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शुक्रवार, 21 जून 2019

अब जैविक शौचालय की तकनीक

जापान की एक गैर सरकारी संस्था ने जैविक शौचालय विकसित करने में सफलता हासिल की है

गंदे और बदबूदार सार्वजनिक शौचालयों से निजात दिलाने के लिए जापान की एक गैर सरकारी संस्था ने जैविक शौचालय विकसित करने में सफलता हासिल की है। ये खास किस्म के शौचालय गंधरहित तो है ही, साथ ही पर्यावरण के लिए भी सुरक्षित हैं। संस्था द्वारा विकसित किए गए जैविक शौचालय ऐसे सूक्ष्म कीटाणुओं को सक्रिय करते हैं, जो मल इत्यादि को सड़ने में मदद करते हैं। इस प्रक्रिया के तहत मल सड़ने के बाद केवल नाइट्रोजन गैस और पानी ही शेष बचते हैं, जिसके बाद पानी को पुनःचक्रित (री-साइकिल) कर शौचालयों में इस्तेमाल किया जा सकता है। संस्था ने जापान की सबसे ऊंची पर्वत चोटी ‘माउंट फूजी’ पर इन शैचालयों को स्थापित किया है। गौरतलब है कि गर्मियों में यहां आने वाले पर्वतारोहियों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले सार्वजनिक शौचालयों के चलते पर्वत पर मानव मल इकट्ठा होने से पर्यावरण दूषित हो रहा है।
इस प्रयास के बाद माउंट फूजी पर मौजूद सभी 42 शौचालयों को जैविक-शौचालयों में बदल दिया गया है। इसके अलावा सार्वजनिक इस्तेमाल के लिए पर्यावरण के लिए सुरक्षित आराम-गृह भी बनाए गए हैं। इकोजैनमल एक ऐसी वस्तु है जो हमारे पेट में तो पैदा होती है पर जैसे ही वह हमारे शरीर से अलग होती है तो हम उस तरफ देखना या उसके बारे में सोचना भी पसंद नहीं करते।
आंकड़े बताते हैं कि फ्लश लैट्रिन के आविष्कार के 100 साल बाद भी आज दुनिया में सिर्फ 15 प्रतिशत लोगों के पास ही आधुनिक विकास का यह प्रतीक पहुंच पाया है और फ्लश लैट्रिन होने के बावजूद भी इस मल का 95 प्रतिशत से अधिक आज भी बगैर किसी ट्रीटमेंट के नदियों के माध्यम से समुद्र में पहुंचता है।

फ्लश टायलेट की सोच गलत
स्टॉकहोम एनवायरनमेंट इंस्टीट्यूट दुनिया की प्रमुखतम पर्यावरण शोध संस्थाओं में से एक है। इस संस्था के उप प्रमुख योरान एक्सबर्ग कहते हैं कि फ्लश टायलेट की सोच गलत है, इसने पर्यावरण का बहुत नुकसान किया है और अब हमें अपने आप को और अधिक बेवकूफ बनाने के बजाय विकेंद्रित समाधान की ओर लौटाना होगा। सीधा सा गणित है कि एक बार फ्लश करने में 10 से 20 लीटर पानी की आवश्यकता होती है। यदि दुनिया के 6 अरब लोग फ्लश लैट्रिन का उपयोग करने लगे तो इतना पानी आप लाएंगे कहां से और इतने मानव मल का ट्रीटमेंट करने के लिए प्लांट कहां लगाएंगे? मानव मल में पैथोजेन होते हैं, जो संपर्क में आने पर हमारा नुकसान करते हैं। इसीलिए मल से दूर रहने की सलाह दी जाती है। पर आधुनिक विज्ञान कहता है कि यदि पैथोजेन को उपयुक्त माहौल न मिले तो वह थोड़े दिन में नष्ट हो जाता है और मनुष्य का मल उसके बाद बहुत अच्छे खाद में परिवर्तित हो जाता है, जिसे कंपोस्ट कहते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार एक मनुष्य प्रतिवर्ष औसतन जितने मल-मूत्र का त्याग करता है, उससे बने खाद से लगभग उतने ही भोजन का निर्माण होता है, जितना उसे साल भर जिंदा रहने के लिए जरूरी होता है। यह जीवन का चक्र है। रासायनिक खाद में भी हम नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटेशियम का उपयोग करते हैं। मनुष्य के मल एवं मूत्र उसके बहुत अच्छे स्रोत हैं। विकास की असंतुलित अवधारणा ने हमें मल को दूर फेंकने के लिए प्रोत्साहित किया है, फ्लश कर दो उसके बाद भूल जाओ। रासायनिक खाद पर आधारित कृषि हमें अधिक दूर ले जाती दिखती नहीं है। हम एक ही विश्व में रहते हैं और गंदगी को हम जितनी भी दूर फेंक दें वह हम तक लौटकर आती है।

सुलभ तकनीक
गांधी जी अपने आश्रम में कहा करते थे गड्ढा खोदो और अपने मल को मिट्टी से ढक दो। आज विश्व के तमाम वैज्ञानिक उसी राह पर वापस आ रहे हैं। इस दिशा में सबसे बड़ी तकनीकी पहल सुलभ संस्था की तरफ से की गई है। सुलभ प्रणेता डॉ. विन्देश्वर पाठक ने टू-पिट पोर फ्लश टॉयलेट की तकनीक को पूरा दुनिया में लोकप्रिय बनाया है।



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