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सोमवार, 20 मई 2019

स्वच्छता का नया समाजशास्त्र

सुलभ प्रणेता डॉ. विन्देश्वर पाठक ने विश्व को स्वच्छता का नया समाजशास्त्र दिखाया है, जिसमें सफाई के साथ मानवीय प्रेम और करुणा को भी पर्याप्त महत्व दिया गया है

नब्बे के दशक में भारत को 21वीं सदी में जाने की बात खूब होती थी। ये बातें जहां संसद के बाहर-भीतर राजनीतिक लाइन के साथ कही जाती थी, वहीं आर्थिक-सामाजिक स्तर पर भी भावी भारत से जुड़े सरोकारों और चुनौतियों को लेकर विमर्श चलता था। पर किसी ने कभी सोचा भी होगा कि 21वीं सदी के दूसरे दशक तक पहुंचकर स्वच्छता देश का प्राइम एजेंडा बन जाएगा। इस बदलाव के पीछे बड़ा संघर्ष है। आज देश में स्वच्छता को लेकर जो विभिन्न अभियान चलाए जा रहे हैं, उसमें जिस संस्था और व्यक्ति का नाम सबसे पहले जेहन में आता है, वह है सुलभ इंटरनेशनल और इस संस्था के प्रणेता डॉ. विन्देश्वर पाठक। दुनिया आज डॉ. पाठक को ‘टॉयलेट मैन’ के रूप में जानती है। उन्होंने एक तरफ जहां सिर पर मैला ढोने की मैली प्रथा को खत्म करने का बीड़ा उठाया, वहीं देशभर में सुलभ शौचालय की उपलब्धता से उन्होंने आम लोगों की स्वच्छता जरूरत को पूरा करने के क्षेत्र में महान कार्य किया। बड़ी बात यह है कि डॉ. पाठक द्वारा शुरू किया गया स्वच्छता का सुलभ अभियान अब भी थमा नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दो अक्टूबर 2014 को स्वच्छ भारत मिशन शुरू होने के बाद डॉ. पाठक के मार्गदर्शन में सुलभ का स्वच्छता अभियान नई प्रेरणा और गति के साथ आगे बढ़ रहा है। शौचालय और स्वच्छता को पांच दशक से अपनी समझ और विचार की धुरी बनाकर चल रहे डॉ. विन्देश्वर पाठक ने एक तरह से दुनिया को स्वच्छता का नया समाजशास्त्र सिखाया है, जिसमें साफ-सफाई के सबक तो हैं ही, मानवीय प्रेम और करुणा को भी पर्याप्त महत्व दिया गया है। 
बिहार गांधी शताब्दी समिति में एक कार्यकर्ता के नाते गांधी विचार और कार्यक्रमों के करीब आए डॉ. पाठक तब से न सिर्फ पूरे देश में, बल्कि अखिल विश्व में स्वच्छता का अलख जगा रहे हैं। सिर पर मैला ढोने की कुप्रथा को लेकर सुलभ ने उल्लेखनीय कार्य किए हैं। सिर पर मैला ढोने वाले लोगों को इस अमानवीय कार्य से मुक्ति दिलाने की सोच की ही देन है सुलभ द्वारा विकसित हुआ दो गड्ढों वाला शौचालय। आज यह तकनीक पूरी दुनिया में ‘सुलभ शौचालय’ के रूप में जानी जाती है। इस तकनीक में पहले गड्ढे में जमा शौच खाद में बदल जाता है। सुलभ ने शौचालय के जरिए गैस बनाने और उसे बिजली तक बनाने के कामयाब प्रयोग किए हैं। 1970 में सुलभ इंटरनेशनल की स्थापना हुई और आज शौचालय निर्माण की सस्ती तकनीक के लिए इसकी दुनियाभर में पहचान है। सुलभ प्रणेता डॉ. पाठक भी मानते हैं कि गांधी जी के बाद अगर इस देश में स्वच्छता के महत्व को किसी ने गहराई से समझा है तो वे हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी।
हाथ से मैला ढोना (मैन्युअल स्कैवेंजिंग) भारत में प्रतिबंधित काम है। इसी साल मार्च में राज्यसभा में एक प्रश्न के जवाब में केंद्र सरकार में मंत्री थावरचंद गहलोत ने बताया था कि देश में 26 लाख ऐसे शौचालय हैं जहां पानी नहीं है। जाहिर है वहां हाथ से मैला ढोना पड़ता है। सफाई कर्मचारी आंदोलन ने अपने सर्वे में बताया है कि 1993 से अब तक 1,370 सीवर वर्कर्स की मौत हो चुकी है। इस दिशा में स्कैवेंजर्स के पुनर्वास का सबसे बड़ा अभियान सुलभ संस्था ने ही छेड़ा है। डॉ. पाठक को इस बात का श्रेय जाता है कि जिस मैली प्रथा को लेकर कभी महात्मा गांधी ने कहा था कि उनके सपनों के भारत में इसके लिए कोई जगह नहीं होगी, उस प्रेरणा को उन्होंने अपनी जिंदगी का मिशन बना लिया। स्वच्छता के क्षेत्र में सुलभ प्रणेता डॉ. विन्देश्वर पाठक के अतुलनीय योगदान को देखते हुए कभी महात्मा गांधी के प्रपौत्र राजमोहन गांधी ने कहा था, ‘मैं महात्मा गांधी के पुत्र का पुत्र हूं, पर डॉ. विन्देश्वर पाठक गांधी जी के मानस पुत्र हैं।’ यह वाकई सही है कि जब कई लोग महज गांधी जी की जीवनशैली के अनुकरण की कोशिश करते हैं, डॉ. पाठक ने राष्ट्रपिता के विचार और दर्शन को न सिर्फ जीवन में बल्कि सरजमीं पर भी उतारा है। स्वच्छता को अपना मिशन, मानव उत्थान को अपना लक्ष्य बताने वाले डॉ. पाठक कहते हैं, ‘स्वच्छता एक मिशन है। यह बिल्कुल उस तरह नहीं है जैसे पुल या सड़क का निर्माण। मैं इस मामले में खुशनसीब हूं कि अपने जीवनकाल में स्कैवेंजिंग को दूर करने और स्केवैंजर्स के जीवन को बेहतर बनाने के संकल्प को मैं पूरा कर पाया।’ 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब 2014 में राष्ट्रीय स्वच्छता मिशन की घोषणा की तो देश में स्वच्छता कार्यक्रम को पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर गंभीर प्राथमिकता मिली। अपने स्वच्छता कार्यक्रमों के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति और सम्मान प्राप्त कर चुके डॉ. पाठक कहते भी हैं, ‘स्वच्छता को लेकर देश में गंभीरता की कमी रही। इसे महत्व नहीं दिया गया। इस क्षेत्र में निवेश का भी अभाव रहा, पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस पूरे परिदृश्य को बदल कर रख दिया। वे ऐसे पहले राष्ट्रीय नेता रहे जिन्होंने न सिर्फ लाल किले के प्राचीर से शौचालयों की बात की, बल्कि इस बारे में विदेशी नेताओं तक से लगातार चर्चा करते रहे। उन्होंने देश को यह सोचने और मानने के लिए बाध्य किया कि अगर हम स्वच्छता के मामले में आगे नहीं बढ़े तो फिर एक विकसित राष्ट्र के रूप में हमारा उभरना मुश्किल है। लिहाजा यह समय है जब हम देश को स्वच्छ और सुंदर बनाने के लिए एक साथ खड़े हों, ताकि सभ्य, सुसंस्कृत औऱ स्वच्छ देशों की कतार में हम भी फख्र से खड़े हो सकें।’
प्रधानमंत्री के स्वच्छता मिशन से डॉ. पाठक द्वारा पहले से किए जा रहे प्रयासों को जहां नए सिरे से महत्व मिला, वहीं वे इस बात से खासे प्रोत्साहित और प्रेरित भी हुए कि देश का प्रधानमंत्री इतने वर्षों के बाद गांधी जी के स्वच्छता कार्यक्रमों को न सिर्फ अपना रहा है, बल्कि उसे देश में एक जनांदोलन की शक्ल देने में लगा है। बात स्वच्छता की करें तो इसमें कहीं कोई दो मत नहीं कि इस काम को जिस लगन और विस्तार के साथ डॉ. पाठक ने अब तक किया है, वैसा उदाहरण भारत तो क्या दुनिया में दुर्लभ है।



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