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शुक्रवार, 19 अप्रैल 2019

स्वच्छता में आदर्श नहीं रहा रूस

आर्थिक और सामरिक क्षेत्र में सर्वोच्चता के आसन से हिलने के बाद रूस में खासतौर पर स्वच्छता को लेकर स्थिति काफी खराब हुई है

सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस की स्थिति पहले जैसे भले नहीं रही हो, पर यहां के लोग और समाज अब भी सांस्कृतिक तौर पर काफी संपन्न हैं और कई अच्छी आदतें उनके जीवन में आज भी अहम हैं। ऐसी ही एक आदत रूसी समाज में स्वच्छता को लेकर काफी पहले से है। सभ्यतागत और सांस्कृतिक विकास के आधुनिक चरण में भी रूसी शहरों और समाज में स्वच्छता को पर्याप्त महत्व मिला। पर आर्थिक और सामरिक क्षेत्र में सर्वोच्चता के आसन से हिलने के बाद रूस में खासतौर पर स्वच्छता को लेकर स्थिति काफी खराब हुई है। वैसे यह प्रभाव वहां पेयजल उपलब्धता के मामले में नगण्य मालूम पड़ता है। सीआईए द वर्ल्ड फैक्टबुक के आंकड़ा के मुताबिक रूसी शहरों में करीब 99 फीसदी आबादी तक शुद्ध पेयजल पहुंच रहा है। यह आंकड़ो ग्रामीण क्षेत्रों में थोड़ा कम जरूर है पर फिर भी यह 91 फीसदी के ऊपर ही है।

स्वच्छता की चुनौती
बात करें अकेले स्वच्छता की तो पेयजल की उपलब्धता के मुकाबले जरूर थोड़ी निराशाजनक स्थिति वहां है। पर हाल के कुछ दशकों में वहां की शासकीय और आर्थिक व्यवस्था के साथ वहां की सरकार की बदली प्राथमिकताओं के कारण स्वच्छता पर जोर निश्चित कुछ कम हुआ है। पर अब वहां की सरकार इस दिशा में तेजी से कार्य कर रही है। 

ग्रामीण क्षेत्रों में अस्वच्छता
बहरहाल, जो मौजूदा स्थिति है उसमें रूसी शहरों में 77 फीसदी लोग उन्नत और सुरक्षित स्वच्छता साधनों का इस्तेमाल कर रहे हैं, जबकि गांवों में यह स्थिति वाकई निराशाजनक है। रूसी ग्रामीण इलाकों-कस्बों में 60 फीसदी से भी कम लोगों तक स्वच्छता के उन्नत साधनों की पहुंच संभव हो सकी है। यह स्थिति रूस में बीते कुछ दशकों में रूसी समाज की खासतौर पर आर्थिक हैसियत में कमजोरी के कारण आई है। अब रूस में शासकीय स्तर पर एक स्थिरता है और वहां का नेतृत्व भी दूरदर्शी विकास लक्ष्यों पर फोकस कर रहा है। लिहाजा अगले दशक तक रूस में स्वच्छता की स्थिति में बड़े सुधार की उम्मीद है। 

विकास के कई चरण
अगर लंबे ऐतिहासिक क्रम में देखें तो रूस का सभ्यतागत विकास कई चरणों से होकर गुजरा है। इसमें आधुनिक रूस का इतिहास पूर्वी स्लाव जाति से शुरू होता है। स्लाव जाति जो आज पूर्वी यूरोप में बसती है। इनका सबसे पुराना गढ़ कीव था, जहां नौवीं सदी में स्थापित कीवी रूस साम्राज्य आधुनिक रूस की आधारशिला के रूप में माना जाता है। हालांकि उस क्षेत्र में इससे पहले भी साम्राज्य रहे थे पर वे दूसरी जातियों के थे और उन जातियों के लोग आज भी रूस में रहते हैं- खजर और अन्य तुर्क लोग। 

साम्राज्य विस्तार और विश्व युद्ध
17वीं से 19वीं सदी के मध्य में रूसी साम्राज्य का अत्यधिक विस्तार हुआ। यह प्रशांत महासागर से लेकर बाल्टिक सागर और मध्य एशिया तक फैल गया। प्रथम विश्वयुद्ध में रूस को खासी आंतरिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा और 1917 की बोल्शेविक क्रांति के बाद रूस युद्ध से अलग हो गया। द्वितीय विश्वयुद्ध में अपराजेय लगने वाली जर्मन सेना के खिलाफ अप्रत्याशित अवरोध तथा अन्ततः विजय प्रदर्शित करने के बाद रूस तथा वहां के साम्यवादी नायक जोसेफ स्टालिन की धाक दुनिया की राजनीति में बढ़ी। उद्योगों की उत्पादक क्षमता और देश की आर्थिक स्थिति में उतार- चढ़ाव आते रहे। 1930 के दशके में ही साम्यवादी गणराज्यों के समूह सोवियत रूस का जन्म हुआ था। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद शीत युद्ध काल के गुजरे इस संघ का विघटन 1991 में हो गया।

शीत युद्ध
शीत युद्ध से पहले और बाद के रूस में बहुत फर्क आया है। अगर अमेरिका से तुलना करें तो इस दौरान अमेरिकी सबलता के मुकाबले रूस न सिर्फ अंतरराष्ट्रीय, बल्कि कई आंतरिक मोर्चों पर भी कमजोर पड़ा। बड़ी बात यह है कि रूस शीत युद्ध में भारी क्षति सहन कर चुकने के बावजूद एक शक्ति के रूप में उभरा। इससे पहले गोर्बाचोव के शासनकाल में दो शब्द बहुत ही प्रसिद्ध हुए- ग्लासनोस्त और पेरेस्त्रोइका। ग्लासनोस्त का अर्थ होता है- खुलापन और पेरेस्त्तोइका का मतलब- पुनर्निर्माण। उन्होंने राजनीतिक बंदियों को रिहा किया और पूर्वी यूरोप में हस्तक्षेप से बचने की नीति अपनाई। 

सोवियत विघटन
इसी दौरान 1989 में बर्लिन की दीवार भी ढहा दी गई और पूर्वी तथा पश्चिमी जर्मनी का एकीकरण हुआ। इस घटना को आज भी साम्यवाद की असफलता के आरंभिक निशानी के रूप में देखा जाता है। इसी साल सोवियत सेना अफगानिस्तान से भी हट गई। ये सब बातें पुनर्निर्माण यानी पेरेस्त्रोइका के लिए तो एक प्रतीक बनीं पर ग्लासनोस्त को उतनी लोकप्रियता नहीं मिली। 1986 में चेर्नोबिल में हुए परमाणु ऊर्जागृह में हुई दुर्घटना को सरकारी मीडिया द्वारा छुपाने और दबाने की कोशिश की गई। ग्लासनोस्त की वजह से सोवियत संघ के घटक देशों में राष्ट्रवादी प्रदर्शनों को अवसर दिया गया। मार्च 1990 में गोर्बाचोव सोवियत संघ के राष्ट्रपति बने। 
1991 में जब गोर्बाचोव क्रीमिया में एक छुट्टी पर थे तब तख्तापलट की कोशिश हुई और गोर्बाचोव को तीन दिनों तक नजरबंद किया गया। इधर मॉस्को में बोरिस येल्तसिन का समर्थन बढ़ गया था और उन्हें राष्ट्रपति बना दिया गया। सोवियत संघ के कई देशों ने स्वतंत्रता की घोषणा कर दी। 8 दिसंबर 1991 को बेलारूस, यूक्रेन और रूस के राष्ट्रपतियों ने मिलकर सोवियत संघ के विभाजन का फैसला किया। इस तरह साम्यवादी ढांचे का एक बड़ा और संयुक्त मॉडल बिखर गया। 



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