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शुक्रवार, 21 जून 2019

पर्यावरण बचाने में जुटी ‘सफाई सेना’

जयप्रकाश ने दिल्ली और एनसीआर में कूड़े उठाने वालों का नेटवर्क तैयार कर उन्हें उनके हक के बारे में अवगत कराते हुए सफाई सेना नाम का संगठन खड़ा किया है

आधुनिक और द्रुत विकास की होड़ ने लोगों के साथ देश के जीवन में चाहे लाख उपलब्धियां जोड़ दी हों, पर इसने बेहिसाब कूड़े के रूप में जो संकट खड़ा किया है वह आज पर्यावरण के लिए बड़ी चुनौती बन गई है। अच्छी बात यह है कि बगैर किसी सरकारी प्रोत्साहन के स्वप्रेरणा से इस संकट से निपटने का संकल्प कुछ लोगों ने लिया है। ऐसा ही एक नाम है जयप्रकाश चौधरी। 1994 तक कचरे के ढेर से चीजें ढूंढने और उन्हें बेचकर गुजारा करने वाले जयप्रकाश चौधरी उर्फ संटू आज करीब 170 लोगों को रोजगार दे रहे हैं। कूड़े के ढेर से अपनी किस्मत चमकाने वाले जयप्रकाश महीने में 11 लाख रुपए कमा रहे हैं।

23 वर्ष कूड़े के बीच
41 साल के जयप्रकाश चौधरी ने अपनी जिंदगी के 23 वर्ष कूड़े में ही ​िबता दिए। दिल्ली के कनॉट प्लेस में कुछ साल पहले तक दिनभर की मेहनत और कूड़े के बीच जद्दोजहद कर वह 150 रुपए तक ही कमा पाते थे, लेकिन उन्होंने कूड़े से पैसे कमाने के आइडिया पर काम किया और इसे सफलतापूर्वक दूसरे लोगों तक पहुंचाया। जयप्रकाश ने कूड़े के निस्तारण से लेकर रिसाइक्लिंग की अहमियत को जाना और अपने जैसे लोगों को साथ लाकर अपने काम को नई पहचान दी। भारतीय शहरों में कूड़े के पहाड़ आम बात हैं। कूड़े और उससे होने वाले प्रदूषण के बारे में कुछ ही लोग चिंतित दिखते हैं।

सफाई सेना का गठन 
जयप्रकाश ने दिल्ली और एनसीआर में कूड़े उठाने वालों का नेटवर्क तैयार कर उन्हें उनके हक के बारे में अवगत कराते हुए ‘सफाई सेना’ नाम का संगठन खड़ा किया। 1999 में जयप्रकाश चौधरी ने दिल्ली के कनॉट प्लेस से कूड़े उठाने और रिसाइक्लिंग लायक चीजों को बेचने का काम शुरू किया।
जयप्रकाश ने शीशे की बोतल, कागज, गत्ते और प्लास्टिक के स्क्रैप को जमा कर उसे बेचकर पैसे कमाने तरीका जाना, जयप्रकाश बताते हैं कि शुरुआत में उन्होंने 10-12 लोगों को साथ लेकर कूड़ा इकट्ठा कर उससे रिसाइक्लिंग लायक चीजों को अलगकर बेचना शुरू किया। जयप्रकाश चौधरी के मुताबिक, ‘शुरू में चिंतन नाम के एनजीओ ने हमारी बहुत मदद की और सफाई सेना के गठन में सहयोग दिया। चिंतन ने हमें ट्रेनिंग दी, कूड़ा उठाने वालों के क्या-क्या अधिकार होते हैं, इस बारे में भी हमें जानने को मिला, कचरे के ढेर से पर्यावरण को कैसे बचाना है, यह भी हमें बताया गया। खतरनाक रसायनों और जहरीले गैस से कैसे बचना है, हमें इसकी ट्रेनिंग दी गई। आज दिल्ली-एनसीआर में सफाई सेना के 12 हजार सदस्य हैं। 2009 से शुरू हुआ सफाई सेना अब एक अभियान बन गया है। हम पर्यावरण के बारे में तो सोचते हैं, साथ ही कूड़ा उठाने वालों के हितों की रक्षा भी करते हैं।’

पूरे एनसीआर में प्रसार 
सफाई सेना ने सरकार से दो साल तक संघर्ष करने के बाद खुद को 2009 में पंजीकृत कराया। सफाई सेना अभी दिल्ली, उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद और हरियाणा के कुछ हिस्सों में काम कर रही है। नई दिल्ली रेलवे स्टेशन परिसर में रेलवे ने सफाई सेना को कचरा पृथक्करण केंद्र चलाने की अनुमति दी। रेलवे स्टेशन पर लगे कचरे के डिब्बे से सफाई सेना के कर्मचारी सूखा और गीला कूड़ा उठाकर अलग-अलग करते हैं। सूखे कूड़े से रिसाइक्लिंग का माल निकाला जाता है और वह रिसाइक्लिंग करने वालों को बेच दिया जाता है तो दूसरी तरफ गीले कूड़े का इस्तेमाल खाद बनाने के लिए किया जाता है। नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के अलावा सफाई सेना का एक केंद्र गाजियाबाद के साहिबाबाद में भी चल रहा है। सफाई सेना के जवान घर, दफ्तर, होटल और मॉल से गीला, सूखा और रद्दी उठाकर उसे रिसाइक्लिंग लायक बनाते हैं।

कूड़े को लेकर जागरूकता
जयप्रकाश चौधरी कहते हैं, ‘सब लोग कूड़ा फैलाना तो जानते हैं लेकिन यह नहीं जानते कि उस कूड़े का क्या होगा, उसे कौन हटाएगा और यह पर्यावरण के लिए कितना खतरनाक है। आज हम जो कूड़ा उठा रहे हैं उससे 20 फीसदी ग्रीन हाउस गैस कम करने में मदद करते हैं। साथ ही साथ हम सरकार के कई करोड़ रुपए बचा रहे हैं। अगर यह काम हम नहीं करेंगे तो सरकार को इस कूड़े को उठाने के लिए लोगों को लगाना होगा और उसके बदले में उन्हें पैसे देने होंगे, लेकिन हम तो सरकार के बोझ को ही कम कर रहे हैं।’
जयप्रकाश चौधरी शिकायती लहजे में कहते हैं, ‘हमने अपनी मांगों को लेकर कई बार सरकार से बात करने की कोशिश की, लेकिन हमारी बात नहीं सुनी गई, दूसरी ओर सरकार बड़ी-बड़ी कंपनियों को कूड़ा उठाने के लिए प्रति किलो के हिसाब से पैसे देती है, तकनीक और मशीन मुहैया कराती है लेकिन सरकार हमें आज तक जगह नहीं दे पाई है। सरकार ने तो हमारे बच्चों के लिए अच्छी शिक्षा की व्यवस्था तक नहीं की। अगर आज हमारे साथ चिंतन नहीं होता तो शायद हमारे बच्चे स्कूल नहीं जा रहे होते।’

सरकारी मदद से बनेगी बात
जयप्रकाश कहते हैं कि स्वच्छ भारत अभियान को सफल बनाने में उनके जैसे लोग अहम कड़ी हैं और कूड़ा उठाने वाले और उसे अलग-अलग कर रिसाइक्लिंग करने वालों को सरकार पहचान दे और साथ ही साथ कूड़ा छंटाई केंद्र के लिए जमीन और तकनीक मुहैया कराए।
कूड़ा प्रबंधन और रिसाइक्लिंग पर ब्राजील, लक्जमबर्ग और कोपनहेगन में लेक्चर दे चुके जयप्रकाश कूड़ा उठाने वाले लोगों की तुलना सीमा पर तैनात जवानों से करते हैं और कहते हैं कि कूड़ा भी एक खतरनाक दुश्मन की तरह है जो जल, जमीन और वायु पर हमले करता है। अगर कूड़ा उठाने वाले लोग जान जोखिम में डालकर साफ-सफाई न करें तो शहरों का हाल बुरा हो जाएगा, लोग बीमार पड़ेंगे और पर्यावरण तेजी से दूषित होगा।



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