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शुक्रवार, 19 अप्रैल 2019

कपड़े की गूंज

रोटी कपड़ा और मकान में से नजरअंदाज की गई जरूरत कपड़ा है। 'गूंज' इस बुनियादी जरूरत को मुहैया करवाने की ऐसी संस्था है, जिसमें देने वाले के प्राइड की बजाय प्राप्तकर्ता के आत्मसम्मान का ध्यान रखा जाता है। जमीनी स्तर पर काम करने वाली 'गूंज' की पहुंच आज तकरीबन 22 राज्यों में है

'इंसान ठंड से नहींं मरता, बल्कि कपड़े की कमी से मरता है। गैर सरकारी संगठन 'गूंजका यह वाक्य शायद सब कुछ बताने को काफी है। शीत लहर की चपेट में कितने ही लोगों की हर साल जान जाती हैऔर खबर होती है 'ठंड ने ली इतनों की जान', लेकिन तथ्य यह है कि जान ठंड से नहींं जातीबल्कि ठंड में जरूरत लायक कपड़े न होने की वजह से जाती हैअभाव से जाती है। अब जहां तक बात है गरीब तबके में कपड़ों के अभाव कीतो समाजसेवियों का गरीबी में या तंगहाली में जी रहे लोगों को कपड़े दान करना कोई नई बात नहींं है। हमारे देश में दान के नाम पर किसी की गैरत को ध्यान में न रखना आम बात हैक्योंकि सामाजिक दृष्टि से दान करने वाला महान है और पाने वाला बेगैरतलेकिन कोई ऐसी संस्था है जो किसी दानी को महान बनाने की दृष्टि से नहींंबल्कि उस गरीब की गैरत को ध्यान में रखकर बनाई गई? 'गूंजकी 'क्लॉथ फॉर वर्कफ्लैगशिप प्रोग्राम काबिले तारीफ है। 'गूंजअपनी एक टैग लाइन में कहता है, 'वी फोकस ऑन रिसीवर्स डिग्निटी इंस्टेड ऑफ डोनर्स प्राइड।'

'गूंज' की शुरुआत

जीवन में घटित कई घटनाएं आपके जीवन का लक्ष्य तय कर देतीं हैंठीक ऐसा ही अंशु गुप्ता के साथ भी हुआ। अपने पत्रकारिता के करियर के दौरान मुर्दाघर में एक काम करने वाले से मिलेउसकी बेटी ने जब कहा कि सर्दी में कई बार इतनी ठंड हो जाती है कि मैंं मुर्दों से लिपटकर सोती हूं। इससे दो चीजें होतीं हैं। एक तो गर्माहट रहती हैऔर मुर्दे शोर नहींं करते। उस बच्ची की इस बात ने अंशु को अंदर तक हिला दिया। उन्होंने सोचा कि कपड़ा कितनी बड़ी मौलिक जरूरत है। यहां से अंशु ने कपड़े को मूलभूत जरूरत मानते हुए अपने लक्ष्य पर काम करना शुरू कर दिया और 'गूंजनामक संस्था अस्तित्व में आई। आज 'गूंज' 3,000 टन मेटीरियल प्रति वर्ष के हिसाब से काम करता हैऔर कपड़े की बुनियादी जरूरत पूरी कर रहा हैजिसमें प्राप्तकर्ता का आत्मसम्मान भी बरकरार रहता है। हजारों वॉलंटियर जमीनी स्तर पर काम कर रहे हैं।

क्लॉथ फॉर वर्क

'गूंजका काम मुख्य रूप से ग्रामीण और शहरी परिवेश में विभाजित है। अंशु कहते हैं कि इस प्रक्रिया में मात्र किसी से सामान लेकर जरूरतमंद तक पहुंचाने तक सीमित नहींं रहताबल्कि उस सामान को इस्तेमाल किए जाने लायक बनाया जाता हैऔर फिर जरूरतमंद व्यक्ति तक पहुंचाया जाता है। 'क्लॉथ फॉर वर्कके तहत यह संस्था गांव-गांव जाकर वहां के स्थानीय लोगों से उनकी समस्याओं पर चर्चा करती हैफिर उस ढंाचे के निर्माण में उनको शामिल होने को कहती है। फिर बदले में उनको कपड़े व अन्य सामान दिया जाता है। इस खूबसूरत मुहिम का असर यह होता है कि उस क्षेत्र की किसी न किसी समस्या का समाधान भी हो जाता है और किसी काम के बदले मिलने वाले सामान से उनका सम्मान भी बना रहता है। क्योंकि उनको वह सामान किसी काम के बदले मिला है। अंशु गुप्ता कहते हैं कि ग्रामीणों में बहुत आत्मसम्मान होता है मुफ्त में मिलने वाला सामान वे मंजूर नहींं करते। यह आइडिया वाकई कारगर रहा और इसके द्वारा कई गांवों में पुल निर्माणकुंए खुदवानासड़क बनाना आदि शामिल है।

 

'गूंजका मकसद

रोटीकपड़ा और मकान में से दूसरी आधारभूत जरूरत 'कपड़ासम्मानजनक ढंग से मुहैया कराना 'गूंजका मकसद है। इस संस्था का मानना है कि आज के विकासशील युग में हम सबका ध्यान बड़े बड़े मुद्दों पर इतना केंद्रित है कि हमने सामान्य और आधारभूत मुद्दों को तकरीबन नकार ही दिया है। इस फेहरिस्त में कपड़ा भी है जिसकी जरूरत पर ध्यान दिया जाना बहुत अहम है। 'क्लॉथ फॉर वर्क' (सीडब्ल्यूसी), 'नॉट जस्ट पीस ऑफ क्लॉथ' (एनजेपीसीऔर 'राहतजैसे कैंपेन इनकी तमाम कामयाबियों में से हैं।

माई पैड

'गूंजकी 'माई पैडकैंपेन वाकई अलग से तारीफ के साथ-साथ सम्मान के काबिल है। एक औरत के जीवन में मासिक धर्म एक ऐसी प्रक्रिया हैजिसको समाज ने हमेशा लोक-लाज का मुद्दा बनाया। हमेशा इसे छुपाना सिखाया गयाजिसके बारे में खुल कर बात करना मानो आपको अपराधी ही बना देता है। परिणामस्वरूपमासिक धर्म के दौरान होने वाले दर्द में भी महिलाएं दिन भर काम में लगी रहती हैं। यहां तक कि पैड काले पॉलीथिन में दिया जाता है। इस बात को इतना छुपाना सिखाया गया है कि इससे संबंधित जरूरतों और समस्याओं से महिलाएं चुपचाप दो-चार होती हैंलेकिन बोलती नहींं। दूसरी तरफबाजार में उपलब्ध पैड की कीमत जहां गरीब औरतों की पहुंच से बाहर हैवहीं इस गरीब तबके की औरतें सूखा गोबररेत जैसी चीजों तक का इस्तेमाल करने को मजबूर हैं। 'गूंजइस कैंपेन के तहत गरीब तबके की महिलाओं को सैनिटरी पैड उपलब्ध करवाता है क्योंकि इस मामले में स्वच्छता अहम है। पैड बनाने की प्रकिया में इसका खास ध्यान रखा जाता है।

आगे का लक्ष्य

'गूंजने अब तक के सफर में बहुत-सी कामयाबियां हासिल की हैं। अंशु गुप्ता को रेमन मैंग्सेसे व अन्य पुरस्कारों से नवाजा जाना इस बात का सुबूत है। लेकिन अंशु गुप्ता का मानना है कि सफर अभी बहुत लंबा हैबहुत कुछ किया जाना बाकी है। अब तक 22 राज्यों में अपनी पहुंच बना चुकी 'गूंजअपना विस्तार और भी बड़ा करना चाहती है ताकि कपड़े जैसी मूलभूत जरूरत को सभी के लिए पूरा किया जाएवह भी उनके आत्म सम्मान को ध्यान में रखते हुए। 



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