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मंगलवार, 25 जून 2019

संघर्ष और सफलता की ‘साधना’

साधना न सिर्फ एक उम्दा अभिनेत्री थीं, बल्कि वह स्टाइल और लुक के लिहाज से सबसे ज्यादा चर्चा में रही थीं। फिल्म ‘लव इन शिमला’ के लिए साधना को नया लुक दिया गया, जो ‘साधना कट’ के नाम से मशहूर हुआ

बॉलीवुड की दुनिया में अभिनेत्री साधना का कितना बड़ा नाम था, इसका अहसास से किया जा सकता है कि 25 दिसंबर 2015 को जब उनका निधन हुआ तो लता मंगेशकर ने ट्विटर के जरिए कहा, ‘मुझे अभी पता चला कि मेरी पसंदीदा अभिनेत्री साधना जी का आज स्वर्गवास हुआ है। वह एक बहुत बड़ी कलाकार थीं। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे।’ साधना के साथ फिल्म ‘एक फूल दो माली’ और ‘इंतकाम’ में काम कर चुके अभिनेता संजय खान कहते हैं, ‘मैंने उनके साथ अपनी दो सबसे कामयाब फिल्में की थीं। वह बेहद खूबसूरत थीं। बहुत सुंदर तरीके से चलती थीं। उन्हें हेयर स्टाइलिंग की इतनी समझ थी की एक बार उन्होंने मुझे एक नया हेयर स्टाइल दिया था।’ दरअसल, साधना न सिर्फ एक उम्दा अभिनेत्री थीं, बल्कि वह स्टाइल और लुक के लिहाज से सबसे ज्यादा चर्चा में रही थीं। उनकी समकालीन अभिनेत्री आशा पारेख के शब्दों में, ‘वह बहुत पॉपुलर थीं। उनका ‘साधना कट’ मुझे आज भी याद है।’ अपनी जिंदगी के आखिरी दिनों में साधना नैयर कैंसर से जूझ रही थीं। 
एक सिंधी परिवार में जन्मी साधना का नाम उसके पिता की पसंदीदा अभिनेत्री साधना बोस के नाम पर रखा गया था। उनके पिता और अभिनेता हरि शिवदसानी भाई थे। हरि की बेटी अभिनेत्री बबीता कपूर हैं। साधना अपने माता-पिता की इकलौती संतान थी और आठ साल की उम्र तक उनकी मां ने उन्हें घर में ही शिक्षा-दीक्षा दी। 
साधना की शादी मशहूर फिल्म निर्देशक आरके नैयर से हुई थी, जो उनसे उम्र में काफी बड़े थे। साधना के माता-पिता इस शादी के लिए पूरी तरह राजी नहीं थे। साधना की कोई संतान नहीं थी। वह नैयर की बहन के बच्चों को अपने ही बच्चे मानती रहीं और अपनी वसीयत में भी संपत्ति का अधिकार उन्हें दिया। अस्थमा के कारण आरके नैयर साधना को अकेले छोड़ इस दुनिया को अलविदा कह गए। बाद के दिनों में अपने अकेलेपन को दूर रखने के लिए उन्होंने अपनी समकालीन अभिनेत्रियों वहीदा रहमान, आशा पारेख और नंदा के साथ अच्छे संपर्क बनाए। 
वर्ष 1960 में रिलीज हुई फिल्म ‘लव इन शिमला’ के लिए साधना का नया लुक दिया गया, जो ‘साधना कट’ के नाम से मशहूर हो गया। फिल्म का निर्देशन आरके नैयर ने ही किया था। दरअसल, साधना का माथा बहुत चौड़ा था उसे छुपाने के लिए उनके बालों को ऐसा कट दिया गया था। कैमरे के सामने आने का सिलसिला साधना के लिए कम उम्र में ही शुरू हो गया था। राज कपूर की फिल्म ‘श्री 420’ के गीत ‘शाम गई रात आई...’ में वह ग्रुप में शामिल थीं। 
साधना के माता-पिता की आर्थिक हालत कमजोर थी और साधना ही परिवार की एकमात्र कमाने वाली सदस्य थीं। आरके नैयर, राज कपूर के सहायक निर्देशक थे और उनकी दोस्ती उसी समय हुई। दिलचस्प है कि आरके नैयर ही ‘लव इन शिमला’ का विचार लेकर सीधे शशधर मुखर्जी से मिलने गए थे। 
बिमल राय की ‘परख’ ने उन्हें गुणवान कलाकार के रूप में ख्याति दी। साधना की लोकप्रियता बढ़ती गई और रामानंद सागर की ‘आरजू’ में उन्होंने राजेंद्र कुमार के बराबर पांच लाख का मेहनताना पाया। आशा पारेख और सायरा बानो भी उन्हीं दिनों नायिका बनीं, पर साधना ने अधिक सफलता अर्जित की। वह राज कपूर के साथ भी ‘दूल्हा-दुल्हन’ में नायिका बनकर आईं। उनके संघर्ष के कारण राज कपूर उन्हें ‘सध्धोरानी’ कहकर पुकारते थे। 
उनके फिल्मी सफर के शिखर काल में उन्हें थायरॉइड की बीमारी ने जकड़ लिया, जो उस समय लाइलाज थी। एक अन्य रोग के कारण उन्हें लंदन जाकर अपनी आंख निकलवानी पड़ी और असली आंख की तरह दिखने वाला पत्थर लगाया और कुछ समय वे सिनेमा से दूर रहीं। बाद में नैयर ने उन्हें लेकर अत्यंत सफल ‘गीता मेरा नाम’ बनाई। उन्होंने नारी सिप्पी को निर्माता बनने में मदद की। वह फिल्म थी ‘वो कौन थी।’ इस फिल्म में मदन मोहन ने माधुर्य रचा और ‘नयना बरसे रिमझिम-रिमझिम’ गीत अत्यंत लोकप्रिय हुआ। देव आनंद के साथ ‘हम दोनों’ का संगीत भी कमाल का था। उन्होंने बीआर चोपड़ा की फिल्म ‘वक्त’ में भी काम किया।
साधना प्राय: केरल से आईं गरीब लड़कियों को अपने यहां काम देतीं और उन्हें जीने व सेवा करने का सलीका सिखातीं थीं और यह कला सीखकर उन लड़कियों को विदेशों या देशी रईसों के यहां अच्छे वेतन पर काम मिलने लगा। उन्हीं में से एक ने सब ऑफर ठुकरा दिए और वही साधना के जीवन के आखिरी दस वर्षों में उनकी सेवा कर रही थी।
साधना का शानदार फ्लैट मुंबई के कार्टर रोड पर था। इसे किराए पर देकर वे उस बंगले में रहती थीं, जो उन्होंने 50 वर्ष पूर्व आशा भोंसले से किराए पर लिया था। बाद में आशाजी ने जिस बिल्डर को वह बेचा, उसने तरह-तरह से साधना को डराया-धमकाया परंतु साधना इस हव्वे से कभी नहीं डरीं।



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