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सोमवार, 22 अप्रैल 2019

रामबाण वाग्यां रे होय ते जाणे

मोहनदास करमचंद गांधी के महात्मा होने की कहानी भले दक्षिण अफ्रीका से शुरू होती है, पर इसके बीज कहीं न कहीं उनके शुरुआती दिनों में ही पड़ गए थे। वे एक तरफ कई तरह के व्यसन से घिर रहे थे, तो वहीं उन्हें अपनी इस कमजोरी को लेकर काफी आत्मक्षोभ भी था। पिता की मृत्यु ने उनके जीवन पर सबसे ज्यादा असर डाला। ऐसा इसीलिए भी कि वे अपनी तमाम बुराइयों के बीच पिता की सेवा और सम्मान करते थे

प्रथम भाग

8. चोरी और प्रायश्चित
मांसाहार के समय के और उससे पहले के कुछ दोषों का वर्णन अभी रह गया है। ये दोष विवाह से पहले के अथवा उसके तुरंत बाद के हैं। अपने एक रिश्तेदार के साथ मुझे बीड़ी पीने को शौक लगा। हमारे पास पैसे नहीं थे। हम दोनों में से किसी का यह खयाल तो नहीं था कि बीड़ी पीने में कोई फायदा है, अथवा गंध में आनंद है। पर हमें लगा सिर्फ धुआं उड़ाने में ही कुछ मजा है। मेरे काकाजी को बीड़ी पीने की आदत थी। उन्हें और दूसरों को धुआं उड़ाते देखकर हमें भी बीड़ी फूंकने की इच्छा हुई। गांठ में पैसे तो थे नहीं, इसीलिए काकाजी पीने के बाद बीड़ी के जो ठूंठ फेंक देते, हमने उन्हें चुराना शुरू किया।
पर बीड़ी के ये ठूंठ हर समय मिल नहीं सकते थे और उनमें से बहुत धुआं भी नहीं निकलता था। इसीलिए नौकर की जेब में पड़े दो-चार पैसों में से हमने एकाध पैसा चुराने की आदत डाली और हम बीड़ी खरीदने लगे। पर सवाल यह पैदा हुआ कि उसे संभाल कर रखें कहां। हम जानते थे कि बड़ों के देखते तो बीड़ी पी ही नहीं सकते। जैसे-तैसे दो-चार पैसे चुराकर कुछ हफ्ते काम चलाया। इसी बीच, सुना एक प्रकार का पौधा होता है, जिसके डंठल बीड़ी की तरह जलते हैं और फूंके जा सकते हैं। हमने उन्हें प्राप्त किया और फूंकने लगे। पर हमें संतोष नहीं हुआ। अपनी पराधीनता हमें अखरने लगी। हमें दुख इस बात का था कि बड़ों की आज्ञा के बिना हम कुछ भी नहीं कर सकते थे। हम उब गए और हमने आत्महत्या करने का निश्चय कर किया।
पर आत्महत्या कैसे करें? जहर कौन दें? हमने सुना कि धतूरे के बीज खाने से मृत्यु होती है। हम जंगल में जाकर बीज ले आए। शाम का समय तय किया। केदारनाथजी के मंदिर की दीपमाला में घी चढ़ाया, दर्शन किए और एकांत खोज लिया। पर जहर खाने की हिम्मत न हुई। अगर तुरंत ही मृत्यु न हुई तो क्या होगा? मरने से लाभ क्या? क्यों न पराधीनता ही सह ली जाए? फिर भी दो-चार बीज खाए। अधिक खाने की हिम्मत ही न पड़ी। दोनों मौत से डरे और यह निश्चय किया कि रामजी के मंदिर जाकर दर्शन करके शांत हो जाएं और आत्महत्या की बात भूल जाएं।
मेरी समझ में आया कि आत्महत्या का विचार करना सरल है, आत्महत्या करना सरल नहीं। इसीलिए कोई आत्महत्या करने का धमकी देता है, तो मुझ पर उसका बहुत कम असर होता है अथवा यह कहना ठीक होगा कि कोई असर होता ही नहीं। आत्महत्या के इस विचार का परिणाम यह हुआ कि हम दोनों जूठी बीड़ी चुराकर पीने की और नौकर के पैसे चुराकर बीड़ी खरीदने और फूंकने की आदत भूल गए। फिर कभी बड़ेपन में पीने की कभी इच्छा नहीं हुई। मैंने हमेशा यह माना है कि यह आदत जंगली, गंदी और हानिकारक है। दुनिया में बीड़ी का इतना जबरदस्त शौक क्यों है, इसे मैं कभी समझ नहीं सका हूं। रेलगाड़ी के जिस डिब्बे में बहुत बीड़ी पी जाती है, वहां बैठना मेरे लिए मुश्किल हो जाता है और धुंए से मेरा दम घुटने लगता है।
बीड़ी के ठूंठ चुराने और इसी सिलसिले में नौकर के पैसे चुराने के दोष की तुलना में मुझसे चोरी का दूसरा जो दोष हुआ, उसे मैं अधिक गंभीर मानता हूं। बीड़ी के दोष के समय मेरी उम्र बारह तेरह साल की रही होगी, शायद इससे कम भी हो। दूसरी चोरी के समय मेरी उम्र पंद्रह साल की रही होगी। यह चोरी मेरे मांसाहारी भाई के सोने के कड़े के टुकड़े की थी। उन पर मामूली- सा, लगभग पच्चीस रुपए का कर्ज हो गया था। उसकी अदायगी के बारे हम दोनो भाई सोच रहे थे। मेरे भाई के हाथ में सोने का ठोस कड़ा था। उसमें से एक तोला सोना काट लेना मुश्किल न था। कड़ा कटा। कर्ज अदा हुआ। पर मेरे लिए यह बात असह्य हो गई। मैंने निश्चय किया कि आगे कभी चोरी करूंगा ही नहीं। मुझे लगा कि पिताजी के सम्मुख अपना दोष स्वीकार भी कर लेना चाहिए। पर जीभ न खुली। पिताजी स्वयं मुझे पीटेंगे, इसका डर तो था ही नहीं। मुझे याद नहीं पड़ता कभी हममें से किसी भाई को पीटा हो। पर खुद दुखी होंगे, शायद सिर फोड़ लें। मैंने सोचा कि यह जोखिम उठाकर भी दोष कबूल कर लेना चाहिए, उसके बिना शुद्धि नहीं होगी।
आखिर मैंने तय किया कि चिट्ठी लिखकर दोष स्वीकार किया जाए और क्षमा मांग ली जाए। मैंने चिट्ठी लिखकर हाथोंहाथ दी। चिट्ठी में सारा दोष स्वीकार किया और सजा चाही। आग्रहपूर्वक विनती की कि वे अपने को दुख में न डालें और भविष्य में फिर ऐसा अपराध न करने की प्रतिज्ञा की। मैंने कांपते हाथों चिट्ठी पिताजी के हाथ में दी। मैं उनके तख्त के सामने बैठ गया। उन दिनों वे भगंदर की बीमारी से पीड़ित थे, इस कारण बिस्तर पर ही पड़े रहते थे। खटिया के बदले लकड़ी का तख्त काम में लाते थे। उन्होंने चिट्ठी पढ़ी। आंखों से मोती की बूंदें टपकीं। चिट्ठी भींग गई। उन्होंने क्षण भर के लिए आंखें मूंदीं, चिट्ठी फाड़ डाली और स्वयं पढ़ने के लिए उठ बैठे थे, सो वापस लेट गए।
मैं भी रोया। पिताजी का दुख समझ सका। अगर मैं चित्रकार होता, तो वह चित्र आज भी संपूर्णता से खींच सकता। आज भी वह मेरी आंखों के सामने इतना स्पष्ट है। मोती की बूंदों के उस प्रेमबाण ने मुझे बेध डाला। मैं शुद्ध बना। इस प्रेम को तो अनुभवी ही जान सकता है।

रामबाण वाग्यां रे होय ते जाणे।
(राम की भक्ति का बाण जिसे लगा हो, वही जान सकता है।)
मेरे लिए यह अहिंसा का पदार्थपाठ था। उस समय तो मैंने इसमें पिता के प्रेम के सिवा और कुछ नहीं देखा, पर आज मैं इसे शुद्ध अहिंसा के नाम से पहचान सकता हूं। ऐसी अहिंसा के व्यापक रूप धारण कर लेने पर उसके स्पर्श से कौन बच सकता है? ऐसी व्यापक अहिंसा की शक्ति की थाह लेना असंभव है। इस प्रकार की शांत क्षमा पिताजी के स्वभाव के विरुद्ध थी। मैंने सोचा था कि वे क्रोध करेंगे, कटु वचन कहेंगे, शायद अपना सिर पीट लेंगे। पर उन्होंने इतनी अपार शांति जो धारण की, मेरे विचार में उसका कारण अपराध की सरल स्वीकृति थी। जो मनुष्य अधिकारी के सम्मुख स्वेच्छा से और निष्कपट भाव से अपना अपराध स्वीकार कर लेता है और फिर कभी वैसा अपराध न करने की प्रतिज्ञा करता है, वह शुद्धतम प्रायश्चित करता है। मैं जानता हूं कि मेरी इस स्वीकृति से पिताजी मेरे विषय में निर्भय बने और उनका महान प्रेम और भी बढ़ गया।

9. पिताजी की मृत्यु और मेरी दोहरी शर्म    
उस समय मैं सोलह वर्ष का था। हम ऊपर देख चुके हैं कि पिताजी भगंदर की बीमारी के कारण बिलकुल शय्यावश थे। उनकी सेवा में अधिकतर माताजी, घर का एक पुराना नौकर और मैं रहते थे। मेरे जिम्मे ‘नर्स’ का काम था। उनके घाव धोना, उसमें दवा डालना, मरहम लगाने के समय मरहम लगाना, उन्हें दवा पिलाना और जब घर पर दवा तैयार करनी हो तो तैयार करना, यह मेरा खास काम था। रात हमेशा उनके पैर दबाना और इजाजत देने पर सोना, यह मेरा नियम था। मुझे यह सेवा बहुत प्रिय थी। मुझे स्मरण नहीं है कि मैं इसमें किसी भी दिन चूका होऊं। ये दिन हाईस्कूल के तो थे ही। इसलिए खाने-पीने के बाद का मेरा समय स्कूल में या पिताजी की सेवा में ही बीतता था। जिस दिन उनकी आज्ञा मिलती और उनकी तबीयत ठीक रहती, उस दिन शाम को टहलने जाता था।
इसी साल पत्नी गर्भवती हुई। मैं आज देख सकता हूं कि इसमें दोहरी शर्म थी। पहली शर्म तो इस बात की कि विद्याध्ययन का समय होते हुए भी मैं संयम से न रह सका और दूसरी यह कि यद्यपि स्कूल की पढ़ाई को मैं अपना धर्म समझता था, और उससे भी अधिक माता-पिता की भक्ति को धर्म समझता था। सो भी इस हद तक कि बचपन से ही श्रवण को मैंने अपना आदर्श माना था।  फिर भी विषय-वासना मुझ पर सवारी कर सकी थी। मतलब यह कि यद्यपि रोज रात को मैं पिताजी के पैर तो दबाता था, लेकिन मेरा मन शयन-कक्ष की ओर भटकता रहता और सो भी ऐसे समय जब स्त्री का संग धर्मशास्त्र के अनुसार त्याज्य था। जब मुझे सेवा के काम से छुट्टी मिलती, तो मैं खुश होता और पिताजी के पैर छूकर सीधा शयन-कक्ष में पहुंच जाता।
पिताजी की बीमारी बढ़ती जाती थी। वैद्यों ने अपने लेप आजमाए, हकीमों ने मरहम-पट्टियां आजमाई, साधारण हज्जाम वगैरह की घरेलू दवाएं भी की; अंग्रेज डाक्टर ने भी अपनी अक्ल आजमा कर देखी। अंग्रेज डाक्टर ने सुझाया कि शल्य-क्रिया ही रोग का एकमात्र उपाय है। परिवार के एक मित्र वैद्य बीच में पड़े और उन्होंने पिताजी की उत्तरावस्था में ऐसी शल्य-क्रिया को नापसंद किया। तरह-तरह दवाओं की जो बोतलें खरीदी थीं, वे व्यर्थ गईं और शल्य-क्रिया नहीं हुई। वैद्यराज प्रवीण और प्रसिद्ध थे। मेरा खयाल है कि अगर वे शल्य-क्रिया होने देते, तो घाव भरने में दिक्कत न होती। शल्य-क्रिया उस समय के बंबई के प्रसिद्ध सर्जन के द्वारा होनी थी। पर अंतकाल समीप था, इसीलिए उचित उपाय कैसे हो पाता? पिताजी शल्य-क्रिया कराए बिना ही बंबई से वापस आए। साथ में इस निमित्त से खरीदा हुआ सामान भी लेते आए। वे अधिक जीने की आशा छोड़ चुके थे। कमजोरी बढ़ती गई और ऐसी स्थिति आ पहुंची कि प्रत्येक क्रिया बिस्तर पर ही करना जरूरी हो गया। लेकिन उन्होंने आखिरी घड़ी तक इसका विरोध ही किया और परिश्रम सहने का आग्रह रखा। वैष्णव धर्म का यह कठोर शासन है। बाह्य शुद्धि अत्यंत आवश्यक है। पर पाश्चत्य वैद्यक-शास्त्र ने हमें सिखाया कि मल-मूत्र-विसर्जन की और स्नानादि की सह क्रियाएं बिस्तर पर लेटे-लेटे संपूर्ण स्वच्छता के साथ की जा सकती हैं और रोगी को कष्ट उठाने की जरूरत नहीं पड़ती; जब देखो तब उसका बिछौना स्वच्छ ही रहता है। इस तरह साधी गई स्वच्छता को मैं तो वैष्णव धर्म का ही नाम दूंगा। पर उस समय स्नानादि के लिए बिछौना छोड़ने का पिताजी का आग्रह देखकर मैं अश्चर्यचकित ही होता था और मन में उनकी स्तुति किया करता था।
अवसान की घोर रात्रि समीप आई। उन दिनों मेरे चाचाजी राजकोट में थे। मेरा कुछ ऐसा खयाल है कि पिताजी की बढ़ती हुई बीमारी के समाचार पाकर ही वे आए थे। दोनों भाइयों के बीच अटूट प्रेम था। चाचाजी दिन भर पिताजी के बिस्तर के पास ही बैठे रहते और हम सबको सोने की इजाजत देकर खुद पिताजी के बिस्तर के पास सोते। किसी को खयाल नहीं था कि यह रात आखिरी सिद्ध होगी। वैसे डर तो बराबर बना ही रहता था। रात के साढ़े दस या ग्यारह बजे होंगे। मैं पैर दबा रहा था। चाचाजी ने मुझसे कहा-  ‘जा, अब मैं बैठूंगा।’ मैं खुश हुआ और सीधा शयन-कक्ष में पहुंचा। पत्नी तो बेचारी गहरी नींद में थी। पर मैं सोने कैसे देता? मैंने उसे जगाया। पांच-सात मिनट ही बीते होंगे, इतने में जिस नौकर की मैं ऊपर चर्चा कर चुका हूं, उसने आकर किवाड़ खटखटाया। मुझे धक्का सा लगा। मैं चौका। नौकर ने कहा- ‘उठो, बापू बहुत बीमार हैं।’ मैं जानता था वे बहुत बीमार तो थे ही, इसीलिए यहां ‘बहुत बीमार’ का विशेष अर्थ समझ गया। एकदम बिस्तर से कूद गया।
‘कह तो सही, बात क्या है?’
‘बापू गुजर गए!’
मेरा पछताना किस काम आता? मैं बहुत शरमाया। बहुत दुखी हुआ। दौड़कर पिताजी के कमरे में पहुंचा। बात समझ में आई कि अगर मैं विषयांध न होता तो इस अंतिम घड़ी में यह वियोग मुझे नसीब न होता और मैं अंत समय तक पिताजी के पैर दबाता रहता। अब तो मुझे चाचाजी के मुंह से सुनना पड़ा- ‘बापू हमें छोड़कर चले गए!’ अपने बड़े भाई के परम भक्त चाचाजी अंतिम सेवा का गौरव पा गए। पिताजी को अपने अवसान का अंदाजा हो चुका था। उन्होंने इशारा करके लिखने का सामान मंगाया और कागज में लिखा- ‘तैयारी करो।’ इतना लिखकर उन्होंने हाथ पर बंधा तावीज तोड़कर फेंक दिया, सोने की कंठी भी तोड़कर फेंक दी और एक क्षण में आत्मा उड़ गई।
पिछले अध्याय में मैंने अपनी जिस शर्म का जिक्र किया है, वह यही शर्म है- सेवा के समय भी विषय की इच्छा! इस काले दाग को आज तक नहीं मिटा सका। और मैंने हमेशा माना है कि यद्यपि माता-पिता के प्रति मेरे मन में अपार भक्ति थी, उसके लिए सब कुछ छोड़ सकता था, तथापि सेवा के समय भी मेरा मन विषय को छोड़ नहीं सकता था। यह सेवा में रही हुई अक्षम्य त्रुटि थी। इसी से मैंने अपने को एकपत्नी-व्रत का पालन करनेवाला मानते हुए भी विषयांध माना है। इससे मुक्त होने में मुझे बहुत समय लगा और मुक्त होने से पहले कई धर्म-संकट सहने पड़े।
अपनी इस दोहरी शर्म की चर्चा समाप्त करने से पहले मैं यह भी कह दूं कि पत्नी के जो बालक जन्मा वह दो-चार दिन जीकर चला गया। कोई दूसरा परिणाम हो भी क्या सकता था? जिन मां-बापों को अथवा जिन बाल-दंपति को चेतना हो, वे इस दृष्टांत से चेतें। 



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