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गुरुवार, 27 जून 2019

देशभक्ति का ‘प्रदीप’

फिल्मों में देशभक्ति के गानों को लेकर जो प्रयोग कवि प्रदीप ने किए, वह न सिर्फ दुस्साहस से भरा है बल्कि हिंदी फिल्मी गीतों की दुनिया के लिए बड़ी रचनात्मक उपलब्धि भी है

भारतीय स्वाधीनता के लिए संघर्ष करने वालों में जहां एक तरफ राष्ट्रीय नेताओं की पांत और उनके पीछे चलनेवाले लाखों राष्ट्रभक्त थे, तो वहीं संघर्ष की इस मशाल को कलम के सिपाहियों ने अपने लेखन के बूते जलाए रखा। खासतौर पर  1931 के बाद वो दौर था जब भारत में स्वतंत्रता संग्राम का आंदोलन अपने चरम पर था। एक तरफ भगत सिंह और साथियों की शहादत के बाद लोगों ने भारत को आजाद कराने के लिए कमर कस ली थी। दूसरी तरफ लोगों का हौसला बुलंद करने का जिम्मा कई कवि निभा रहे थे।
उस समय तमाम कवियों के बीच एक नाम जो काफी लोकप्रिय था, वह नाम था रामचंद्र नारायणजी द्विवेदी यानी प्रदीप का। रामचंद्र द्विवेदी, कवि प्रदीप कैसे बने इसका भी एक दिलचस्प किस्सा है। यह किस्सा जानने से पहले इनके शुरुआती दिनों की बात करते हैं। 6 फरवरी 1915 को उज्जैन के बड़नगर में एक मिडिल क्लास परिवार में रामचंद्र द्विवेदी का जन्म हुआ था। उनकी रुचि बचपन से ही कविताओं में थी। 1939 में लखनऊ यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन करने के बाद वे शिक्षक बनने की तैयारी करने लगे।

हिमांशु राय से भेंट
उसी दौरान कवि प्रदीप की जिंदगी में एक मोड़ आया और उनकी जिंदगी बदल गई। दरअसल, उसी दौरान उन्हें मुंबई में एक कवि सम्मेलन में जाने का मौका मिला। इस कवि सम्मेलन में उनका परिचय बॉम्बे टॉकीज में काम करने वाले एक व्यक्ति से हुआ, जो कवि प्रदीप की कविताओं से काफी प्रभावित था। उस व्यक्ति ने बॉम्बे टॉकीज के संस्थापक हिमांशु राय को कवि प्रदीप के बारे में बताया और हिमांशु राय ने उनको बुलावा भेज दिया। बस फिर क्या था, हिमांशु राय कवि प्रदीप से इतने प्रभावित हुए कि उन्हें अपने स्टूडियो में 200 रुपए प्रति माह पर नौकरी पर रख लिया।
रामचंद्र से प्रदीप वो हिमांशु राय के कहने पर ही बने। हिमांशु राय का सुझाव था कि इतना लंबा नाम होना फिल्मी जगत में ठीक नहीं है, जिसके बाद उन्होंने अपना नाम बदलकर प्रदीप रख लिया। लेकिन इसके बाद उनकी मुश्किलें और बढ़ गई।

दो प्रदीप
उन दिनों अभिनेता प्रदीप भी काफी मशहूर थे और स्टूडियो में दो प्रदीप हो गए थे। अकसर डाकिया भी असमंजस में गलती कर बैठता और एक की डाक दूसरे को दे बैठता। इसी समस्या के हल के तौर पर प्रदीप ने अपने नाम के आगे कवि लगाना शुरू कर दिया और तब से वो कवि प्रदीप के नाम से जाने जाने लगे।

गिरफ्तारी का वारंट
कवि प्रदीप की जिंदगी में दो बेहद अहम समय आए जो आज भी लोगों के जेहन में ताजा है। पहला समय था आजादी से पहले का, जब 1943 में बॉम्बे टॉकीज की फिल्म ‘किस्मत’ रिलीज हुई। इस फिल्म में कवि प्रदीप ने एक गाना लिखा, जिसकी वजह से उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी हो गया। यह गाना भारत छोड़ो आदोलन के समर्थन में माना जा रहा था, जिसके बोल कुछ इस प्रकार थे-
आज हिमालय की चोटी से 
फिर हमने ललकारा है 
दूर हटो ऐ दुनिया वालों 
हिंदुस्तान हमारा है
यह गाना काफी मशहूर हुआ, लेकिन ब्रिटिश सरकार को नागवार गुजरा। इस गाने के चलते उन्हें काफी समय तक भूमिगत रहना पड़ा। लेकिन वारंट से बचने के लिए कवि प्रदीप ने जो तर्क दिया वो काफी मजेदार था। उन्होने कहा कि यह गाना अंग्रेजों के खिलाफ नहीं बल्कि उनके पक्ष में है। दरअसल, इस गाने की आगे की लाइनें थीं-
शुरू हुआ है जंग तुम्हारा 
जाग उठो हिंदुस्तानी, 
तुम न किसी के आगे झुकना 
जर्मन हो या जापानी
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान 1942 में जब सिंगापुर और बर्मा लड़खड़ाने लगे तो भारत पर जापानी आक्रमण की संभावना और बढ़ गई। बस कवि प्रदीप ने इसी मुद्दे का फायदा उठाया। उन्होंने इस गाने की आगे की पंक्तियों से ब्रिटिश सरकार को ये मानने पर मजबूर कर दिया कि यह गाना उनके नहीं, बल्कि जर्मनी और जापान जैसे शत्रु राष्ट्र के खिलाफ है और इस तरह वो गिरफ्तार होने से बच गए।

‘ऐ मेरे वतन के लोगों’
इसके बाद कवि प्रदीप के लिखे  ‘दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना ढाल’ और ‘आओ बच्चों तुम्हें दिखाएं’ जैसे कई देशभक्ति से भरे गाने लोकप्रिय हुए। इसके बाद कवि प्रदीप की कलम ने वो गीत लिखा जिसे सुनकर जवाहर लाल नेहरू की आंखें नम हो गई थीं। वह गीत था ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’, जो कवि प्रदीप ने 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान शहीद सैनिकों के लिए लिखा था।
इस गाने को 26 जनवरी 1963 में लता मंगेशकर ने दिल्ली के नेशनल स्टेडियम में गाया। इस अवसर पर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, राष्ट्रपति एस. राधाकृष्णन सहित सभी मंत्री और लगभग पूरी फिल्म इंडस्ट्री मौजूद थी। इस गाने को सुनकर सभी की आंखें नम थीं। पर हैरानी की बात यह थी कि इस अवसर पर कवि प्रदीप को आमंत्रित नहीं किया गया। हालांकि इस कार्यक्रम के तीन महीने बाद जवाहरलाल नेहरू कवि प्रदीप से मिले और उनकी अवाज में यह गाना भी सुना। कवि प्रदीप ने यह गाना सैनिकों की विधवाओं के नाम कर दिया था ताकि इस गाने से होने वाली कमाई विधवाओं को मिले। लेकिन ऐसा हुआ नहीं।
कवि प्रदीप आजीवन पूछते रह गए कि 15 अगस्त और 26 जनवरी को ये गाना बजाया जाता है तो इसकी कमाई सैनिकों की विधवाओं तक क्यों नहीं पहुंचती। इस पर न तो म्यूजिक कंपनी ने कोई जवाब दिया और ना ही आर्मी ने। बाद में मुंबई हाई कोर्ट ने 25 अगस्त 2005 में इस पर फैसला सुनाया और एचएमवी म्यूजिक कंपनी को विधवा कोष में 10 लाख जमा करने का आदेश दिया।

सफलता के साथ लोकप्रियता भी
कवि प्रदीप ने अपने जीवन में 71 फिल्मों में 1700 गीत लिखे, जिनमें देशभक्ति सहित धार्मिक गीत भी शामिल थे। इन गानों में से कई गीत कवि प्रदीप ने खुद भी गाए जो काफी लोकप्रिय हुए। कवि प्रदीप को 1998 में दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। अपने गीतों से फिल्मी जगत का रचनात्मक स्तर और बढ़ाने वाले कवि प्रदीप का 11 दिसंबर 1998 को निधन हो गया।



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