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सोमवार, 22 अप्रैल 2019

त्रिलोका - वृंदावन में मिला जीवन का नया उद्देश्य

जीवन का त्रिलोका के लिए एक अलग अर्थ था लेकिन वृंदावन ने इसे बदल दिया

करीब डेढ़ साल पहले त्रिलोका पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले से वृंदावन आई थीं। वैधव्य जीवन के अभिशाप के 16 साल बाद उसका जीवन बदला और उसने तमाम रूढ़िवादी परंपराओं और कुरीतियों को पीछे छोड़ते हुए जीवन के नए लक्ष्य निर्धरित किए। 
त्रिलोका सिर्फ 12 साल की थी जब उसका विवाह एक 25 साल के व्यक्ति से कर दिया गया था। इस जोड़ी के बीच उम्र का अंतर आज भले ही बहुत बड़ा लगता हो, लेकिन उन दिनों इसे सामान्य माना जाता था और ऐसे ही विवाह होते थे। 
वह इतनी कम उम्र में शादी करने वाली समाज की कोई पहली लड़की नहीं थीं और न ही उसका पति अपने से आधी उम्र की लड़की से शादी करने वाला कोई पहला व्यक्ति था। सामाजिक रूप से यह सब बहुत सामान्य था। 
त्रिलोका ने शादी के बाद दो बच्चों को जन्म दिया - एक लड़का और एक लड़की। उसका परिवार पूरा हो गया था। उसके समाज के हिसाब से सबसे अच्छी बात यह थी कि उसके दोनों बच्चों का ठीक से पालन-पोषण हुआ और फिर आखिरकार उनकी शादी हो गई। उसकी और उसके पति की सभी जिम्मेदारियां पूरी हो गईं थीं। त्रिलोका को जीवन में इससे अधिक कोई और आकांक्षा भी नहीं थी।
एक दिन अचानक त्रिलोका के पति को एक कुत्ते के काटने का दंश झेलना पड़ा। त्रिलोका सुबकते हुए कहती हैं, ‘हमारा जीवन सामान्य चल रहा था। लेकिन एक दिन एक कुत्ते ने मेरे पति पर हमला किया और चीजें अप्रत्याशित रूप से बदल गईं। हमें वास्तव में पता ही नहीं था कि क्या करना है। हमने उनका इलाज कराने की कोशिश की, उन्हें बचाने की पूरी कोशिश की। लेकिन हम असफल रहे। और फिर मुझे मालुम था कि वह मेरी जिंदगी में वैधव्य छोड़कर हमेशा के लिए जा रहा है।’
पति के अप्रत्याशित निधन के बाद त्रिलोका का पूरा जीवन ही बदल गया। उसने एक विधवा के जीवन की शुरुआत की। सफेद कपड़े, सादा भोजन, कोई त्योहार और उत्सव नहीं, जिंदगी सफेद सन्नाटे की चादर में  लिपट गई।
लगभग सोलह साल तक यही उसका नियमित जीवन बन गया और उसकी जिंदगी की नैया दुख के मझधार में हिचकोले खाती हुई फंसी रही। फिर एक शुभ दिन त्रिलोका की 'बुआ' वृंदावन जा रही थीं। उसने उस पवित्र भूमि के बारे में पहले सुन रखा था, जहां भगवान कृष्ण और राधा रानी एक वक्त पर रहते थे। यह बात, वृंदावन को लेकर उसमें रुचि जगाती थी। उसकी बुआ ने उसे साथ चलने के लिए पूछा। त्रिलोका जो इस अपने इस जीवन से बाहर निकलने की कोशिश कर रही थी, बुआ के साथ चलने को राजी हो गई। त्रिलोका कहती हैं, ‘जब मैं उस दिन जाने के लिए तैयार हो रही थी, मुझे बिल्कुल भी नहीं पता था कि मैं अपने भविष्य के घर के लिए तैयार हो रही हूं। मैं अपनी बुआ के साथ वृंदावन गई। बुआ ने कहा था कि मेरे साथ चलो, तुम्हे वह जगह पसंद आएगी। मुझे उनके शब्दों पर कोई संदेह नहीं थी, लेकिन मैंने यह नहीं सोचा था कि मैं इसे इतना पसंद करूंगी कि वहीं रहने का फैसला कर लूंगी।’ 
वृंदावन की आभा, वहां का वातावरण, उसका आध्यात्मिक अनुभव, वहां के लोग, भजनों की गूंज - सबकुछ ने उसे इतना आकर्षित किया कि उसने वहीं रहने का फैसला कर लिया। शुरुआती दिनों में, वह गोपीनाथ मंदिर में ठहरीं और दूसरों के साथ भजन गाती रहीं। फिर कुछ वक्त बाद, वह तुलसीवन आश्रम चली गईं, जहां उनकी तरह ही कई और वैधव्य भरा जीवन व्यतीत करने वाली महिलाएं रहती हैं।
त्रिलोका के लिए अब जीवन के मायने बदल गए थे, अब जीवन एक नया उद्देश्य लेकर आया था। राधा रानी और भगवान कृष्ण की भक्ति में वह पूरी तरह डूब चुकी हैं। वह दिन में दो बार उनके भजन गाती है और शेष समय रोजाना का काम करते हुए उनके नामों का सुमिरन करने में व्यतीत करती हैं।
बच्चे वापस लौटने के लिए पूछते हैं या नहीं, इस सवाल पर त्रिलोका कहती हैं, ‘मैं साल में एक बार अपने परिवार के पास उनसे मिलने जाती हूं। मेरे बेटे और बेटी, यहां हर छह महीने में एक बार मुझसे मिलने आते हैं। वे मुझसे पुरुलिया वापस लौटने के लिए भी कहते हैं। लेकिन मेरी आत्मा अब वृंदावन की सड़कों और भगवान कृष्ण और राधा रानी के भजनों में लगी हुई है। मैं यहां खुश हूं, इसीलिए मैं अब कहीं नहीं जाऊंगी।’
त्रिलोका ने अपनी जिंदगी में कई जीवन जिए। एक वह जीवन जो समाज ने उसे बचपन में मिला, दूसरा वह जीवन जो उसने वैधव्य भरी जिंदगी के साथ बिताया और अंत में शांति और संतुष्टि से भरा जीवन का वह रूप जो वृंदावन ने उसे उपहार में दिया। वृंदावन का जीवन, उसके पिछले दो जीवन से बहुत बेहतर है। इस जीवन ने बहुत सी रूढ़िवादी प्रथाओं को तोड़ते हुए, उसके जीवन में फिर से रंग भरे और नई मंजिल दिखाई। त्रिलोका अब अपनी जिंदगी से पूरी तरह संतुष्ट है। 
वह कहती हैं कि 'लाल बाबा' (डॉ. विन्देश्वर पाठक) ने उनकी जिंदगी का अर्थ बदल दिया है और अब वह ऐसी जिंदगी जी रही हैं, जिसकी कभी उम्मीद नहीं की थी। वह खुश है कि यह जीवन अप्रत्याशित रूप से उनके दरवाजे पर आया और उसने इसे अपना लिया।



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