार देशज और प्राकृतिक रंगों के बदले एक्रिलिक रंगों का इस्तेमाल करने लगे हैं, जिससे इनके बिखरने का खतरा नहीं रहता। आज जहां बाजार में भारतीय कला को मुंहमांगी कीमतों पर खरीदा-बेचा जा रहा है, वहीं मिथिला शैली के चित्रों को उस तरह से बाजार नहीं मिल पा रहा है। 

मधुबनी पेंटिंग की उषा
 इस बीच कुछ प्रयास निजी तौर पर ऐसे जरूर हुए हैं, जिसने समय के मुताबिक मधुबनी पेंटिंग को एक उद्यम की शक्ल दी है। ऐसा ही एक अहम प्रयास किया है उषा झा ने।  बिहार-नेपाल सीमा पर स्थित एक गांव से आने वाली उषा झा ने अपने स्कूल की पढ़ाई कहने-सुनने को जिला मुख्यालय शहर पूर्णिया में की है और उनकी शादी कक्षा 10 उत्तीर्ण करने के पहले ही हो गई थी। शादी के बाद वे पटना आ गईं, लेकिन उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी। निजी ट्यूशन के माध्यम से, पत्राचार पाठ्यक्रम और सरकारी शिक्षण संस्थान से उन्होंने मास्टर डिग्री प्राप्त करने में सफलता हासिल की। उषा कहती हैं कि 'कहीं गहरे, मेरे अंतरमन में उद्यमशीलता का एक सपना था। मैं स्वयं अपने और दूसरों के लिए कुछ करना चाहती थी। मेरे जीवन में सब कुछ था। बच्चे, सहयोग करने वाला एक प्यारा परिवार, फिर भी मुझे लगता था कि मेरी अपनी कोई पहचान नहीं है। अपने होने का बोध नहीं था।' अपनी स्वयं की पहचान बनाने से लेकर 300 से अधिक महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने तक, उषा ने एक लंबा सफर तय किया है। हालांकि ये यात्रा इतनी भी आसान नहीं रही, लेकिन संतोषजनक जरूर रही और यही संतोष उषा को आगे बढ़ने की हिम्मत देता है। 1991 में जब उनके बच्चे बड़े हो गए और उनके पास अधिक खाली समय था, तब उन्होंने कुछ करने का फैसला किया और उस मिथिला कला को अपने भविष्य-निर्माण का धार बनाया, जिससे कि वे बचपन से ही परिचित थीं।

‘पेटल्स क्राफ्ट’ की शुरुआत
देखते-देखते उषा झा का एक छोटा-सा कदम एक विशाल छलांग बन गया। ‘पेटल्स क्राफ्ट’ की शुरुआत 1991 में उषा झा के घर पटना के बोरिंग रोड से हुई, जहां से वे आज भी काम करती हैं। कलाकारों के लिए समर्पित एक कमरे से शुरू हुआ उनका काम अब पूरे घर में फैल चुका है। रग्स पर करीने से रखे फोल्डर्स, साड़ी, स्टॉल्स ग्राहकों के लिए तैयार रहते हैं। उषा कहती हैं, ‘आज हमने आधुनिक मांगों को पूरा किया है और बैग, लैंप, साड़ी और घरेलू सामान सहित लगभग 50 विभिन्न उत्पादों पर मधुबनी पेंटिंग की है।’ वे हमें एक नैपकिन होल्डर दिखाती हैं, जो उनके अमेरिकी और यूरोपीय ग्राहकों में खासा पसंद किया जाता है।
आज उनके ग्राहकों में भारत के  दौरे पर आए सरकारी और गणमान्य व्यक्तियों से लेकर दुनिया के विभिन्न देशों से आए पर्यटक भी शामिल हैं। उषा ने थोड़े से शिल्पकारों के साथ अपने काम की शुरुआत की थी, जिनमें से दो तो उनके घर से काम करती थीं, जबकि शेष अन्य मिथिलांचल में रह कर काम करती थीं। महिला कलाकारों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ती रही और आज 300 से अधिक प्रशिक्षित स्वतंत्र महिलाएं उनके साथ काम करती हैं। 2008 में उषा झा ने गांवों में किए जा रहे अपने काम को औपचारिक रूप दिया तथा उन्होंने अपने गैर सरकारी संगठन, ‘मिथिला विकास केंद्र’ का पंजीकरण करवाया। उषा कहती हैं, 'इसके माध्यम से हम महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाते हैं। महिलाएं अपना घर चलाने में सक्षम हैं। हम उनके बच्चों के लिए शिक्षा भी उपलब्ध कराते हैं और उनके स्वास्थ्य के मुद्दे पर उन्हें जानकारी देते हैं। हम स्वास्थ्य को प्राथमिकता देते हैं और महिलाओं को होने वाली स्वास्थ्य समस्याओं के बारे में उनके बीच जागरूकता फैलाने का काम भी करते हैं।'
उषा झा द्वारा प्रशिक्षित कई महिलाओं ने उन्हें छोड़ कर अपना काम भी शुरू कर लिया है और अब कई महिलाओं को पटना में भी प्रशिक्षित किया जा रहा है। लेकिन पूरी तरह से देखें तो प्रगति थोड़ी धीमी है। वह कहती हैं, 'मैंने जब शुरुआत की थी तब ऑनलाइन विक्रय की कोई अवधारणा नहीं थी। उन दिनों में हमें पूरे देश में और यहां तक कि विदेशों में भी यात्रा कर के स्टॉल लगाने पड़ते थे। मुझे अपने उत्पाद को बेचने के लिए बड़े पैमाने पर यात्रा करनी पड़ती थी।' उषा झा आज की तारीख में मधुबनी पेंटिंस और उससे जुड़े उद्यम के क्षेत्र में एक बड़ा नाम बन गई हैं। विभिन्न वेबसाइट्स के माध्यम से वे अपने उत्पाद ऑनलाइन बेचती हैं, फिर भी उनका कहना है कि आज भी हमारी ज्यादातर बिक्री एक-दूसरे से बातचीत के माध्यम से ही होती है। प्रौद्योगिकी ने उन्हें गांव के कलाकारों के साथ संवाद करने में सबसे बड़ी मदद की है। व्हाट्सएप ने कस्टमाइजेशन की सभी समस्यायों को समाप्त कर दिया है।

राष्ट्रपति भवन की शोभा
जब पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने बिहार का दौरा किया, तो उन्हें 14 फीट लंबी एक पेंटिंग भेंट की गई थी, जो आज भी राष्ट्रपति भवन की शोभा बढ़ा रही है। इस पर वह गर्व से कहती हैं, ‘वह पेंटिंग हमारे द्वारा ही दी गई थी।’ एक और दिलचस्प वाकया स्वीडन से आए एक पर्यटक के बारे में है। इस बारे में वह कहती हैं,  ‘उनके ड्राइवर को पता ही नहीं था कि आर्ट गैलरी क्या होती है, इसीलिए वह उस पर्यटक को पेटल्स क्राफ्ट ले कर आ गया।----’ आगे वे कहती हैं 'हो सकता है कि वह एक आर्ट गैलरी नहीं खोज सका हो, लेकिन उसे हमारा शिल्प बहुत पसंद आया और वह हमारी कला देख कर बहुत खुश हुआ। उसने अपने परिवार के लिए बहुत सारे उपहार खरीदे।'
पेटल्स क्राफ्ट के अलावा उषा झा ने इन तमाम सालों में और भी अन्य भूमिकाएं निभाई हैं, जैसे पटना में एक कॉलेज के अतिथि व्याख्याता के रूप में शिक्षण। पिछले 17 सालों से बिहार महिला उद्योग संघ के सचिव का पद संभालने के साथ ही वे अनेक जरूरतमंद महिलाओं के संबल का आधार भी रही हैं। वे सभी महिलाएं जिन्होंने अपने शुरुआती दिनों में उषा से प्रशिक्षण लिया, वे अब अगुआ के रूप में उभरी हैं और जो महिलाएं अभी इस क्षेत्र में नई हैं, वे अपने भविष्य में उजाले की एक नई किरण को भर रही हैं।
आने वाले दिनों में उषा झा बिहार-नेपाल सीमा के पास गांवों और कस्बों में अधिक से अधिक प्रशिक्षण केंद्र स्थापित करना चाहती हैं, जहां उन्हें लगता है कि सरकार अभी तक पहुंचने में सफल नहीं हो पायी है। वे कहती हैं, ‘ये एक महत्वाकांक्षी परियोजना है और मैं अधिक से अधिक महिलाओं को आर्थिक रूप से स्वतंत्र बनाने के लिए इन केंद्रों की स्थापना करना चाहती हूं।’ अपनी बात को खत्म करते हुए अंत में वे दूसरों को सिर्फ ये संदेश देना चाहती हैं, ‘यदि मैं ये कर सकती हूं तो आप भी कर सकते हैं।’



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