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शुक्रवार, 19 अप्रैल 2019

भूख के खिलाफ 'अक्षय पात्र'

पेट खाली हो तो रोटी के लिए कोई कुछ भी कर सकता है। बाल श्रम के पीछे सबसे बड़ा यही तर्क है। इसीलिए जब पेट पढऩे से भर जाए तो बच्चे पढ़ाई करेंगे। इसी सोच का दूसरा नाम है 'अक्षय पात्र'

कोलकाता के पास मायापुर गांव। प्रभुपाद वहां एक मंदिर के उद्घाटन के लिए आए थे। दोपहर का समय था, भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद अपने कमरे की खिड़की से बाहर देख रहे थे। उनके साथ कुछ लोग भी बैठकर बातचीत कर रहे थे। तभी बाहर कुछ शोर हुआ। कुछ बच्चे चीख-चिल्ला रहे थे और कुत्ते भौंक रहे थे। प्रभुपाद ने खिड़की से झांक कर देखाकुछ बच्चे एक कुत्तों के झुंड से भोज के बाद वहां फेंके गए जूठन के लिए लड़ रहे थे। दरअसलमंदिर के उद्घाटन के बाद वहां भोज हुआ था और बच्चे और कुत्ते प्लेटों में पड़े जूठे खाने के लिए लड़ रहे थे। इस घटना ने प्रभुपाद के कोमल मन को झकझोर दिया। उन्होंने वहां बैठे लोगों को बुला कर यह सब दिखाया और निश्चय किया की उनके सेंटर से दस मील तक कोई बच्चा दोपहर का खाना खाए बगैर नहींं रहेगा। इस तरह शुरुआत हुई 'अक्षय पात्र फाउंडेशनकी।

एक विनम्र कोशिश

'अक्षय पात्र फाउंडेशनने वर्ष 2000 में कर्नाटक के पांच स्कूलों के 1,500 बच्चों को 'मिड डे मीलमुहैया कराने से इसकी शुरुआत की। इस काम में मदद केंद्र सरकारराज्य सरकारें और कुछ अन्य परोपकारी लोग भी करते हैं। आज यह संस्था कुल 11 राज्यों के 13,529 स्कूलों में मिड डे मील पहुंचा रही है। इस मुहिम के जरिये इनकी कोशिश है उन लाखों बच्चों तक एक समय का पौष्टिक भोजन पहुंचाना जो इससे वंचित हैं। जरा मन में सोच कर देखिए कि जिस बच्चे ने कभी पेट-भर के खाना भी न खाया हो अगर उसे पौष्टिक के साथ स्वादिष्ट भोजन मिले तो उस बच्चे का मन कैसे खिल जाएगाऐसी ही कलियों को खुशबूदार फूलों के रूप में खिलाने की कोशिश है 'अक्षय पात्र'। यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के मुताबिकभारत में 80 मिलियन बच्चे साल की उम्र से पहले पढ़ाई छोड़ देते हैंक्योंकि ये भूखे होते हैं और अपनी भूख मिटाने के लिए इन्हें काम करना पड़ता है लेकिन अगर काम करने से नहींंपढऩे से भूख मिटेगी तो स्वाभाविक है कि बच्चे स्कूल आएंगे। इसी सोच के साथ 'अक्षय पात्रका काम चल रहा है।

बदलाव की बयार

'अक्षय पात्रकी कोशिश की वजह से सरकारी स्कूल में पढऩे वाले गरीब बच्चों के सपने जरूर अमीर हो रहे हैं। जो बच्चे सिर्फ दो वक्त की रोटी के बारे में सोचते थेआज वे अपने आप से ऊपर उठकर दूसरों के अच्छे के लिए भी सोचने लगे हैं। तारावनहल्ली के हायर प्राइमरी स्कूल की कक्षा-5 की छात्रा नागम्मा समाज सेविका बनना चाहती हैं। नागम्मा बहुत ही गरीब परिवार से आती है। इसके माता-पिता दोनों ही मजदूरी करके अपना परिवार चलाते हैं। नागम्मा के परिवार में एक छोटी बहन और भाई भी हैं। वो कहती है कि स्कूल में खाना मिल पाता हैइस वजह से मेरे माता-पिता को मुझे स्कूल भेजने में काफी मदद मिलती है। कम से कम एक समय के खाने के बारे में उन्हें नहींं सोचना होता। मैंं बड़ी होकर समाज सेविका बनना चाहती हूं। किसी के परोपकार की वजह से ही तो हम सब पढ़ पा रहे हैं। इसीलिए हमें भी दूसरों के बारे में सोचना चाहिए। ये बच्ची अपने अलावा सोचने की कोशिश तो करती है। उसे उम्मीद भी है कि वो अपने सपने साकार कर लेगीलेकिन दिल के एक कोने में एक डर भी है कि कहीं गरीबी बीच में रास्ता न रोक दे। लेकिनजब सोच सही हो तो परिणाम अच्छे होने के आसार तो बनते ही हैं।

ऐसी ही कहानी है बडोदरा के आदित्य की। आदित्य सातवीं कक्षा में पढ़ता है और बड़ा होकर देश की रक्षा के लिए सेना में जाना चाहता है। आदित्य कहता है कि सीमा पर जवान अपने प्राण न्योछावर करते हैं। हमेशा कोई न कोई होना चाहिए उस खाली जगह को भरने के लिए ताकि दुश्मन हम पर कभी हमला न कर सके।

आदित्य को स्कूल आना बहुत पसंद है। यहां उसे अच्छा खाना तो मिलता ही हैसाथ ही पढ़ाई के अलावा भी काफी कुछ सीखने को मिलता है। वो कहता है कि मैंं स्कूल से कभी छुट्टी नहींं करता। यहां एथेलेटिक्सक्रिकेट और फुटबॉल खेलने को मिलता है। इसके अलावा यहां मिलने वाली रोटी-सब्जी और खिचड़ी भी मुझे बहुत पसंद है। मैंं मंगलवार का खासतौर पर इंतजार करता हूंक्योंकि उस दिन हमें खिचड़ी खाने को मिलती है।

स्वस्थ बचपन - स्वस्थ देश

नागम्मा और आदित्य जैसे सैकड़ों बच्चे हैंजिन्हें 'अक्षय पात्रकी वजह से या तो स्कूल आने को मिलता है या वे स्कूल आना पसंद करते हैं। फॉर्टिस में कंसल्टेंट डॉअभिमन्यु अनत का कहना है कि बच्चों के सही विकास के लिए आहार बड़ों से अलग होना चाहिए। उसमें फूड ग्रुप होने चाहिए। फूड ग्रु्रप में दूध और दूध से बनी चीजें होनी ही चाहिए। इसके अलावा फलसब्जियां और दालों को खाने में शामिल करना बहुत जरूरी है। अगर बच्चा दाल नहींं खाना चाहतातो उसकी जगह मीट खिला सकते हैं। बच्चों के विकास के लिए फैट बहुत जरूरी हैलेकिन सही तरह का फैट ही दें। अगर इन सारी चीजों का प्रयोग पूरे दिन में हो जाए तो बच्चे को संतुलित आहार मिल सकता है।

'अक्षय पात्रकी पीआर नीलिमा सोम शेखर का कहना है कि इन्हीं न्यूट्रीशियन वैल्यू को बनाए रखने के लिए हम बच्चों के खाने में दिन के हिसाब से बदलाव करते हैंताकि उन्हें सही और पूरा न्यूट्रीशन मिल सके और उनका समुचित विकास हो सके।

उम्मीदों का पात्र

मेंगलुरु के बेंगरे कस्बा के सरकारी स्कूल की शिक्षिका लीलावती का कहना है कि गरीब परिवार के बच्चों के लिए एक कटोरी पायस (खीरकिसी सुख से कम नहींं है। एक बच्चा जिसे भरपेट खाना भी न मिलता हो उसे अगर पायस खाने को मिल जाए तो वो हर हाल में स्कूल आना चाहेगा। मैंं इस स्कूल में लंबे समय से काम कर रही हूं। मैंंने बच्चों की सेहत और उनके एकाग्रता में आए बदलाव को देखा है।

गुजरात के अनटी कुमार प्राथमिक शाला में दोपहर का खाना भी 'अक्षय पात्रकी तरफ से ही आता है। ये वडोडरा के पादरा तालुक का एक प्राथमिक स्कूल है। इस स्कूल में गरीब परिवार के 345 बच्चे पढ़ते हैं। इस स्कूल के प्रधानाध्यापक इस्माइल मलिक का कहना है कि ज्यादातर बच्चों के माता-पिता 2-3 हजार महीना कमाते हैं। वे अपने बच्चों को इसीलिए यहां भेजते हैं ताकि उन्हें कम से कम एक वक्त का पौष्टिक खाना मिल सके। जब से 'अक्षय पात्रसे खाना आना शुरू हुआ हैबच्चे रोज स्कूल आते हैं और बीच में ही स्कूल छोड़ देने वालों की संख्या में भी कमी आई है।

सफाई को प्राथमिकता

11 राज्यों के 27 जगहों पर बने किचन में खाना बनाते समय सफाई का काफी खयाल रखा जाता है। हर एक रसोई में 10 लाख लोगों का खाना बनता है। खाना बनाने के लिए ज्यादातार मशीनों का इस्तेमाल होता है। चावल और दाल बनाने के लिए कढ़ाही में एक बार में 500 किलो चावल और 3000 लीटर दाल बनने की क्षमता है। सब्जियां काटने के लिए इस्तेमाल में आने वाले चाकू और छुरियों को इस्तेमाल से पहले स्टरलाइज किया जाता है। यहां रोटी बनाने की मशीन में एक घंटे में लाख रोटियां बनती हैं। यहां काम करने वाले हर एक कुक को काम पर रखने से पहले ट्रेनिंग दी जाती है। किचन से खाना स्कूलों और आंगनबाडि़य़ों तक छोटी-छोटी गाडि़य़ों में भरकर पहुंचाया जाता है।

काम को सम्मान

'अक्षय पात्रको अपने काम के लिए दर्जनों बार सम्मानित किया जा चुका है। इन सम्मानों में 'कलाम मेमोरियल अवार्डऔर 'मदर टेरेसा अवार्डभी शामिल हैं। इस संस्था को चलाने के लिए देश विदेश से लाखों श्रद्धालु दान देते हैं ताकि 'अक्षय पात्रनिरंतर गरीबों का पेट भरता रहे। 



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