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बुधवार, 19 जून 2019

धर्म, तरुण और जे. कृष्णमूर्ति

मनुष्य की धार्मिकता का आरंभ संगठित धर्म के बाद होगा। इसको कहने वाला आधुनिक पैगंबर तो जे. कृष्णमूर्ति हैं, जो आधुनिकतम बातें कहते हैं

संस्कृति, चाहे वह पश्चिम की हो या पूर्व की हो, अब उस मुकाम पर पहुंच गई है कि या तो उसमें वास्तविकता आएगी, नहीं तो वह नहीं रहेगी। यह बात आज की सारी सांस्कृतिक संस्थाओं को समझ लेनी चाहिए। इसीलिए तरुण आज विद्रोह में उठ खड़ा हुआ है। तरुण मनुष्य के दिल में भी मुक्ति की कामना है। वह कहता है कि अब तक संस्थाओं और संगठनों (राज्य-संस्था, धर्म-संस्था आदि) ने हमारा नियंत्रण किया है। अब हम इनमें से किसी के भी नियंत्रण में नहीं रहना चाहते। धार्मिक संस्थाओं ने सबसे अधिक नियंत्रण किया है। धर्म की जितनी पकड़ मनुष्य के दिमाग पर है, उतनी और किसी की नहीं। जितने पाप धर्म करवा सकता है उतने और कोई नहीं करवा सकता।
क्या मनुष्य का स्वरूप अकर्म है या सहज कर्म है? ...और सहज कर्म की प्रेरणा क्या होगी? ये दो सवाल उठते हैं। यानी शास्त्रीय कर्म तो निकल जाता है कि करोगे तो पुण्य लगेगा, नहीं करोगे, तो पाप लगेगा। शास्त्रीय कर्म का मतलब है, वर्णाश्रम का कर्म। इसे आपको ठीक तरह समझ लेना चाहिए। यह न तो महर्षि अरविंद मान सकते थे, न लोकमान्य तिलक मान सकते थे, न गांधीजी मान सकते थे और न राजा जी मान सकते थे। यहां मैं दो-चार ही नाम ले रहा हूं। ऐसा तो कोई नेता नहीं है, जिसने गीता पर न लिखा हो। इन सबने वर्णाश्रम की बात कही है, लेकिन वर्ण को एक शास्त्रीय कर्म नहीं माना है।
मनुष्य के लिए परेशानी का विषय यह है कि वह ऐसी कौन सी जगह बनवाए कि जहां सब लोग जाएं। आज तो लोग बाजार में भी बंट गए है, जैसे, हिंदू दुकानें, मुस्लिम दुकानें। तो मनुष्य बेचारे को कहीं जगह ही नहीं है तो क्या दुनिया में यह सेकुलर धर्म या संप्रदाय-निरपेक्षता होगी? क्या इसी धर्म या संप्रदाय में रहने से शांति या मुक्ति मिल सकेगी? मैंने आपके पास केवल जिज्ञासाएं रखी हैं। आज का तरुण इस नतीजे पर पहुंचा रहा है कि राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक स्वतंत्रता ही अकेले काफी नहीं है, इनके आगे भी कोई स्वतंत्रता है, जो मनुष्य के जीवन को संपन्न बनाती है। यूरोप और उत्तर अमेरिका के लोग इन तीनों स्वतंत्रता का उपयोग कर चुके हैं। ये लोग जिस संपन्नता का अनुभव कर चुके है, इस संपन्नता के बाद की जो खोज है, वह आधुनिक मानव की खोज है, जिसका आरंभ हमारे यहां होता है।
कार्ल मार्क्स ने कहा था कि ऐतिहासिकता का आरंभ वर्ग विग्रह के बाद होगा। मैं निवेदन करना चाहता हूं कि राज्य-संस्थाओं और धर्म- संस्थाओं का जिस दिन अंत होगा, उस दिन धार्मिकता का आरंभ होगा। मनुष्य की धार्मिकता का आरंभ संगठित धर्म के बाद होगा। इसको कहने वाला आधुनिक पैगंबर तो जे. कृष्णमूर्ति हैं, जो आधुनिकतम बातें कहते हैं।
जब ये सारे ‘हरे राम, हरे कृष्ण’ वाले थक जाएंगे, तब अंत में वे कृष्णमूर्ति के पास पहुंचेंगे। लेकिन पहुंचने वाले वहीं हैं, क्योंकि बीच में कहीं भी इस समस्या का समाधान नहीं है। यह आज की सांस्कृतिक समस्या है। इसी को आप आज की आधुनिकतम आध्यात्मिक समस्या समझ लीजिए।
असल में यह एक जिज्ञासा है, जो सोचने वाले हैं, उनके सामने रखना चाहता हूं इस पर वे सोचें, यह रियलिटी (वास्ताविकता) है, डिस्कशन (वाद-विवाद) नहीं है। गीता में मानवेतर कर्मयोग है या नहीं है? संन्यास योग है या कर्मयोग है? फिर ईश्वर और जीव एक हैं या दो हैं? हमको पता नहीं।
मनुष्य को मनुष्य के साथ रहने में और जब तक मनुष्य भीतर से एक न हो, वह रह नहीं सकता। सुख-दुख की संवेदना जब तक मनुष्यों की समान नहीं होगी, तब तक मनुष्य साथ नहीं रह सकते। दूसरे के दुखों से मैं दुखी होऊं, दूसरे के सुख से सुखी बनूं, यह तभी हो सकता है, जब हम दोनों में कहीं मौलिक एकता हो। आपकी संवेदना और दूसरे की संवेदना में समानता हो। दक्षिण अफ्रीका के एक नीग्रो नेता ने कहा कि मेरी चमड़ी काली है, तुम्हारी गोरी है। मेरे बाल घुंघराले हैं, तुम्हारे सीधे हैं। मेरे होंठ कुछ बड़े हैं, तुम्हारे छोटे हैं। लेकिन इन सबके भीतर मूल में तुममें और मुझमें एकता है, वही मानवता है। तो उससे पूछा गया कि तुम नीग्रो लोगों का उद्धार कैसे होगा? उसने कहा कि गोरे आदमी का दिल काला हो गया है, जिस दिन उसका दिल शुभ्र हो जाएगा, आपमें और हममें फर्क नहीं रहेगा।
यह सवाल हमारे यहां भी है। कानून तो बन गया, लेकिन अछूत दबाए जा रहे हैं, उनके मकान ही नहीं, मनुष्य जलाए जा रहे हैं। यह तो धर्म के नाम पर ही तो हो रहा है न? आप इस पर सोचिए कि यह सब क्या हो रहा है? कहीं तो इसकी खोज होनी चाहिए। इन सारी समस्याओं को मैंने मूलभूत-समस्या के रूप में आपके सामने रखा। आज के मनुष्य की खोज आध्यात्मिक खोज है। उसका आरंभ हुआ है भौतिकता की समाप्ति के बाद। हमारे यहां तो अभी भौतिकता की भी समाप्ति नहीं हुई है। 



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